गोदान
होरीराम ने दोनों बैलों को सानी-पानी देकर अपनी स्त्री धनिया से कहा -- गोबर को ऊख गोड़ने भेज देना। मैं न जाने कब लौटूँ। ज़रा मेरी लाठी दे दे।
धनिया के दोनों हाथ गोबर से भरे थे। उपले पाथकर आयी थी। बोली -- अरे, कुछ रस-पानी तो कर लो। ऐसी जल्दी क्या है।
होरी ने अपने झुरिर्यों से भरे हुए माथे को सिकोड़कर कहा -- तुझे रस-पानी की पड़ी है, मुझे यह चिन्ता है कि अबेर हो गयी तो मालिक से भेंट न होगी। असनान-पूजा करने लगेंगे, तो घंटों बैठे बीत जायगा।
— 'इसी से तो कहती हूँ, कुछ जलपान कर लो। और आज न जाओगे तो कौन हरज़ होगा। अभी तो परसों गये थे।'
— 'तू जो बात नहीं समझती, उसमें टाँग क्यों अड़ाती है भाई! मेरी लाठी दे दे और अपना काम देख। यह इसी मिलते-जुलते रहने का परसाद है कि अब तक जान बची हुई है।
धनिया इतनी व्यवहार-कुशल न थी। उसका विचार था कि हमने ज़मींदार के खेत जोते हैं, तो वह अपना लगान ही तो लेगा। उसकी ख़ुशामद क्यों करें, उसके तलवे क्यों सहलायें।
यद्यपि अपने विवाहित जीवन के इन बीस बरसों में उसे अच्छी तरह अनुभव हो गया था कि चाहे कितनी ही कतर-ब्योंत करो, कितना ही पेट-तन काटो, चाहे एक-एक कौड़ी को दाँत से पकड़ो; मगर लगान बेबाक़ होना मुश्किल है। फिर भी वह हार न मानती थी, और इस विषय पर स्त्री-पुरुष में आये दिन संग्राम छिड़ा रहता था।
उसकी छः सन्तानों में अब केवल तीन ज़िन्दा हैं, एक लड़का गोबर कोई सोलह साल का, और दो लड़कियाँ सोना और रूपा, बारह और आठ साल की। तीन लड़के बचपन ही में मर गये।
उसका मन आज भी कहता था, अगर उनकी दवादारू होती तो वे बच जाते...
सारी देह ढल गयी थी, वह सुन्दर गेहुआँ रंग सँवला गया था और आँखों से भी कम सूझने लगा था। पेट की चिन्ता ही के कारण तो। कभी तो जीवन का सुख न मिला।
इस चिरस्थायी जीर्णार्वास्था ने उसके आत्म-सम्मान को उदासीनता का रूप दे दिया था। जिस गृहस्थी में पेट की रोटियाँ भी न मिलें, उसके लिए इतनी ख़ुशामद क्यों? इस परिस्थिति से उसका मन बराबर विद्रोह किया करता था। और दो चार घुड़कियाँ खा लेने पर ही उसे यथार्थ का ज्ञान होता था।
उसने परास्त होकर होरी की लाठी, मिरजई, जूते, पगड़ी और तमाखू का बटुआ लाकर सामने पटक दिये।
होरी ने उसकी ओर आँखें तरेर कर कहा -- क्या ससुराल जाना है जो पाँचों पोसाक लायी है? ससुराल में भी तो कोई जवान साली-सलहज नहीं बैठी है, जिसे जाकर दिखाऊँ।
होरी के गहरे साँवले, पिचके हुए चेहरे पर मुस्कराहट की मृदुता झलक पड़ी। धनिया ने लजाते हुए कहा -- ऐसे ही तो बड़े सजीले जवान हो कि साली-सलहजें तुम्हें देख कर रीझ जायँगी!
होरी ने फटी हुई मिरजई को बड़ी सावधानी से तह करके खाट पर रखते हुए कहा -- तो क्या तू समझती है, मैं बूढ़ा हो गया? अभी तो चालीस भी नहीं हुए। मर्द साठे पर पाठे होते हैं।
— 'जाकर सीसे में मुँह देखो। तुम-जैसे मर्द साठे पर पाठे नहीं होते। दूध-घी अंजन लगाने तक को तो मिलता नहीं, पाठे होंगे! तुम्हारी दशा देख-देखकर तो मैं और भी सूखी जाती हूँ कि भगवान् यह बुढ़ापा कैसे कटेगा? किसके द्वार पर भीख माँगेंगे?'
होरी की वह क्षणिक मृदुता यथार्थ की इस आँच में जैसे झुलस गयी। लकड़ी सँभालता हुआ बोला -- साठे तक पहुँचने की नौबत न आने पायेगी धनिया! इसके पहले ही चल देंगे।
धनिया ने तिरस्कार किया -- अच्छा रहने दो, मत असुभ मुँह से निकालो। तुमसे कोई अच्छी बात भी कहे, तो लगते हो कोसने।
होरी लाठी कन्धे पर रखकर घर से निकला, तो धनिया द्वार पर खड़ी उसे देर तक देखती रही। उसके इन निराशा-भरे शब्दों ने धनिया के चोट खाये हुए हृदय में आतंकमय कम्पन-सा डाल दिया था।
वह जैसे अपने नारीत्व के सम्पूर्ण तप और व्रत से अपने पति को अभय-दान दे रही थी। उसके अन्तःकरण से जैसे आशीर्वादों का व्यूह-सा निकल कर होरी को अपने अन्दर छिपाये लेता था।
विपन्नता के इस अथाह सागर में सोहाग ही वह तृण था, जिसे पकड़े हुए वह सागर को पार कर रही थी। इन असंगत शब्दों ने यथार्थ के निकट होने पर भी मानो झटका देकर उसके हाथ से वह तिनके का सहारा छीन लेना चाहा।
बल्कि यथार्थ के निकट होने के कारण ही उनमें इतनी वेदना-शक्ति आ गयी थी। काना कहने से काने को जो दुःख होता है, वह क्या दो आँखोंवाले आदमी को हो सकता है?
होरी क़दम बढ़ाये चला जाता था। पगडंडी के दोनों ओर ऊख के पौधों की लहराती हुई हरियाली देख कर उसने मन में कहा -- भगवान् कहीं गौं से बरखा कर दें और डाँड़ी भी सुभीते से रहे, तो एक गाय ज़रूर लेगा।
देशी गायें तो न दूध दें न उनके बछवे ही किसी काम के हों। बहुत हुआ तो तेली के कोल्हू में चले। नहीं, वह पछाईं गाय लेगा। उसकी ख़ूब सेवा करेगा। कुछ नहीं तो चार-पाँच सेर दूध होगा।
गोबर दूध के लिए तरस-तरस कर रह जाता है। इस उमिर में न खाया-पिया, तो फिर कब खायेगा। साल-भर भी दूध पी ले, तो देखने लायक़ हो जाय। बछवे भी अच्छे बैल निकलेंगे। दो सौ से कम की गोंई न होगी।
फिर, गऊ से ही तो द्वार की सोभा है। सबेरे-सबेरे गऊ के दर्शन हो जायँ तो क्या कहना। न जाने कब यह साध पूरी होगी, कब वह शुभ दिन आयेगा!
हर एक गृहस्थ की भाँति होरी के मन में भी गऊ की लालसा चिरकाल से संचित चली आती थी। यही उसके जीवन का सबसे बड़ा स्वप्न, सबसे बड़ी साध थी।
बैंक सूद से चैन करने या ज़मीन ख़रीदने या महल बनवाने की विशाल आकांक्षाएँ उसके नन्हें-से हृदय में कैसे समातीं।
जेठ का सूर्य आमों के झुरमुट में से निकलकर आकाश पर छायी हुई लालिमा को अपने रजत-प्रताप से तेज प्रदान करता हुआ ऊपर चढ़ रहा था और हवा में गमीर् आने लगी थी।
दोनों ओर खेतों में काम करनेवाले किसान उसे देखकर राम-राम करते और सम्मान-भाव से चिलम पीने का निमन्त्रण देते थे; पर होरी को इतना अवकाश कहाँ था।
उसके अन्दर बैठी हुई सम्मान-लालसा ऐसा आदर पाकर उसके सूखे मुख पर गर्व की झलक पैदा कर रही थी। मालिकों से मिलते-जुलते रहने ही का तो यह प्रसाद है कि सब उसका आदर करते हैं।
नहीं उसे कौन पूछता? पाँच बीघे के किसान की बिसात ही क्या? यह कम आदर नहीं है कि तीन-तीन, चार-चार हलवाले महतो भी उसके सामने सिर झुकाते हैं।
अब वह खेतों के बीच की पगडंडी छोड़कर एक खलेटी में आ गया था, जहाँ बरसात में पानी भर जाने के कारण तरी रहती थी और जेठ में कुछ हरियाली नज़र आती थी।
आस-पास के गाँवों की गउएँ यहाँ चरने आया करती थीं। उस समय में भी यहाँ की हवा में कुछ ताज़गी और ठंडक थी। होरी ने दो-तीन साँसें ज़ोर से लीं। उसके जी में आया, कुछ देर यहीं बैठ जाय। दिन-भर तो लू-लपट में मरना है ही।
कई किसान इस गड्ढे का पट्टा लिखाने को तैयार थे। अच्छी रक़म देते थे; पर ईश्वर भला करे राय साहब का कि उन्होंने साफ़ कह दिया, यह ज़मीन जानवरों की चराई के लिए छोड़ दी गयी है और किसी दाम पर भी न उठायी जायगी।
कोई स्वार्थी ज़मींदार होता, तो कहता, गायें जायँ भाड़ में, हमें रुपए मिलते हैं, क्यों छोड़ें। पर राय साहब अभी तक पुरानी मर्यादा निभाते आते हैं।
जो मालिक प्रजा को न पाले, वह भी कोई आदमी है?
सहसा उसने देखा, भोला अपनी गायें लिये इसी तरफ़ चला आ रहा है। भोला इसी गाँव से मिले हुए पुरवे का ग्वाला था और दूध-मक्खन का व्यवसाय करता था।
अच्छा दाम मिल जाने पर कभी-कभी किसानों के हाथ गायें बेच भी देता था। होरी का मन उन गायों को देख कर ललचा गया। अगर भोला वह आगेवाली गाय उसे दे तो क्या कहना! रुपए आगे पीछे देता रहेगा।
वह जानता था घर में रुपए नहीं हैं, अभी तक लगान नहीं चुकाया जा सका, बिसेसर साह का देना भी बाक़ी है, जिस पर आने रुपए का सूद चढ़ रहा है; लेकिन दरिद्रता में जो एक प्रकार की अदूरदर्शिता होती है, वह निर्लज्जता जो तक़ाज़े, गाली और मार से भी भयभीत नहीं होती, उसने उसे प्रोत्साहित किया।
बरसों से जो साध मन को आन्दोलित कर रही थी, उसने उसे विचलित कर दिया। भोला के समीप जाकर बोला -- राम-राम भोला भाई, कहो क्या रंग-ढंग है। सुना अबकी मेले से नयी गायें लाये हो।
भोला ने रूखाई से जवाब दिया। होरी के मन की बात उसने ताड़ ली थी -- हाँ, दो बछियें और दो गायें लाया। पहलेवाली गायें सब सूख गयी थीं। बँधी पर दूध न पहुँचे तो गुज़र कैसे हो।
होरी ने आनेवाली गाय के पुट्ठे पर हाथ रखकर कहा -- दुधार तो मालूम होती है। कितने में ली ?
भोला ने शान जमायी -- अबकी बाज़ार बड़ा तेज़ रहा महतो, इसके अस्सी रुपए देने पड़े। आँखें निकल गयीं। तीस-तीस रुपए तो दोनों कलोरों के दिये। तिस पर गाहक रुपए का आठ सेर दूध माँगता है।
— 'बड़ा भारी कलेजा है तुम लोगों का भाई, लेकिन फिर लाये भी तो वह माल कि यहाँ दस-पाँच गाँवों में तो किसी के पास निकलेगी नहीं।'
भोला पर नशा चढ़ने लगा। बोला -- राय साहब इसके सौ रुपए देते थे। दोनों कलोरों के पचास-पचास रुपए, लेकिन हमने न दिये। भगवान् ने चाहा, तो सौ रुपए इसी ब्यान में पीट लूँगा।
— 'इसमें क्या सन्देह है भाई ! मालिक क्या खाके लेंगे। नज़राने में मिल जाय, तो भले ले लें। यह तुम्हीं लोगों का गुदार् है कि अँजुली-भर रुपए तक़दीर के भरोसे गिन देते हो।'
— 'यही जी चाहता है कि इसके दरसन करता रहूँ। धन्य है तुम्हारा जीवन कि गउओं की इतनी सेवा करते हो। हमें तो गाय का गोबर भी मयस्सर नहीं।'
— 'गिरस्त के घर में एक गाय भी न हो, तो कितनी लज्जा की बात है। साल-के-साल बीत जाते हैं, गोरस के दरसन नहीं होते।'
— 'घरवाली बार-बार कहती है, भोला भैया से क्यों नहीं कहते। मैं कह देता हूँ, कभी मिलेंगे तो कहूँगा। तुम्हारे सुभाव से बड़ी परसन रहती है। कहती है, ऐसा मर्द ही नहीं देखा कि जब बातें करेंगे, नीची आँखें करके, कभी सिर नहीं उठाते।'
भोला पर जो नशा चढ़ रहा था, उसे इस भरपूर प्याले ने और गहरा कर दिया। बोला -- भला आदमी वही है, जो दूसरों की बहू-बेटी को अपनी बहू-बेटी समझे। जो दुष्ट किसी मेहरिया की ओर ताके, उसे गोली मार देना चाहिए।
— 'यह तुमने लाख रुपये की बात कह दी भाई। बस सज्जन वही, जो दूसरों की आबरू को अपनी आबरू समझे।'
— 'जिस तरह मर्द के मर जाने से औरत अनाथ हो जाती है, उसी तरह औरत के मर जाने से मर्द के हाथ-पाँव टूट जाते हैं। मेरा तो घर उजड़ गया महतो, कोई एक लोटा पानी देनेवाला भी नहीं।'
गत वर्ष भोला की स्त्री लू लग जाने से मर गयी थी। यह होरी जानता था, लेकिन पचास बरस का खंखड़ भोला भीतर से इतना स्निग्ध है, वह न जानता था। स्त्री की लालसा उसकी आँखों में सजल हो गयी थी। होरी को आसन मिल गया।
— 'पुरानी मसल झूठी थोड़ी है -- बिन घरनी घर भूत का डेरा। कहीं सगाई नहीं ठीक कर लेते?'
— 'ताक में हूँ महतो, पर कोई जल्दी फँसता नहीं। सौ-पचास ख़रच करने को भी तैयार हूँ। जैसी भगवान् की इच्छा।'
— 'अब मैं भी फ़िर्क में रहूँगा। भगवान् चाहेंगे, तो जल्दी घर बस जायगा।'
— 'बस यही समझ लो कि उबर जाऊँगा भैया! घर में खाने को भगवान् का दिया बहुत है। चार पसेरी रोज़ दूध हो जाता है, लेकिन किस काम का।'
— 'मेरे ससुराल में एक मेहरिया है। तीन-चार साल हुए, उसका आदमी उसे छोड़-कर कलकत्ते चला गया। बेचारी पिसाई करके गुज़र कर रही है। बाल-बच्चा भी कोई नहीं। देखने-सुनने में अच्छी है। बस, लच्छमी समझ लो।'
भोला का सिकुड़ा हुआ चेहरा जैसे चिकना गया। आशा में कितनी सुधा है। बोला -- अब तो तुम्हारा ही आसरा है महतो! छुट्टी हो, तो चलो एक दिन देख आयें।
— 'मैं ठीक-ठाक करके तब तुमसे कहूँगा। बहुत उतावली करने से भी काम बिगड़ जाता है।'
— 'जब तुम्हारी इच्छा हो तब चलो। उतावली काहे की। इस कबरी पर मन ललचाया हो, तो ले लो।'
— 'यह गाय मेरे मान की नहीं है दादा। मैं तुम्हें नुक़सान नहीं पहुँचाना चाहता। अपना धरम यह नहीं है कि मित्रों का गला दबायें। जैसे इतने दिन बीते हैं, वैसे और भी बीत जायेंगे।'
— 'तुम तो ऐसी बातें करते हो होरी, जैसे हम-तुम दो हैं। तुम गाय ले जाओ, दाम जो चाहे देना। जैसे मेरे घर रही, वैसे तुम्हारे घर रही। अस्सी रुपए में ली थी, तुम अस्सी रुपये ही दे देना। जाओ।'
— 'लेकिन मेरे पास नगद नहीं है दादा, समझ लो।'
— 'तो तुमसे नगद माँगता कौन है भाई!'
होरी की छाती गज़-भर की हो गयी। अस्सी रुपए में गाय मँहगी न थी। ऐसा अच्छा डील-डौल, दोनों जून में छः-सात सेर दूध, सीधी ऐसी कि बच्चा भी दुह ले। इसका तो एक-एक बाछा सौ-सौ का होगा।
द्वार पर बँधेगी तो द्वार की शोभा बढ़ जायगी। उसे अभी कोई चार सौ रुपए देने थे; लेकिन उधार को वह एक तरह से मुफ़्त समझता था। कहीं भोला की सगाई ठीक हो गयी तो साल दो साल तो वह बोलेगा भी नहीं।
सगाई न भी हुई, तो होरी का क्या बिगड़ता है। यही तो होगा, भोला बार-बार तगादा करने आयेगा, बिगड़ेगा, गालियाँ देगा। लेकिन होरी को इसकी ज़्यादा शर्म न थी। इस व्यवहार का वह आदी था।
कृषक के जीवन का तो यह प्रसाद है। भोला के साथ वह छल कर रहा था और यह व्यापार उसकी मयार्दा के अनुकूल था। अब भी लेन-देने में उसके लिए लिखा-पढ़ी होने और न होने में कोई अन्तर न था।
सूखे-बूड़े की विपदाएँ उसके मन को भी, बनाये रहती थीं। ईश्वर का रौद्र रूप सदैव उसके सामने रहता था। पर यह छल उसकी नीति में छल न था। यह केवल स्वार्थ-सिद्धि थी और यह कोई बुरी बात न थी।
इस तरह का छल तो वह दिन-रात करता रहता था। घर में दो-चार रुपये पड़े रहने पर भी महाजन के सामने क़स्में खा जाता था कि एक पाई भी नहीं है। सन को कुछ गीला कर देना और रुई में कुछ बिनौले भर देना उसकी नीति में जायज था।
और यहाँ तो केवल स्वार्थ न था, थोड़ा-सा मनोरंजन भी था। बुड्ढों का बुढ़भस हास्यास्पद वस्तु है और ऐसे बुड्ढों से अगर कुछ ऐंठ भी लिया जाय, तो कोई दोष-पाप नहीं।
भोला ने गाय की पगहिया होरी के हाथ में देते हुए कहा -- ले जाओ महतो, तुम भी याद करोगे। ब्याते ही छः सेर दूध ले लेना। चलो, मैं तुम्हारे घर तक पहुँचा दूँ।
साइत तुम्हें अनजान समझकर रास्तों में कुछ दिक करे। अब तुमसे सच कहता हूँ, मालिक नब्बे रुपए देते थे, पर उनके यहाँ गउओं की क्या क़दर। मुझसे लेकर किसी हाकिम-हुक्काम को दे देते।
हाकिमों को गऊ की सेवा से मतलब। वह तो ख़ून चूसना-भर जानते हैं। जब तक दूध देती, रखते, फिर किसी के हाथ बेच देते। किसके पल्ले पड़ती कौन जाने।
रुपया ही सब कुछ नहीं है भैया, कुछ अपना धरम भी तो है। तुम्हारे घर आराम से रहेगी तो। यह न होगा कि तुम आप खाकर सो रहो और गऊ भूखी खड़ी रहे। उसकी सेवा करोगे, चुमकारोगे। गऊ हमें आसिरवाद देगी।
तुमसे क्या कहूँ भैया, घर में चंगुल भर भी भूसा नहीं रहा। रुपए सब बाज़ार में निकल गये। सोचा था महाजन से कुछ लेकर भूसा ले लेंगे; लेकिन महाजन का पहला ही नहीं चुका। उसने इनकार कर दिया।
इतने जानवरों को क्या खिलावें, यही चिन्ता मारे डालती है। चुटकी-चुटकी भर खिलाऊँ, तो मन-भर रोज़ का ख़रच है। भगवान् ही पार लगायें तो लगे।
होरी ने सहानुभूति के स्वर में कहा -- तुमने हमसे पहले क्यों नहीं कहा? हमने एक गाड़ी भूसा बेच दिया।
भोला ने माथा ठोककर कहा -- इसीलिए नहीं कहा भैया कि सबसे अपना दुःख क्यों रोऊँ। बाँटता कोई नहीं, हँसते सब हैं। जो गायें सूख गयी हैं उनका ग़म नहीं, पत्ती-सत्ती खिलाकर जिला लूँगा।
लेकिन अब यह तो रातिब बिना नहीं रह सकती। हो सके, तो दस-बीस रुपये भूसे के लिए दे दो।
किसान पक्का स्वार्थी होता है, इसमें सन्देह नहीं। उसकी गाँठ से रिश्वत के पैसे बड़ी मुश्किल से निकलते हैं, भाव-ताव में भी वह चौकस होता है, ब्याज की एक-एक पाई छुड़ाने के लिए वह महाजन की घंटों चिरौरी करता है।
जब तक पक्का विश्वास न हो जाय, वह किसी के फुसलाने में नहीं आता, लेकिन उसका सम्पूर्ण जीवन प्रकृति से स्थायी सहयोग है।
वृक्षों में फल लगते हैं, उन्हें जनता खाती है; खेती में अनाज होता है, वह संसार के काम आता है; गाय के थन में दूध होता है, वह ख़ुद पीने नहीं जाती दूसरे ही पीते हैं; मेघों से वर्षा होती है, उससे पृथ्वी तृप्त होती है।
ऐसी संगति में कुत्सित स्वार्थ के लिए कहाँ स्थान। होरी किसान था और किसी के जलते हुए घर में हाथ सेंकना उसने सीखा ही न था।
भोला की संकट-कथा सुनते ही उसकी मनोवृत्ति बदल गयी। पगहिया को भोला के हाथ में लौटाता हुआ बोला -- रुपए तो दादा मेरे पास नहीं हैं, हाँ थोड़ा-सा भूसा बचा है, वह तुम्हें दूँगा। चलकर उठवा लो।
— 'भूसे के लिए तुम गाय बेचोगे, और मैं लूँगा। मेरे हाथ न कट जायेंगे?'
भोला ने आर्द्र कंठ से कहा -- तुम्हारे बैल भूखों न मरेंगे! तुम्हारे पास भी ऐसा कौन-सा बहुत-सा भूसा रखा है।
— 'नहीं दादा, अबकी भूसा अच्छा हो गया था।'
— 'मैंने तुमसे नाहक़ भूसे की चर्चा की।'
— 'तुम न कहते और पीछे से मुझे मालूम होता, तो मुझे बड़ा रंज होता कि तुमने मुझे इतना ग़ैर समझ लिया। अवसर पड़ने पर भाई की मदद भाई भी न करे, तो काम कैसे चले।'
— 'मुदा यह गाय तो लेते जाओ।'
— 'अभी नहीं दादा, फिर ले लूंगा।'
— 'तो भूसे के दाम दूध में कटवा लेना।'
होरी ने दुःखित स्वर में कहा -- दाम-कौड़ी की इसमें कौन बात है दादा, मैं एक-दो जून तुम्हारे घर खा लूँ, तो तुम मुझसे दाम मांगोगे?
— ' लेकिन तुम्हारे बैल भूखों मरेंगे कि नहीं? '
— ' भगवान् कोई-न-कोई सबील निकालेंगे ही। असाढ़ सिर पर है। कड़बी बो लूंगा.'
— ' मगर यह गाय तुम्हारी हो गई। जिस दिन इच्छा हो आकर ले जाना.'
— ' किसी भाई का नीलाम पर चढ़ा हुआ बैल लेने में जो पाप है, वह इस समय तुम्हारी गाय लेने में है.'
होरी में बाल की खाल निकालने की शक्ति होती, तो वह ख़ुशी से गाय लेकर घर की राह लेता।
भोला जब नक़द रुपए नहीं माँगता तो स्पष्ट था कि वह भूसे के लिए गाय नहीं बेच रहा है, बल्कि इसका कुछ और आशय है;
लेकिन जैसे पत्तों के खड़कने पर घोड़ा अकारण ही ठिठक जाता है और मारने पर भी आगे क़दम नहीं उठाता वही दसा होरी की थी।
संकट की चीज़ लेना पाप है, यह बात जन्म-जन्मान्तरों से उसकी आत्मा का अंश बन गयी थी।
भोला ने गद् गद कंठ से कहा -- तो किसी को भेज दूँ भूसे के लिए?
होरी ने जवाब दिया-- अभी मैं राय साहब की डयोढ़ी पर जा रहा हूँ। वहाँ से घड़ी-भर में लौटूंगा, तभी किसी को भेजना।
भोला की आँखों में आँसू भर आये। बोला -- तुमने आज मुझे उबार लिया होरी भाई! मुझे अब मालूम हुआ कि मैं संसार में अकेला नहीं हूँ। मेरा भी कोई हितू है।
एक क्षण के बाद उसने फिर कहा -- उस बात को भूल न जाना।
होरी आगे बढ़ा, तो उसका चित्त प्रसन्न था। मन में एक विचित्र स्फूर्ति हो रही थी।
क्या हुआ, दस-पाँच मन भूसा चला जायगा, बेचारे को संकट में पड़ कर अपनी गाय तो न बेचनी पड़ेगी।
जब मेरे पास चारा हो जायगा, तब गाय खोल लाऊँगा। भगवान् करें, मुझे कोई मेहरिया मिल जाय। फिर तो कोई बात ही नहीं।
उसने पीछे फिर कर देखा। कबरी गाय पूँछ से मक्खियाँ उड़ाती, सिर हिलाती, मस्तानी, मन्द-गति से झूमती चली जाती थी, जैसे बाँदियों के बीच में कोई रानी हो।
कैसा शुभ होगा वह दिन, जब यह कामधेनु उसके द्वार पर बंधेगी!
सेमरी और बेलारी दोनों अवध-प्रान्त के गाँव हैं। ज़िले का नाम बताने की कोई ज़रूरत नहीं। होरी बेलारी में रहता है, राय साहब अमरपाल सिंह सेमरी में। दोनों गाँवों में केवल पाँच मील का अन्तर है।
पिछले सत्याग्रह-संग्राम में राय साहब ने बड़ा यश कमाया था। कौंसिल की मेम्बरी छोड़कर जेल चले गये थे। तब से उनके इलाक़े के असामियों को उनसे बड़ी श्रद्धा हो गयी थी।
यह नहीं कि उनके इलाक़े में असामियों के साथ कोई ख़ास रियायत की जाती हो, या डाँड़ और बेगार की कड़ाई कुछ कम हो; मगर यह सारी बदनामी मुख़्तारों के सिर जाती थी।
राय साहब की सज्जनता उस पर कोई असर न डाल सकती थी; इसलिए आमदनी और अधिकार में जौ-भर की भी कमी न होने पर भी उनका यश मानो बढ़ गया था। असामियों से वह हँस कर बोल लेते थे। यही क्या कम है ?
सिंह का काम तो शिकार करना है; अगर वह गरजने और गुरार्ने के बदले मीठी बोली बोल सकता, तो उसे घर बैठे मनमाना शिकार मिल जाता। शिकार की खोज में जंगल में न भटकना पड़ता।
राय साहब राष्ट्रवादी होने पर भी हुक्काम से मेल-जोल बनाये रखते थे। उनकी नज़रें और डालियाँ और कर्मचारियों की दस्तूरियाँ जैसी की तैसी चली आती थीं।
साहित्य और संगीत के प्रेमी थे, ड्रामा के शौक़ीन, अच्छे वक्ता थे, अच्छे लेखक, अच्छे निशाने-बाज़। उनकी पत्नी को मरे आज दस साल हो चुके थे; मगर दूसरी शादी न की थी। हँस-बोलकर अपने विधुर जीवन को बहलाते रहते थे।
होरी ड्योढ़ी पर पहुँचा तो देखा जेठ के दशहरे के अवसर पर होनेवाले धनुष-यज्ञ की बड़ी ज़ोरों से तैयारियाँ हो रही हैं। कहीं रंग-मंच बन रहा था, कहीं मंडप, कहीं मेहमानों का आतिथ्य-गृह, कहीं दूकानदारों के लिए दूकानें।
धूप तेज़ हो गयी थी; पर राय साहब ख़ुद काम में लगे हुए थे। अपने पिता से सम्पत्ति के साथ-साथ उन्होंने राम की भक्ति भी पायी थी और धनुष-यज्ञ को नाटक का रूप देकर उसे शिष्ट मनोरंजन का साधन बना दिया था।
इस अवसर पर उनके यार-दोस्त, हाकिम-हुक्काम सभी निमंत्रित होते थे। और दो-तीन दिन इलाक़े में बड़ी चहल-पहल रहती थी। राय साहब का परिवार बहुत विशाल था। कोई डेढ़ सौ सरदार एक साथ भोजन करते थे।
कई चचा थे, दरजनों चचेरे भाई, कई सगे भाई, बीसियों नाते के भाई। एक चचा साहब राधा के अनन्य उपासक थे और बराबर वृन्दाबन में रहते थे।
भक्ति-रस के कितने ही कविता रच डाले थे और समय-समय पर उन्हें छपवाकर दोस्तों की भेंट कर देते थे। एक दूसरे चचा थे, जो राम के परमभक्त थे और फ़ारसी-भाषा में रामायण का अनुवाद कर रहे थे। रियासत से सबके वसीके बँधे हुए थे। किसी को कोई काम करने की ज़रूरत न थी।
होरी मंडप में खड़ा सोच रहा था कि अपने आने की सूचना कैसे दे कि सहसा राय साहब उधर ही आ निकले और उसे देखते ही बोले --अरे ! तू आ गया होरी, मैं तो तुझे बुलवानेवाला था।
— 'देख, अबकी तुझे राजा जनक का माली बनना पड़ेगा। समझ गया न, जिस वक़्त जानकी जी मन्दिर में पूजा करने जाती हैं, उसी वक़्त तू एक गुलदस्ता लिये खड़ा रहेगा और जानकी जी की भेंट करेगा।'
— 'ग़लती न करना और देख, असामियों से ताकीद करके कह देना कि सब-के-सब शगुन करने आयें। मेरे साथ कोठी में आ, तुझसे कुछ बातें करनी हैं।'
वह आगे-आगे कोठी की ओर चले, होरी पीछे-पीछे चला। वहीं एक घने वृक्ष की छाया में एक कुरसी पर बैठ गये और होरी को ज़मीन पर बैठने का इशारा करके बोले -- समझ गया, मैंने क्या कहा।
— 'कारकुन को तो जो कुछ करना है, वह करेगा ही, लेकिन असामी जितने मन से असामी की बात सुनता है, कारकुन की नहीं सुनता। हमें इन्हीं पाँच-सात दिनों में बीस हज़ार का प्रबन्ध करना है।'
— 'कैसे होगा, समझ में नहीं आता। तुम सोचते होगे, मुझ टके के आदमी से मालिक क्यों अपना दुखड़ा ले बैठे। किससे अपने मन की कहूँ ? न जाने क्यों तुम्हारे ऊपर विश्वास होता है।'
— 'और वे क्यों न हँसेंगे। मैं भी तो उनकी दुर्दशा और विपत्ति और पतन पर हँसता हूँ, दिल खोलकर, तालियाँ बजाकर। सम्पत्ति और सहृदयता में वैर है। हम भी दान देते हैं, धर्म करते हैं।'
— 'लेकिन जानते हो, क्यों ? केवल अपने बराबरवालों को नीचा दिखाने के लिए। हमारा दान और धर्म कोरा अहंकार है, विशुद्ध अहंकार।'
— 'हम में से किसी पर डिग्री हो जाय, क़ुर्क़ी आ जाय, बक़ाया मालगुज़ारी की इल्लत में हवालात हो जाय, किसी का जवान बेटा मर जाय, किसी की विधवा बहू निकल जाय, किसी के घर में आग लग जाय, कोई किसी वेश्या के हाथों उल्लू बन जाय, या अपने असामियों के हाथों पिट जाय, तो उसके और सभी भाई उस पर हँसेंगे, बग़लें बजायेंगे...'
— 'अरे, और तो और, हमारे चचेरे, फुफेरे, ममेरे, मौसेरे भाई जो इसी रियासत की बदौलत मौज उड़ा रहे हैं, वह भी मुझसे जलते हैं, और आज मर जाऊँ तो घी के चिराग़ जलायें। मेरे दुःख को दुःख समझनेवाला कोई नहीं।'
— 'उनकी नज़रों में मुझे दुखी होने का कोई अधिकार ही नहीं है। मैं अगर रोता हूँ, तो दुःख की हँसी उड़ाता हूँ। मैं अगर बीमार होता हूँ, तो मुझे सुख होता है।'
— 'मैं अगर अपना ब्याह करके घर में कलह नहीं बढ़ाता तो यह मेरी नीच स्वार्थपरता है; अगर ब्याह कर लूँ, तो वह विलासान्धता होगी। अगर शराब नहीं पीता तो मेरी कंजूसी है। शराब पीने लगूँ, तो वह प्रजा का रक्त होगा।'
— 'अगर ऐयाशी नहीं करता, तो अरसिक हूँ, ऐयाशी करने लगूँ, तो फिर कहना ही क्या। इन लोगों ने मुझे भोग-विलास में फँसाने के लिए कम चालें नहीं चलीं और अब तक चलते जाते हैं।'
— 'उनकी यही इच्छा है कि मैं अन्धा हो जाऊँ और ये लोग मुझे लूट लें, और मेरा धर्म यह है कि सब कुछ देखकर भी कुछ न देखूँ। सब कुछ जानकर भी गधा बना रहूँ।'
राय साहब ने गाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए दो बीड़े पान खाये और होरी के मुँह की ओर ताकने लगे, जैसे उसके मनोभावों को पढ़ना चाहते हों।
होरी ने साहस बटोरकर कहा -- 'हम समझते थे कि ऐसी बातें हमीं लोगों में होती हैं, पर जान पड़ता है, बड़े आदमियों में उनकी कमी नहीं है।'
— 'राय साहब ने मुँह पान से भरकर कहा -- तुम हमें बड़ा आदमी समझते हो ? हमारे नाम बड़े हैं, पर दर्शन थोड़े। ग़रीबों में अगर ईर्ष्या या वैर है तो स्वार्थ के लिए या पेट के लिए। ऐसी ईर्ष्या और वैर को मैं क्षम्य समझता हूँ।'
— 'हमारे मुँह की रोटी कोई छीन ले तो उसके गले में उँगली डालकर निकालना हमारा धर्म हो जाता है। अगर हम छोड़ दें, तो देवता हैं। बड़े आदमियों की ईर्ष्या और वैर केवल आनन्द के लिए है।'
— 'हम इतने बड़े आदमी हो गये हैं कि हमें नीचता और कुटिलता में ही निःस्वार्थ और परम आनन्द मिलता है। हम देवतापन के उस दर्जे पर पहुँच गये हैं जब हमें दूसरों के रोने पर हँसी आती है। इसे तुम छोटी साधना मत समझो।'
— 'जब इतना बड़ा कुटुम्ब है, तो कोई-न-कोई तो हमेशा बीमार रहेगा ही। और बड़े आदमियों के रोग भी बड़े होते हैं। वह बड़ा आदमी ही क्या, जिसे कोई छोटा रोग हो।'
— 'मामूली ज्वर भी आ जाय, तो हमें सरसाम की दवा दी जाती है, मामूली फुंसी भी निकल आये, तो वह ज़हरबाद बन जाती है। अब छोटे सर्जन और मझोले सर्जन और बड़े सर्जन तार से बुलाये जा रहे हैं...'
— 'उधर देवालय में दुर्गापाठ हो रहा है और ज्योतिषाचार्य कुंडली का विचार कर रहे हैं। राजा साहब को यमराज के मुँह से निकालने के लिए दौड़ लगी हुई है। और ये रुपए तुमसे और तुम्हारे भाइयों से वसूल किये जाते हैं, भाले की नोक पर।'
— 'मुझे तो यही आश्चर्य होता है कि क्यों तुम्हारी आहों का दावानल हमें भस्म नहीं कर डालता; मगर नहीं, आश्चर्य करने की कोई बात नहीं। भस्म होने में तो बहुत देर नहीं लगती, वेदना भी थोड़ी ही देर की होती है। हम जौ-जौ और अंगुल-अंगुल और पोर-पोर भस्म हो रहे हैं।'
— 'उस हाहाकार से बचने के लिए हम पुलिस की, हुक्काम की, अदालत की, वकीलों की शरण लेते हैं। और रूपवती स्त्री की भाँति सभी के हाथों का खिलौना बनते हैं। दुनिया समझती है, हम बड़े सुखी हैं।'
— 'हमारे पास इलाक़े, महल, सवारियाँ, नौकर-चाकर, क़रज़, वेश्याएँ, क्या नहीं हैं, लेकिन जिसकी आत्मा में बल नहीं, अभिमान नहीं, वह और चाहे कुछ हो, आदमी नहीं है।'
— 'जिसे दुश्मन के भय के मारे रात को नींद न आती हो, जिसके दुःख पर सब हँसें और रोनेवाला कोई न हो, जिसकी चोटी दूसरों के पैरों के नीचे दबी हो... उसे मैं सुखी नहीं कहता। वह तो संसार का सबसे अभागा प्राणी है।'
— 'साहब शिकार खेलने आयें या दौरे पर, मेरा कर्तव्य है कि उनकी दुम के पीछे लगा रहूँ। उनकी भौंहों पर शिकन पड़ी और हमारे प्राण सूखे। उन्हें प्रसन्न करने के लिए हम क्या नहीं करते।'
— 'मगर वह पचड़ा सुनाने लगूँ तो शायद तुम्हें विश्वास न आये। डालियों और रिश्वतों तक तो ख़ैर ग़नीमत है, हम सिजदे करने को भी तैयार रहते हैं। मुफ़्तख़ोरी ने हमें अपंग बना दिया है...'
— 'केवल अफ़सरों के सामने दुम हिला-हिलाकर किसी तरह उनके कृपापात्र बने रहना और उनकी सहायता से अपनी प्रजा पर आतंक ज़माना ही हमारा उद्यम है। पिछलगुओं की ख़ुशामद ने हमें इतना अभिमानी और तुनकमिज़ाज बना दिया है कि हममें शील, विनय और सेवा का लोप हो गया है।'
— 'मैं तो कभी-कभी सोचता हूँ कि अगर सरकार हमारे इलाक़े छीनकर हमें अपनी रोज़ी के लिए मेहनत करना सिखा दे तो हमारे साथ महान उपकार करे। लक्षण कह रहे हैं कि बहुत जल्द हमारे वर्ग की हस्ती मिट जानेवाली है।'
— 'मैं उस दिन का स्वागत करने को तैयार बैठा हूँ। ईश्वर वह दिन जल्द लाये। वह हमारे उद्धार का दिन होगा। हम परिस्थतियों के शिकार बने हुए हैं। यह परिस्थिति ही हमारा सर्वनाश कर रही है...'
— 'जब तक सम्पत्ति की यह बेड़ी हमारे पैरों से न निकलेगी, जब तक यह अभिशाप हमारे सिर पर मँडराता रहेगा, हम मानवता का वह पद न पा सकेंगे जिस पर पहुँचना ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य है।'
राय साहब ने फिर गिलौरी-दान निकाला और कई गिलौरियाँ निकालकर मुँह में भर लीं। कुछ और कहने वाले थे कि एक चपरासी ने आकर कहा -- 'सरकार बेगारों ने काम करने से इनकार कर दिया है। कहते हैं, जब तक हमें खाने को न मिलेगा हम काम न करेंगे। हमने धमकाया, तो सब काम छोड़कर अलग हो गये।'
राय साहब के माथे पर बल पड़ गये। आँखें निकालकर बोले -- 'चलो, मैं इन दुष्टों को ठीक करता हूँ। जब कभी खाने को नहीं दिया, तो आज यह नयी बात क्यों ? एक आने रोज़ के हिसाब से मजूरी मिलेगी, जो हमेशा मिलती रही है; और इस मजूरी पर उन्हें काम करना होगा, सीधे करें या टेढ़े।'
फिर होरी की ओर देखकर बोले -- 'तुम अब जाओ होरी, अपनी तैयारी करो। जो बात मैंने कही है, उसका ख़याल रखना। तुम्हारे गाँव से मुझे कम-से-कम पाँच सौ की आशा है।'
राय साहब झल्लाते हुए चले गये। होरी ने मन में सोचा, अभी यह कैसी-कैसी नीति और धरम की बातें कर रहे थे और एकाएक इतने गरम हो गये!
सूर्य सिर पर आ गया था। उसके तेज से अभिभूत होकर वृक्षों ने अपना पसार समेट लिया था। आकाश पर मिटयाला गर्द छाया हुआ था और सामने की पृथ्वी काँपती हुई जान पड़ती थी।
होरी ने अपना डंडा उठाया और घर चला। शगून के रुपये कहाँ से आयेंगे, यही चिन्ता उसके सिर पर सवार थी।
होरी अपने गाँव के समीप पहुँचा, तो देखा, अभी तक गोबर खेत में ऊख गोड़ रहा है और दोनों लड़कियाँ भी उसके साथ काम कर रही हैं। लू चल रही थी, बगूले उठ रहे थे, भूतल धधक रहा था। जैसे प्रकृति ने वायु में आग घोल दिया हो।
यह सब अभी तक खेत में क्यों हैं? क्या काम के पीछे सब जान देने पर तुले हुए हैं? वह खेत की ओर चला और दूर ही से चिल्लाकर बोला -- आता क्यों नहीं गोबर, क्या काम ही करता रहेगा? दोपहर ढल गया, कुछ सूझता है कि नहीं?
उसे देखते ही तीनों ने कुदालें उठा लीं और उसके साथ हो लिये। गोबर साँवला, लम्बा, एकहरा युवक था, जिसे इस काम से रुचि न मालूम होती थी। प्रसन्नता की जगह मुख पर असन्तोष और विद्रोह था।
वह इसलिये काम में लगा हुआ था कि वह दिखाना चाहता था, उसे खाने-पीने की कोई फ़िक्र नहीं है। बड़ी लड़की सोना लज्जा-शील कुमारी थी, साँवली, सुडौल, प्रसन्न और चपल।
गाढ़े की लाल साड़ी जिसे वह घुटनों से मोड़ कर कमर में बाँधे हुए थी, उसके हलके शरीर पर कुछ लदी हुई सी थी, और उसे प्रौढ़ता की गरिमा दे रही थी।
छोटी रूपा पाँच-छः साल की छोकरी थी, मैली, सिर पर बालों का एक घोंसला-सा बना हुआ, एक लँगोटी कमर में बाँधे, बहुत ही ढीठ और रोनी।
— 'रूपा ने होरी की टाँगों में लिपट कर कहा -- काका! देखो, मैने एक ढेला भी नहीं छोड़ा। बहन कहती है, जा पेड़ तले बैठ। ढेले न तोड़े जायँगे काका, तो मिट्टी कैसे बराबर होगी।'
होरी ने उसे गोद में उठाकर प्यार करते हुए कहा -- तूने बहुत अच्छा किया बेटी, चल घर चलें। कुछ देर अपने विद्रोह को दबाये रहने के बाद गोबर बोला -- यह तुम रोज़-रोज़ मालिकों की ख़ुशामद करने क्यों जाते हो?
— 'बाक़ी न चुके तो प्यादा आकर गालियाँ सुनाता है, बेगार देनी ही पड़ती है, नज़र-नज़राना सब तो हमसे भराया जाता है। फिर किसी की क्यों सलामी करो!'
— 'बोला -- सलामी करने न जायँ, तो रहें कहाँ। भगवान् ने जब ग़ुलाम बना दिया है तो अपना क्या बस है। यह इसी सलामी की बरकत है कि द्वार पर मड़ैया डाल ली और किसी ने कुछ नहीं कहा।'
— 'घूरे ने द्वार पर खूँटा गाड़ा था, जिस पर कारिन्दों ने दो रुपए डाँड़ ले लिये थे। तलैया से कितनी मिट्टी हमने खोदी, कारिन्दा ने कुछ नहीं कहा। दूसरा खोदे तो नज़र देनी पड़े।'
— 'अपने मतलब के लिए सलामी करने जाता हूँ, पाँव में सनीचर नहीं है और न सलामी करने में कोई बड़ा सुख मिलता है। घंटों खड़े रहो, तब जाके मालिक को ख़बर होती है।'
— 'गोबर ने कटाक्ष किया -- बड़े आदमियों की हाँ-में-हाँ मिलाने में कुछ-न-कुछ आनन्द तो मिलता ही है। नहीं लोग मेम्बरी के लिए क्यों खड़े हों?'
— 'जब सिर पर पड़ेगी तब मालूम होगा बेटा, अभी जो चाहे कह लो। पहले मैं भी यही सब बातें सोचा करता था; पर अब मालूम हुआ कि हमारी गरदन दूसरों के पैरों के नीचे दबी हुई है अकड़ कर निबाह नहीं हो सकता।'
पिता पर अपना क्रोध उतारकर गोबर कुछ शान्त हो गया और चुपचाप चलने लगा। सोना ने देखा, रूपा बाप की गोद में चढ़ी बैठी है तो ईर्ष्या हुई। उसे डाँटकर बोली -- अब गोद से उतरकर पाँव-पाँव क्यों नहीं चलती, क्या पाँव टूट गये हैं?
— 'रूपा ने बाप की गरदन में हाथ डालकर ढिठाई से कहा -- न उतरेंगे जाओ। काका, बहन हमको रोज़ चिढ़ाती है कि तू रूपा है, मैं सोना हूँ। मेरा नाम कुछ और रख दो।'
होरी ने सोना को बनावटी रोष से देखकर कहा -- तू इसे क्यों चिढ़ाती है सोनिया? सोना तो देखने को है। निबाह तो रूपा से होता है। रूपा न हो, तो रुपए कहाँ से बनें, बता।
— 'सोना ने अपने पक्ष का समर्थन किया -- सोना न हो मोहन कैसे बने, नथुनियाँ कहाँ से आयें, कंठा कैसे बने?'
गोबर भी इस विनोदमय विवाद में शरीक हो गया। रूपा से बोला -- तू कह दे कि सोना तो सूखी पत्ती की तरह पीला है, रूपा तो उजला होता है जैसे सूरज।
— 'सोना बोली -- शादी-ब्याह में पीली साड़ी पहनी जाती है, उजली साड़ी कोई नहीं पहनता।' रूपा इस दलील से परास्त हो गयी।
होरी को एक नयी युक्ति सूझ गयी। बोला -- सोना बड़े आदमियों के लिए है। हम ग़रीबों के लिए तो रूपा ही है। जैसे जौ को राजा कहते हैं, गेहूँ को चमार; इसलिए न कि गेहूँ बड़े आदमी खाते हैं, जौ हम लोग खाते हैं।
— 'सोना के पास इस सबल युक्ति का कोई जवाब न था। परास्त होकर बोली -- तुम सब जने एक ओर हो गये, नहीं रुपिया को रुलाकर छोड़ती।'
— 'रूपा ने उँगली मटकाकर कहा -- ए राम, सोना चमार -- ए राम, सोना चमार।' इस विजय का उसे इतना आनन्द हुआ कि बाप की गोद में रह न सकी।
ज़मीन पर कूद पड़ी और उछल-उछलकर यही रट लगाने लगी -- रूपा राजा, सोना चमार -- रूपा राजा, सोना चमार!
— 'ये लोग घर पहुँचे तो धनिया द्वार पर खड़ी इनकी बाट जोह रही थी। रुष्ट होकर बोली -- आज इतनी देर क्यों की गोबर? काम के पीछे कोई परान थोड़े ही दे देता है।'
— 'फिर पति से गर्म होकर कहा -- तुम भी वहाँ से कमाई करके लौटे तो खेत में पहुँच गये। खेत कहीं भागा जाता था!'
द्वार पर कुआँ था। होरी और गोबर ने एक-एक कलसा पानी सिर पर उँड़ेला, रूपा को नहलाया और भोजन करने गये। जौ की रोटियाँ थीं; अरहर की दाल थी जिसमें कच्चे आम पड़े हुए थे।
रूपा बाप की थाली में खाने बैठी। सोना ने उसे ईर्ष्या-भरी आँखों से देखा, मानो कह रही थी, वाह रे दुलार!
— 'धनिया ने पूछा -- मालिक से क्या बात-चीत हुई?' होरी ने लोटा-भर पानी चढ़ाते हुए कहा -- यही तहसील-वसूल की बात थी और क्या।
— 'हम लोग समझते हैं, बड़े आदमी बहुत सुखी होंगे; लेकिन सच पूछो, तो वह हमसे भी ज़्यादा दुःखी हैं। हमें अपने पेट ही की चिन्ता है, उन्हें हज़ारों चिन्ताएँ घेरे रहती हैं।'
— 'गोबर ने व्यंग्य किया -- तो फिर अपना इलाक़ा हमें क्यों नहीं दे देते! हम अपने खेत, बैल, हल, कुदाल सब उन्हें देने को तैयार हैं। करेंगे बदला? यह सब धूर्तता है, निरी मोटमरदी।'
— 'जिसे दुःख होता है, वह दरजनों मोटरें नहीं रखता, महलों में नहीं रहता, हलवा-पूरी नहीं खाता और न नाच-रंग में लिप्त रहता है। मज़े से राज का सुख भोग रहे हैं, उस पर दुखी हैं!'
— 'होरी ने झुँझलाकर कहा -- अब तुमसे बहस कौन करे भाई! जैजात किसी से छोड़ी जाती है कि वही छोड़ देंगे। हमीं को खेती से क्या मिलता है? एक आने नफ़री की मजूरी भी तो नहीं पड़ती।'
— 'जो दस रुपए महीने का भी नौकर है, वह भी हमसे अच्छा खाता-पहनता है, लेकिन खेतों को छोड़ा तो नहीं जाता। खेती छोड़ दें, तो और करें क्या? नौकरी कहीं मिलती है?'
— 'फिर मरजाद भी तो पालना ही पड़ता है। खेती में जो मरजाद है वह नौकरी में तो नहीं है। इसी तरह ज़मींदारों का हाल भी समझ लो! उनकी जान को भी तो सैकड़ों रोग लगे हुए हैं।'
— 'हाकिमों को रसद पहुँचाओ, उनकी सलामी करो, अमलों को ख़ुश करो। तारीख़ पर मालगुज़ारी न चुका दें, तो हवालात हो जाय, कुड़की आ जाय। हमें तो कोई हवालात नहीं ले जाता।'
— 'गोबर ने प्रतिवाद किया -- यह सब कहने की बातें हैं। हम लोग दाने-दाने को मुहताज हैं, देह पर साबित कपड़े नहीं हैं, चोटी का पसीना एड़ी तक आता है, तब भी गुज़र नहीं होता।'
— 'उन्हें क्या, मज़े से गद्दी-मसनद लगाये बैठे हैं, सैकड़ों नौकर-चाकर हैं, हज़ारों आदमियों पर हुकूमत है। रुपए न जमा होते हों; पर सुख तो सभी तरह का भोगते हैं।'
— 'तुम्हारी समझ में हम और वह बराबर हैं?' होरी ने पूछा। गोबर बोला -- 'भगवान् ने तो सबको बराबर ही बनाया है।'
— 'होरी ने कहा -- यह बात नहीं है बेटा, छोटे-बड़े भगवान् के घर से बनकर आते हैं। सम्पत्ति बड़ी तपस्या से मिलती है। उन्होंने पूर्वजन्म में जैसे कर्म किये हैं, उनका आनन्द भोग रहे हैं।'
— 'गोबर बोला -- यह सब मन को समझाने की बातें हैं। भगवान् सबको बराबर बनाते हैं। यहाँ जिसके हाथ में लाठी है, वह ग़रीबों को कुचलकर बड़ा आदमी बन जाता है।'
— 'होरी ने कहा -- यह तुम्हारा भरम है। मालिक आज भी चार घंटे रोज़ भगवान् का भजन करते हैं।' गोबर ने पूछा -- 'किसके बल पर यह भजन-भाव और दान-धर्म होता है?'
— 'अपने बल पर।' होरी ने उत्तर दिया। गोबर बोला -- 'नहीं, किसानों के बल पर और मज़दूरों के बल पर। यह पाप का धन पचे कैसे? इसीलिए दान-धर्म करना पड़ता है। भजन भी इसीलिए होता है।'
— 'होरी ने हार कर कहा -- अब तुम्हारे मुँह कौन लगे भाई, तुम तो भगवान् की लीला में भी टाँग अड़ाते हो।'
तीसरे पहर गोबर कुदाल लेकर चला, तो होरी ने कहा -- ज़रा ठहर जाओ बेटा, हम भी चलते हैं। तब तक थोड़ा-सा भूसा निकालकर रख दो। मैंने भोला को देने को कहा है। बेचारा आजकल बहुत तंग है।
— 'गोबर ने अवज्ञा-भरी आँखों से देखकर कहा -- हमारे पास बेचने को भूसा नहीं है। होरी बोला -- बेचता नहीं हूँ भाई, यों ही दे रहा हूँ। वह संकट में है, उसकी मदद तो करनी ही पड़ेगी।'
— 'गोबर ने कहा -- हमें तो उन्होंने कभी एक गाय नहीं दे दी। होरी ने क़सम खायी -- नहीं, जवानी क़सम, अपनी पछाई गाय दे रहे थे। हाथ तंग है, भूसा-चारा नहीं रख सके।'
— 'होरी बोला -- अब एक गाय बेचकर भूसा लेना चाहते हैं। मैंने सोचा, संकट में पड़े आदमी की गाय क्या लूँगा। थोड़ा-सा भूसा दिये देता हूँ, कुछ रुपए हाथ आ जायँगे तो गाय ले लूँगा।'
— 'गोबर ने आड़े हाथों लिया -- तुम्हारा यही धमार्त्मापन तो तुम्हारी दुर्गत कर रहा है। साफ़-साफ़ तो बात है। अस्सी रुपए की गाय है, हमसे बीस रुपए का भूसा ले लें ओर गाय हमें दे दें।'
होरी रहस्यमय ढंग से मुस्कुराया -- मैंने ऐसी चाल सोची है कि गाय सेंत-मेंत में हाथ आ जाय। कहीं भोला की सगाई ठीक करनी है, बस। दो-चार मन भूसा तो ख़ाली अपना रंग जमाने को देता हूँ।
— 'गोबर ने तिरस्कार किया -- तो तुम अब सब की सगाई ठीक करते फिरोगे?' धनिया ने तीखी आँखों से देखा -- 'अब यही एक उद्यम तो रह गया है। नहीं देना है हमें भूसा किसी को।'
होरी ने अपनी सफ़ाई दी -- अगर मेरे जतन से किसी का घर बस जाय, तो इसमें कौन-सी बुराई है? गोबर ने चिलम उठाई और आग लेने चला गया। उसे यह झमेला बिल्कुल नहीं भाता था।
— 'धनिया ने सिर हिला कर कहा -- जो उनका घर बसायेगा, वह अस्सी रुपए की गाय लेकर चुप न होगा। एक थैली गिनवायेगा।' होरी ने पुचारा दिया -- 'यह मैं जानता हूँ; लेकिन उनकी भलमनसी को भी तो देखो।'
— 'मुझसे जब मिलता है, तेरा बखान ही करता है -- ऐसी लक्ष्मी है, ऐसी सलीके-दार है।' धनिया के मुख पर स्निग्धता झलक पड़ी। बोली -- 'मैं उनके बखान की भूखी नहीं हूँ, अपना बखान धरे रहें।'
होरी ने स्नेह-भरी मुस्कान के साथ कहा -- मैंने तो कह दिया, भैया, वह नाक पर मक्खी भी नहीं बैठने देती, गालियों से बात करती है; लेकिन वह यही कहे जाय कि वह औरत नहीं लक्ष्मी है।
— 'कहता था, जिस दिन तुम्हारी घरवाली का मुँह सबेरे देख लेता हूँ, उस दिन कुछ-न-कुछ ज़रूर हाथ लगता है। मैंने कहा -- तुम्हारे हाथ लगता होगा, यहाँ तो रोज़ देखते हैं, कभी पैसे से भेंट नहीं होती।'
— 'होरी बोला -- लगा अपनी घरवाली की बुराई करने -- भिखारी को भीख तक नहीं देती थी, झाड़ू लेकर मारने दौड़ती थी, लालचिन ऐसी थी कि नमक तक दूसरों के घर से माँग लाती थी!'
— 'धनिया बोली -- मरने पर किसी की क्या बुराई करूँ। मुझे देखकर जल उठती थी। होरी बोला -- भोला बड़ा ग़मख़ोर था कि उसके साथ निबाह कर दिया। दूसरा होता तो ज़हर खाके मर जाता।'
गोबर आकर बोला -- भोला दादा आ पहुँचे। मन दो मन भूसा है वह उन्हें दे दो, फिर उनकी सगाई ढूँढ़ने निकलो।
धनिया ने समझाया -- आदमी द्वार पर बैठा है उसके लिए खाट-वाट तो डाल नहीं दी। कलसा ले जाओ, पानी भरकर रख दो, हाथ-मुँह धोयें, कुछ रस-पानी पिला दो। मुसीबत में ही आदमी हाथ फैलाता है।
— 'होरी बोला -- रस-वस का काम नहीं है, कौन कोई पाहुने हैं। धनिया बिगड़ी -- पाहुने और कैसे होते हैं! रुपिया, देख डब्बे में तमाखू है कि नहीं। एक पैसे का तमाखू सहुआइन की दुकान से ले ले।'
भोला की आज जितनी ख़ातिर हुई, और कभी न हुई होगी। गोबर ने खाट डाल दी, सोना रस घोल लायी, रूपा तमाखू भर लायी। धनिया द्वार पर खड़ी अपना बखान सुनने के लिए अधीर हो रही थी।
— 'भोला ने चिलम हाथ में लेकर कहा -- अच्छी घरनी घर में आ जाय, तो समझ लो लक्ष्मी आ गयी। वही जानती है छोटे-बड़े का आदर-सत्कार कैसे करना चाहिए।'
धनिया के हृदय में उल्लास का कम्पन हो रहा था। चिन्ता और निराशा से आहत आत्मा इन शब्दों में एक कोमल शीतल स्पर्श का अनुभव कर रही थी।
होरी जब भूसा लाने अन्दर चला, तो धनिया भी पीछे-पीछे चली। होरी ने कहा -- जाने कहाँ से इतना बड़ा खाँचा मिल गया। मन-भर से कम में न भरेगा। दो खाँचे भी दिये, तो दो मन निकल जायँगे।
— 'धनिया फूली हुई थी। बोली -- या तो किसी को नेवता न दो, और दो तो भरपेट खिलाओ। देते ही हो, तो तीन खाँचे दे दो। भला आदमी लड़कों को क्यों नहीं लाया। जान निकल जायगी।'
— 'होरी बोला -- तीन खाँचे तो मेरे दिये न दिये जायँगे ! धनिया ने कहा -- तब क्या एक खाँचा देकर टालोगे? गोबर से कह दो, अपना खाँचा भरकर उनके साथ चला जाय।'
होरी ने आपत्ति की -- गोबर ऊख गोड़ने जा रहा है। धनिया बोली -- एक दिन न गोड़ने से ऊख न सूख जायगी। यह तो उनका काम था कि किसी को अपने साथ ले लेते।
— 'धनिया बोली -- अच्छा भाई, कोई मत जाय। मैं पहुँचा दूँगी। बड़ों की सेवा करने में लाज नहीं है। होरी ने चिढ़कर कहा -- और तीन खाँचे उन्हें दे दूँ, तो अपने बैल क्या खायेंगे?'
— 'धनिया ने जवाब दिया -- यह सब तो नेवता देने के पहले ही सोच लेना था। न हो, तुम और गोबर दोनों जने चले जाओ। होरी बोला -- मुरौवत मुरौवत की तरह की जाती है, घर उठाकर नहीं दे दिया जाता!'
— 'धनिया ने ताना मारा -- अभी ज़मींदार का प्यादा आ जाय, तो अपने सिर पर भूसा लादकर पहुँचाओगे। होरी ने कहा -- ज़मींदार की बात और है। धनिया बोली -- हाँ, वह डंडे के ज़ोर से काम लेता है न।'
होरी और गोबर मिलकर एक खाँचा बाहर लाये। भोला ने तुरन्त अपने अँगोछे का बीड़ा बनाकर सिर पर रखते हुए कहा -- मैं इसे रखकर अभी भागा आता हूँ। एक खाँचा और लूँगा।
— 'होरी बोला -- एक नहीं, अभी दो और भरे धरे हैं। और तुम्हें आना नहीं पड़ेगा। मैं और गोबर एक-एक खाँचा लेकर तुम्हारे साथ ही चलते हैं।' भोला स्तम्भित हो गया।
होरी उसे अपना भाई बल्कि उससे भी निकट जान पड़ा। उसे अपने भीतर एक ऐसी तृप्ति का अनुभव हुआ, जिसने मानो उसके सम्पूर्ण जीवन को हरा कर दिया।
तीनों भूसा लेकर चले, तो राह में बातें होने लगीं। भोला ने पूछा -- दशहरा आ रहा है, मालिकों के द्वार पर तो बड़ी धूमधाम होगी?
— 'होरी ने कहा -- हाँ, तम्बू सामियाना गड़ गया है। अब की लीला में मैं भी काम करूँगा। राय साहब ने कहा है, तुम्हें राजा जनक का माली बनना पड़ेगा। भोला बोला -- मालिक तुमसे बहुत ख़ुश हैं।'
— 'भोला ने फिर पूछा -- सगुन करने के रुपए का कुछ जुगाड़ कर लिया है? होरी ने मुँह का पसीना पोंछकर कहा -- उसी की चिन्ता तो मारे डालती है दादा -- अनाज तो सब-का-सब खलिहान में ही तुल गया।'
— 'होरी बोला -- ज़मींदार ने अपना लिया, महाजन ने अपना लिया। मेरे लिए पाँच सेर अनाज बच रहा। यह भूसा तो मैंने रातोंरात छिपा दिया था, नहीं तिनका भी न बचता।'
— 'होरी ने दुःखड़ा रोया -- हमारा जनम इसी लिए हुआ है कि अपना रक्त बहायें और बड़ों का घर भरें। मूल का दुगना सूद भर चुका; पर मूल ज्यों-का-त्यों सिर पर सवार है।'
— 'होरी ने कहा -- राय साहब ने बेटे के ब्याह में बीस हज़ार लुटा दिये। मँगरू ने अपने बाप के क्रिया-करम में पाँच हज़ार लगाये। भोला ने करुण भाव से कहा -- बड़े आदमियों की बराबरी तुम कैसे कर सकते हो भाई?'
— 'होरी बोला -- आदमी तो हम भी हैं। भोला ने कहा -- कौन कहता है कि हम तुम आदमी हैं। हम लोग तो बैल हैं और जुतने के लिए पैदा हुए हैं। प्रेम तो संसार से उठ गया।'
दोनों मित्र अपने-अपने दुखड़े रोते रहे। भोला ने अपने बेटों के करतूत सुनाये, होरी ने अपने भाइयों का रोना रोया। तब एक कुएँ पर पानी पीने के लिए बैठ गये। गोबर पानी खींचने लगा।
— 'भोला ने पूछा -- अलगौझे के समय तो तुम्हें बड़ा रंज हुआ होगा। होरी आर्द्र कंठ से बोला -- कुछ न पूछो दादा, यही जी चाहता था कि कहीं जाके डूब मरूँ। मेरे जीते जी सब कुछ हो गया।'
— 'होरी बोला -- जिसके पीछे जवानी धूल में मिला दी, वही मुद्दई हो गये। जब से अलगौझा हुआ है, दोनों घरों में एक जून रोटी पकती है। इस मालिकपन में गोबर की माँ की जो दुर्गती हुई, वह मैं ही जानता हूँ।'
— 'होरी ने कहा -- बेचारी देवरानियों के लिए गहने बनवा दिये, अपनी देह पर कच्चा धागा भी न था। जलन यही थी कि यह मालिक क्यों है। बहुत अच्छा हुआ कि अलग हो गये। मेरे सिर से बला टली।'
— 'भोला ने कहा -- यही हाल घर-घर है भैया! लड़कों से भी नहीं पटती क्योंकि मैं कुचाल देखकर मुँह नहीं बन्द कर सकता। जेठा कामता सौदा लेकर जायगा, तो आधे पैसे ग़ायब। छोटा जंगी संगत में मस्त रहता है।'
— 'भोला बोला -- सानी-पानी मैं करूँ, दूध बाज़ार मैं जाऊँ। यह गृहस्थी सोने की हँसिया है। लड़की है झुनिया, वह भी नसीब की खोटी। उसका आदमी बम्बई के दंगे में मारा गया। भावजें उसे जलाती रहती हैं।'
इन्हीं दुखड़ों में रास्ता कट गया। भोला का पुरवा छोटा पर गुलज़ार था। भोला गाँव का मुखिया था। द्वार पर चरनी थी जहाँ गायें-भैंसें खड़ी थीं। ओसारे में तख़्त पड़ा था। कोठरी में रामायण रखी थी।
दोनों बहुएँ गोबर पाथ रही थीं और झुनिया चौखट पर खड़ी थी। वह स्वस्थ और मांसल अंगों वाली युवती थी। गुलाबी साड़ी में वह और भी शोभा पा रही थी। उसने लपककर सिर से खाँचा उतरवाया।
— 'भोला ने कहा -- पहले एक चिलम भर ला, फिर थोड़ा-सा रस बना ले। होरी महतो को पहचानती है न? फिर होरी से बोला -- घरनी के बिना घर नहीं रहता भैया। बहुएँ गृहस्थी चलाना क्या जानें।'
— 'भोला बोला -- लौंडे आलसी हैं। लड़की भी छोटा-सा अढ़ौना भुन-भुनाकर करेगी। मैं तो सह लेता हूँ, ख़सम थोड़े ही सहेगा।' झुनिया चिलम और रस ले आयी। फिर पानी भरने चली।
— 'गोबर ने हाथ बढ़ाया -- तुम रहने दो, मैं भरे लाता हूँ। झुनिया मुस्कुराकर बोली -- तुम हमारे मेहमान हो। गोबर बोला -- पड़ोसी हूँ। झुनिया बोली -- पड़ोसी साल-भर सूरत न दिखाये, तो मेहमान ही है।'
— 'झुनिया हँसकर बोली -- रोज़-रोज़ आओगे, कुछ न पाओगे। दर्शन के लिए पूजा करनी पड़ेगी।' फिर वह उदास हो गयी। वह विधवा थी, इसलिए वह अपने नारीत्व के द्वार सदैव बन्द रखती थी।'
गोबर ने पानी निकाला। सबने रस पिया और चिलम पीकर लौटे। भोला ने कहा -- 'कल आकर गाय ले जाना गोबर।' गोबर की आँखें उसी सुन्दर और सुडौल गाय पर लगी हुई थीं।
— 'होरी ने कहा -- मँगवा लूँगा। भोला बोला -- तुम्हें जल्दी न हो, हमें तो है। उसे द्वार पर देखकर तुम्हें वह बात याद रहेगी। होरी बोला -- उसकी मुझे बड़ी फ़िकर है दादा! भोला ने कहा -- कल गोबर को भेज देना।'
दोनों ने खाँचे सिर पर रखे और आगे बढ़े। दोनों अत्यन्त प्रसन्न थे। होरी को अभिलाषा पूरी होने का हर्ष था और गोबर को एक बहुमूल्य वस्तु मिल गयी थी। झुनिया द्वार पर खड़ी थी।
होरी को रात भर नींद नहीं आयी। नीम के पेड़-तले अपनी बाँस की खाट पर पड़ा बार-बार तारों की ओर देखता था। गाय के लिए एक नाँद गाड़नी है। बैलों से अलग उसकी नाँद रहे तो अच्छा।
अभी तो रात को बाहर ही रहेगी; लेकिन चौमासे में उसके लिए कोई दूसरी जगह ठीक करनी होगी। बाहर लोग नज़र लगा देते हैं।
नहीं, बाहर बाँधना ठीक नहीं। और बाहर नाँद भी कौन गाड़ने देगा। कारिन्दा साहब नज़र के लिए मुँह फुलायेंगे। छोटी छोटी बात के लिए राय साहब के पास फ़रियाद ले जाना भी उचित नहीं।
और कारिन्दे के सामने मेरी सुनता कौन है। उनसे कुछ कहूँ, तो कारिन्दा दुश्मन हो जाय। जल में रहकर मगर से बैर करना लड़कपन है। भीतर ही बाँधूँगा।
आँगन है तो छोटा-सा; लेकिन एक मड़ैया डाल देने से काम चल जायगा। अभी पहला ही ब्यान है। पाँच सेर से कम क्या दूध देगी। सेर-भर तो गोबर ही को चाहिए।
रुपिया दूध देखकर कैसी ललचाती रहती है। अब पिये जितना चाहे। कभी-कभी दो-चार सेर मालिकों को दे आया करूँगा। कारिन्दा साहब की पूजा भी करनी ही होगी।
और भोला के रुपए भी दे देना चाहिये। सगाई के ढकोसले में उसे क्यों डालूँ। जो आदमी अपने ऊपर इतना विश्वास करे, उससे दग़ा करना नीचता है।
अस्सी रुपए की गाय मेरे विश्वास पर दे दी। नहीं यहाँ तो कोई एक पैसे को नहीं पतियाता। सन में क्या कुछ न मिलेगा? अगर पच्चीस रुपए भी दे दूँ, तो भोला को ढाढ़स हो जाय।
धनिया से नाहक़ बता दिया। चुपके से गाय लेकर बाँध देता तो चकरा जाती। लगती पूछने, किसकी गाय है? कहाँ से लाये हो? ख़ूब दिक करके तब बताता; लेकिन जब पेट में बात पचे भी।
कभी दो-चार पैसे ऊपर से आ जाते हैं; उनको भी तो नहीं छिपा सकता। और यह अच्छा भी है। उसे घर की चिन्ता रहती है; अगर उसे मालूम हो जाय कि इनके पास भी पैसे रहते हैं, तो फिर नख़रे बघारने लगे।
गोबर ज़रा आलसी है, नहीं मैं गऊ की ऐसी सेवा करता कि जैसी चाहिए। आलसी-वालसी कुछ नहीं है। इस उमिर में कौन आलसी नहीं होता।
मैं भी दादा के सामने मटरगस्ती ही किया करता था। बेचारे पहर रात से कुट्टी काटने लगते। कभी द्वार पर झाड़ू लगाते, कभी खेत में खाद फेंकते। मैं पड़ा सोता रहता था।
कभी जगा देते, तो मैं बिगड़ जाता और घर छोड़कर भाग जाने की धमकी देता था। लड़के जब अपने माँ-बाप के सामने भी ज़िन्दगी का थोड़ा-सा सुख न भोगेंगे, तो फिर जब अपने सिर पड़ गयी तो क्या भोगेंगे?
दादा के मरते ही क्या मैंने घर नहीं सँभाल लिया? सारा गाँव यही कहता था कि होरी घर बरबाद कर देगा; लेकिन सिर पर बोझ पड़ते ही मैंने ऐसा चोला बदला कि लोग देखते रह गये।
सोभा और हीरा अलग ही हो गये, नहीं आज इस घर की और ही बात होती। तीन हल एक साथ चलते। अब तीनों अलग-अलग चलते हैं। बस, समय का फेर है।
धनिया का क्या दोष था। बेचारी जब से घर में आयी, कभी तो आराम से न बैठी। डोली से उतरते ही सारा काम सिर पर उठा लिया।
आखिर उसे भी तो कुछ आराम मिलना चाहिये। लेकिन भाग्य में आराम लिखा होता तब तो मिलता। तब देवरों के लिए मरती थी, अब अपने बच्चों के लिए मरती है।
वह इतनी सीधी, ग़मख़ोर, निर्छल न होती, तो आज सोभा और हीरा जो मूँछों पर ताव देते फिरते हैं, कहीं भीख माँगते होते। आदमी कितना स्वार्थी हो जाता है। जिसके लिए लड़ो वही जान का दुश्मन हो जाता है।
होरी ने फिर पूर्व की ओर देखा। साइत भिनसार हो रहा है। गोबर काहे को जगने लगा। नहीं, कहके तो यही सोया था कि मैं अँधेरे ही चला जाऊँगा।
जाकर नाँद तो गाड़ दूँ, लेकिन नहीं, जब तक गाय द्वार पर न आ जाय, नाँद गाड़ना ठीक नहीं। कहीं भोला बदल गये या और किसी कारन से गाय न दी, तो सारा गाँव तालियाँ पीटने लगेगा, चले थे गाय लेने।
पट्ठे ने इतनी फुर्ती से नाँद गाड़ दी, मानो इसी की कसर थी। भोला है तो अपने घर का मालिक; लेकिन जब लड़के सयाने हो गये, तो बाप की कौन चलती है।
कामता और जंगी अकड़ जायँ, तो क्या भोला अपने मन से गाय मुझे दे देंगे, कभी नहीं। सहसा गोबर चौंककर उठ बैठा और आँखें मलता हुआ बोला -- 'अरे! यह तो भोर हो गया। तुमने नाँद गाड़ दी दादा?'
होरी गोबर के सुगठित शरीर और चौड़ी छाती की ओर गर्व से देखकर और मन में यह सोचते हुए कि कहीं इसे गोरस मिलता, तो कैसा पट्ठा हो जाता, बोला -- 'नहीं, अभी नहीं गाड़ी। सोचा, कहीं न मिले, तो नाहक़ भद्द हो।'
— 'गोबर ने त्योरी चढ़ाकर कहा -- मिलेगी क्यों नहीं?'
— 'उनके मन में कोई चोर पैठ जाय?'
— 'चोर पैठे या डाकू, गाय तो उन्हें देनी ही पड़ेगी।' गोबर ने और कुछ न कहा। लाठी कन्धे पर रखी और चल दिया।
होरी उसे जाते देखता हुआ अपना कलेजा ठंठा करता रहा। अब लड़के की सगाई में देर न करनी चाहिये। सत्रहवाँ लग गया; मगर करें कैसे? कहीं पैसे के भी दरसन हों।
जब से तीनों भाइयों में अलगौझा हो गया, घर की साख जाती रही। महतो लड़का देखने आते हैं, पर घर की दशा देखकर मुँह फीका करके चले जाते हैं।
दो-एक राज़ी भी हुए, तो रुपए माँगते हैं। दो-तीन सौ लड़की का दाम चुकाये और इतना ही ऊपर से ख़र्च करे, तब जाकर ब्याह हो। कहाँ से आये इतने रुपए।
रास खलिहान में तुल जाती है। खाने-भर को भी नहीं बचता। ब्याह कहाँ से हो? और अब तो सोना ब्याहने योग्य हो गयी। लड़के का ब्याह न हुआ, न सही। लड़की का ब्याह न हुआ, तो सारी बिरादरी में हँसी होगी।
पहले तो उसी की सगाई करनी है, पीछे देखी जायगी। एक आदमी ने आकर राम-राम किया और पूछा -- 'तुम्हारी कोठी में कुछ बाँस होंगे महतो?'
होरी ने देखा, दमड़ी बँसार सामने खड़ा है, नाटा काला, ख़ूब मोटा, चौड़ा मुँह, बड़ी-बड़ी मूँछें, लाल आँखें, कमर में बाँस काटने की कटार खोंसे हुए।
साल में एक-दो बार आकर चिकें, कुरसियाँ, मोढ़े, टोकरियाँ आदि बनाने के लिए कुछ बाँस काट ले जाता था। होरी प्रसन्न हो गया। मुट्ठी गर्म होने की कुछ आशा बँधी।
चौधरी को ले जाकर अपनी तीनों कोठियाँ दिखायीं, मोल-भाव किया और पच्चीस रुपए सैकड़े में पचास बाँसों का बयाना ले लिया। फिर दोनों लौटे।
होरी ने उसे चिलम पिलायी, जलपान कराया और तब रहस्यमय भाव से बोला -- 'मेरे बाँस कभी तीस रुपए से कम में नहीं जाते; लेकिन तुम घर के आदमी हो, तुमसे क्या मोल-भाव करता। तुम्हारा वह लड़का, जिसकी सगाई हुई थी, अभी परदेस से लौटा कि नहीं?'
— 'चौधरी ने चिलम का दम लगाकर खाँसते हुए कहा -- उस लौंडे के पीछे तो मर मिटा महतो! जवान बहू घर में बैठी थी और वह बिरादरी की एक दूसरी औरत के साथ परदेस में मौज करने चल दिया।'
— 'बहू भी दूसरे के साथ निकल गयी। बड़ी नाकिस जात है, महतो, किसी की नहीं होती। कितना समझाया कि तू जो चाहे खा, जो चाहे पहन, मेरी नाक न कटवा, मुदा कौन सुनता है।'
— 'औरत को भगवान् सब कुछ दे, रूप न दे, नहीं वह क़ाबू में नहीं रहती। कोठियाँ तो बँट गयी होंगी?'
— 'होरी ने आकाश की ओर देखा और बोला -- सब कुछ बँट गया चौधरी! जिनको लड़कों की तरह पाला-पोसा, वह अब बराबर के हिस्सेदार हैं; लेकिन भाई का हिस्सा खाने की अपनी नीयत नहीं है।'
— 'इधर तुमसे रुपए मिलेंगे, उधर दोनों भाइयों को बाँट दूँगा। चार दिन की ज़िन्दगी में क्यों किसी से छल-कपट करूँ। नहीं कह दूँ कि बीस रुपए सैकड़े में बेचे हैं तो उन्हें क्या पता लगेगा।'
— 'तुम उनसे कहने थोड़े ही जाओगे। तुम्हें तो मैंने बराबर अपना भाई समझा है। व्यवहार में हम भाई के अर्थ का कितना ही दुरुपयोग करें, लेकिन उसकी भावना में जो पवित्रता है, वह हमारी कालिमा से कभी मलिन नहीं होती।'
होरी ने अप्रत्यक्ष रूप से यह प्रस्ताव करके चौधरी के मुँह की ओर देखा कि वह स्वीकार करता है या नहीं। उसके मुख पर कुछ ऐसा मिथ्या विनीत भाव प्रकट हुआ जो भिक्षा माँगते समय मोटे भिक्षुकों पर आ जाता है।
— 'चौधरी ने होरी का आसन पाकर चाबुक जमाया -- हमारा तुम्हारा पुराना भाई चारा है महतो, ऐसी बात है भला; लेकिन बात यह है कि ईमान आदमी बेचता है, तो किसी लालच से।'
— 'बीस रुपए नहीं मैं पन्द्रह रुपए कहूँगा; लेकिन जो बीस रुपए के दाम लो।' होरी ने खिसियाकर कहा -- 'तुम तो चौधरी अँधेर करते हो, बीस रुपए में कहीं ऐसे बाँस जाते हैं?'
— 'ऐसे क्या, इससे अच्छे बाँस जाते हैं दस रुपए पर, हाँ दस कोस और पच्छिम चले जाओ। मोल बाँस का नहीं है, शहर के नगीच होने का है।'
— 'आदमी सोचता है, जितनी देर वहाँ जाने में लगेगी, उतनी देर में तो दो-चार रुपए का काम हो जायगा।' सौदा पट गया।
चौधरी ने मिरज़ई उतार कर छान पर रख दी और बाँस काटने लगा। ऊख की सिंचाई हो रही थी। हीरा-बहू कलेवा लेकर कुएँ पर जा रही थी।
— 'चौधरी को बाँस काटते देखकर घूँघट के अन्दर से बोली -- कौन बाँस काटता है? यहाँ बाँस न कटेंगे।' चौधरी ने हाथ रोककर कहा -- 'बाँस मोल लिए हैं, पन्द्रह रुपए सैकड़े का बयाना हुआ है। सेंत में नहीं काट रहे हैं।'
हीरा-बहू अपने घर की मालकिन थी। उसी के विद्रोह से भाइयों में अलगौझा हुआ था। धनिया को परास्त करके शेर हो गयी थी।
हीरा कभी-कभी उसे पीटता था। अभी हाल में इतना मारा था कि वह कई दिन तक खाट से न उठ सकी, लेकिन अपनी पदाधिकार वह किसी तरह न छोड़ती थी।
हीरा क्रोध में उसे मारता था; लेकिन चलता था उसी के इशारों पर, उस घोड़े की भाँति जो कभी-कभी स्वामी को लात मारकर भी उसी के आसन के नीचे चलता है।
— 'कलेवे की टोकरी सिर से उतार कर बोली -- पन्द्रह रुपए में हमारे बाँस न जायँगे।' चौधरी औरत जात से इस विषय में बात-चीत करना नीति-विरुद्ध समझते थे।
— 'बोले -- जाकर अपने आदमी को भेज दे। जो कुछ कहना हो, आकर कहें।' हीरा-बहू का नाम था पुन्नी। बच्चे दो ही हुए थे। लेकिन ढल गयी थी।
बनाव-सिंगार से समय के आघात का शमन करना चाहती थी, लेकिन गृहस्थी में भोजन ही का ठिकाना न था, सिंगार के लिए पैसे कहाँ से आते।
इस अभाव और विवशता ने उसकी प्रकृति का जल सुखाकर कठोर और शुष्क बना दिया था, जिस पर एक बार फावड़ा भी उचट जाता था।
— 'समीप आकर चौधरी का हाथ पकड़ने की चेष्टा करती हुई बोली -- आदमी को क्यों भेज दूँ। जो कुछ कहना हो, मुझसे कहो न। मैंने कह दिया, मेरे बाँस न कटेंगे।'
चौधरी हाथ छुड़ाता था, और पुन्नी बार-बार पकड़ लेती थी। एक मिनट तक यही हाथा-पाई होती रही। अन्त में चौधरी ने उसे ज़ोर से पीछे ढकेल दिया।
पुन्नी धक्का खाकर गिर पड़ी; मगर फिर सँभली और पाँव से तल्ली निकालकर चौधरी के सिर, मुँह, पीठ पर अन्धाधुन्ध जमाने लगी। बँसोर होकर उसे ढकेल दे? उसका यह अपमान!
मारती जाती थी और रोती भी जाती थी। चौधरी उसे धक्का देकर -- नारी जाति पर बल का प्रयोग करके -- गच्चा खा चुका था। खड़े-खड़े मार खाने के सिवा इस संकट से बचने की उसके पास और कोई दवा न थी।
पुन्नी का रोना सुनकर होरी भी दौड़ा हुआ आया। पुन्नी ने उसे देखकर और ज़ोर से चिल्लाना शुरू किया। होरी ने समझा, चौधरी ने पुनिया को मारा है।
ख़ून ने जोश मारा और अलगौझे की ऊँची बाँध को तोड़ता हुआ बाहर निकल पड़ा। चौधरी को ज़ोर से एक लात जमाकर बोला -- 'अब अपना भला चाहते हो चौधरी, तो यहाँ से चले जाओ, नहीं तुम्हारी लहास उठेगी।'
— 'तुमने अपने को समझा क्या है? तुम्हारी इतनी मजाल कि मेरी बहू पर हाथ उठाओ।' चौधरी क़समें खा-खाकर अपनी सफ़ाई देने लगा।
तल्लियों की चोट में उसकी अपराधी आत्मा मौन थी। यह लात उसे निरपराध मिली और उसके फूले हुए गाल आँसुओं से भींग गये। उसने तो बहू को छुआ भी नहीं।
— 'क्या वह इतना गँवार है कि महतो के घर की औरतों पर हाथ उठायेगा। होरी ने अविश्वास करके कहा -- आँखों में धूल मत झोंको चौधरी, तुमने कुछ कहा नहीं, तो बहू झूठ-मूठ रोती है?'
— 'रुपये की गर्मी है, तो वह निकाल दी जायगी। अलग हैं तो क्या हुआ, हैं तो एक ख़ून। कोई तिरछी आँख से देखे, तो आँख निकाल लें।'
— 'पुन्नी चंडी बनी हुई थी। गला फाड़कर बोली -- तूने मुझे धक्का देकर गिरा नहीं दिया? खा जा अपने बेटे की क़सम!'
हीरा को भी ख़बर मिली कि चौधरी और पुनिया में लड़ाई हो रही है। उसने पुर वहीं छोड़ा और औंगी लिए घटनास्थल की ओर चला। गाँव में अपने क्रोध के लिए प्रसिद्ध था।
छोटा डील, गठा हुआ शरीर, आँखें कौड़ी की तरह निकल आयी थीं और गर्दन की नसें तन गयी थी; मगर उसे चौधरी पर क्रोध न था, क्रोध था पुनिया पर।
वह क्यों चौधरी से लड़ी? क्यों उसकी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी? बँसोर से लड़ने-झगड़ने का उसे क्या प्रयोजन था?
उसे जाकर हीरा से सारा समाचार कह देना चाहिए था। हीरा जैसा उचित समझता, करता। वह उससे लड़ने क्यों गयी? उसका बस होता, तो वह पुनिया को पर्दे में रखता।
पुनिया किसी बड़े से मुँह खोलकर बातें करे, यह उसे असह्य था। वह ख़ुद जितना उद्दंड था, पुनिया को उतना ही शान्त रखना चाहता था।
जब भैया ने पन्द्रह रुपये में सौदा कर लिया, तो यह बीच में कूदनेवाली कौन! आते ही उसने पुन्नी का हाथ पकड़ लिया और घसीटता हुआ अलग ले जाकर लगा लातें जमाने।
— 'हरामज़ादी, तू हमारी नाक कटाने पर लगी हुई है! तू छोटे-छोटे आदमियों से लड़ती फिरती है, किसकी पगड़ी नीची होती है बता! (एक लात और जमाकर) हम तो वहाँ कलेऊ की बाट देख रहे हैं, तू यहाँ लड़ाई ठाने बैठी है।'
— 'इतनी बेसर्मी! आँख का पानी ऐसा गिर गया! खोदकर गाड़ दूँगा।' पुन्नी हाय-हाय करती जाती थी और कोसती जाती थी।
— 'तेरी मिट्टी उठे, तुझे हैज़ा हो जाय, तुझे मरी आये, देवी मैया तुझे लील जायँ, तुझे इन्पलुएंजा हो जाय। भगवान् करे, तू कोढ़ी हो जाय। हाथ-पाँव कट-कट गिरें।'
और गालियाँ तो हीरा खड़ा-खड़ा सुनता रहा, लेकिन यह पिछली गाली उसे लग गयी। हैज़ा, मरी आदि में विशेष कष्ट न था। इधर बीमार पड़े, उधर विदा हो गये।
लेकिन कोढ़! यह घिनौनी मौत, और उससे भी घिनौना जीवन। वह तिलमिला उठा, दाँत पीसता हुआ फिर पुनिया पर झपटा।
— 'तू तो दूसरा भरतार करके किनारे खड़ी हो जायगी। चौधरी को पुनिया की इस दुर्गति पर दया आ गयी। हीरा को उदारतापूर्वक समझाने लगा -- हीरा महतो, अब जाने दो, बहुत हुआ।'
— 'क्या हुआ, बहू ने मुझे मारा। मैं तो छोटा नहीं हो गया। धन्य भाग कि भगवान् ने यह तो दिखाया। हीरा ने चौधरी को डाँटा -- तुम चुप रहो चौधरी, नहीं मेरे क्रोध में पड़ जाओगे तो बुरा होगा।'
— 'औरत जात इसी तरह बकती है। आज को तुमसे लड़ गयी, कल को दूसरों से लड़ जायगी। तुम भले मानस हो, हँसकर टाल गये, दूसरा तो बरदास न करेगा। कहीं उसने भी हाथ छोड़ दिया, तो कितनी आबरू रह जायेगी, बताओ।'
इस ख़याल ने उसके क्रोध को फिर भड़काया। लपका था कि होरी ने दौड़कर पकड़ लिया और उसे पीछे हटाते हुए बोला -- 'अरे हो तो गया। देख तो लिया दुनिया ने कि बड़े बहादुर हो। अब क्या उसे पीसकर पी जाओगे?'
हीरा अब भी बड़े भाई का अदब करता था। सीधे-सीधे न लड़ता था। चाहता तो एक झटके में अपना हाथ छुड़ा लेता; लेकिन इतनी बेअदबी न कर सका।
— 'चौधरी की ओर देखकर बोला -- अब खड़े क्या ताकते हो। जाकर अपने बाँस काटो। मैंने सही कर दिया। पन्द्रह रुपए सैकड़े में तय है।'
— 'कहाँ तो पुन्नी रो रही थी। कहाँ झमककर उठी और अपना सिर पीटकर बोली -- लगा दे घर में आग, मुझे क्या करना है। भाग फूट गया कि तुम-जैसी क़साई के पाले पड़ी।'
— 'लगा दे घर में आग! उसने कलेऊ की टोकरी वहीं छोड़ दी और घर की ओर चली। हीरा गरजा -- वहाँ कहाँ जाती हैं, चल कुएँ पर, नहीं ख़ून पी जाऊँगा।'
पुनिया के पाँव रुक गये। इस नाटक का दूसरा अंक न खेलना चाहती थी। चुपके से टोकरी उठाकर रोती हुई कुएँ की ओर चली। हीरा भी पीछे-पीछे चला।
होरी ने कहा -- 'अब फिर मार-धाड़ न करना। इससे औरत बेसरम हो जाती है।' धनिया ने द्वार पर आकर हाँक लगायी -- 'तुम वहाँ खड़े-खड़े क्या तमाशा देख रहे हो। कोई तुम्हारी सुनता भी है कि यों ही शिक्षा दे रहे हो।'
— 'उस दिन इसी बहू ने तुम्हें घूँघट की आड़ में डाढ़ीजार कहा था, भूल गये। बहुरिया होकर पराये मरदों से लड़ेगी, तो डाँटी न जायेगी। होरी द्वार पर आकर नटखटपन के साथ बोला -- और जो मैं इसी तरह तुझे मारूँ?'
— 'धनिया बोली -- क्या कभी मारा नहीं है, जो मारने की साध बनी हुई है?'
— 'होरी ने कहा -- इतनी बेदरदी से मारता, तो तू घर छोड़कर भाग जाती! पुनिया बड़ी ग़मख़ोर है।' धनिया चिढ़ी -- 'ओहो! ऐसे ही तो बड़े दरदवाले हो। अभी तक मार का दाग़ बना हुआ है।'
— 'धनिया बोली -- हीरा मारता है तो दुलारता भी है। तुमने ख़ाली मारना सीखा, दुलार करना सीखा ही नहीं। मैं ही ऐसी हूँ कि तुम्हारे साथ निबाह हुआ।'
— 'होरी बोला -- अच्छा रहने दे, बहुत अपना बखान न कर! तू ही रूठ-रूठकर नैहर भागती थी।' धनिया ने उत्तर दिया -- 'जब महीनों ख़ुशामद करता था, तब जाकर आती थी!'
— 'होरी ने हँसकर कहा -- जब अपनी गरज सताती थी, तब मनाने जाते थे लाला! मेरे दुलार से नहीं जाते थे।' धनिया बोली -- 'इसी से तो मैं सबसे तेरा बखान करता हूँ।'
वैवाहिक जीवन के प्रभात में लालसा अपनी गुलाबी मादकता के साथ उदय होती है और हृदय के सारे आकाश को अपने माधुर्य की सुनहरी किरणों से रंजित कर देती है।
फिर मध्याह्न का प्रखर ताप आता है, क्षण-क्षण पर बगूले उठते हैं, और पृथ्वी काँपने लगती है। लालसा का सुनहरा आवरण हट जाता है और वास्तविकता अपने नग्न रूप में सामने आ खड़ी है।
उसके बाद विश्राममय सन्ध्या आती है, शीतल और शान्त, जब हम थके हुए पथिकों की भाँति दिन-भर की यात्रा का वृत्तान्त कहते और सुनते हैं।
— 'धनिया ने आँखों में रस भरकर कहा -- चलो-चलो, बड़े बखान करनेवाले। ज़रा-सा कोई काम बिगड़ जाय, तो गरदन पर सवार हो जाते हो।'
— 'होरी ने मीठे उलाहने के साथ कहा -- ले, अब यही तेरी बेइंसाफ़ी मुझे अच्छी नहीं लगती धनिया! भोला से पूछ, मैंने उनसे तेरे बारे में क्या कहा था?'
— 'धनिया ने बात बदलकर कहा -- देखो, गोबर गाय लेकर आता है कि ख़ाली हाथ।' चौधरी ने पसीने में लथ-पथ आकर कहा -- 'महतो, चलकर बाँस गिन लो। कल ठेला लाकर उठा ले जाऊँगा।'
होरी ने बाँस गिनने की ज़रूरत न समझी। चौधरी ऐसा आदमी नहीं है। फिर एकाध बाँस बेसी ही काट लेगा, तो क्या। रोज़ ही तो मँगनी बाँस कटते रहते हैं।
चौधरी ने साढ़े सात रुपए निकालकर उसके हाथ में रख दिये। होरी ने गिनकर कहा -- 'और निकालो।' हिसाब से ढाई और होते हैं।
— 'चौधरी ने बेमुरौवती से कहा -- पन्द्रह रुपये में तय हुए हैं कि नहीं? होरी बोला -- पन्द्रह रुपए में नहीं, बीस रुपये में।'
— 'चौधरी ने कहा -- हीरा महतो ने तुम्हारे सामने पन्द्रह रुपये कहे थे। कहो तो बुला लाऊँ। होरी बोला -- तय तो बीस रुपये में ही हुए थे चौधरी! अब तुम्हारी जीत है, जो चाहो कहो।'
— 'होरी ने विवश होकर कहा -- ढाई रुपये निकलते हैं, तुम दो ही दे दो।' मगर चौधरी कच्ची गोलियाँ न खेला था। अब उसे किसका डर।
— 'होरी के मुँह में तो ताला पड़ा हुआ था। क्या कहे, माथा ठोंककर रह गया। बस इतना बोला -- यह अच्छी बात नहीं है, चौधरी, दो रुपए दबाकर राजा न हो जाओगे।'
— 'चौधरी तीक्ष्ण स्वर में बोला -- और तुम क्या भाइयों के थोड़े-से पैसे दबाकर राजा हो जाओगे? ढाई रुपये पर अपना ईमान बिगाड़ रहे थे, उस पर मुझे उपदेस देते हो।'
— 'अभी परदा खोल दूँ, तो सिर नीचा हो जाय।' होरी पर जैसे सैकड़ों जूते पड़ गये। चौधरी तो रुपए सामने ज़मीन पर रखकर चला गया।
वह नीम के नीचे बैठा बड़ी देर तक पछताता रहा। वह कितना लोभी और स्वार्थी, इसका उसे आज पता चला। चौधरी ने ढाई रुपए दे दिये होते, तो वह ख़ुशी से कितना फूल उठता।
अपनी चालाकी को सराहता कि बैठे-बैठाये ढाई रुपए मिल गये। ठोकर खाकर ही तो हम सावधानी के साथ पग उठाते हैं। धनिया बाहर आयी तो रुपए ज़मीन पर पड़े देखे।
— 'धनिया ने गिनकर बोली -- और रुपए क्या हुए, दस न चाहिए? होरी ने लम्बा मुँह बनाकर कहा -- हीरा ने पन्द्रह रुपए में दे दिये, तो मैं क्या करता।'
— 'धनिया बोली -- हीरा पाँच रुपए में दे दे। हम नहीं देते इन दामों। होरी ने कहा -- वहाँ मार-पीट हो रही थी। मैं बीच में क्या बोलता।'
होरी ने अपनी पराजय अपने मन में ही डाल ली, जैसे कोई चोरी से आम तोड़ने के लिए पेड़ पर चढ़े और गिर पड़ने पर धूल झाड़ता हुआ उठ खड़ा हो कि कोई देख न ले।
जीतकर आप अपनी धोखेबाज़ियों की डींग मार सकते हैं; जीत से सब-कुछ माफ़ है। हार की लज्जा तो पी जाने की ही वस्तु है।
— 'धनिया पति को फटकारने लगी -- क्यों न हो, भाई ने पन्द्रह रुपये कह दिये, तो तुम कैसे टोकते। अरे राम-राम! लाड़ले भाई का दिल छोटा हो जाता कि नहीं।'
— 'जब लाड़ली बहू के गले पर छुरी चल रही थी, तो भला तुम कैसे बोलते। उस बखत कोई तुम्हारा सरबस लूट लेता, तो भी तुम्हें सुध न होती।'
होरी चुपचाप सुनता रहा। मिनका तक नहीं। झुँझलाहट हुई, क्रोध आया, ख़ून खौला, आँख जली, दाँत पिसे; लेकिन बोला नहीं।
चुपके-से कुदाल उठायी और ऊख गोड़ने चला। धनिया ने कुदाल छीनकर कहा -- 'क्या अभी सबेरा है जो ऊख गोड़ने चले? सूरज देवता माथे पर आ गये। नहाने-धोने जाओ। रोटी तैयार है।'
— 'होरी ने घुन्नाकर कहा -- मुझे भूख नहीं है। धनिया ने ताना मारा -- हाँ काहे को भूख लगेगी। भाई ने बड़े-बड़े लड्डू खिला दिये हैं न!'
— 'होरी बिगड़ा -- तू आज मार खाने पर लगी हुई है। धनिया ने नकली विनय से कहा -- क्या करूँ, तुम दुलार ही इतना करते हो कि मेरा सिर फिर गया है।'
— 'होरी गरजा -- तू घर में रहने देगी कि नहीं? धनिया बोली -- घर तुम्हारा, मालिक तुम, मैं भला कौन होती हूँ तुम्हें घर से निकालनेवाली।'
होरी आज धनिया से किसी तरह पेश नहीं पा सकता। उसकी अक्ल जैसे कुन्द हो गयी है। इन व्यंग्य-बाणों के रोकने के लिए उसके पास कोई ढाल नहीं है।
धीरे से कुदाल रख दी और नहाने चला गया। लौटा कोई आध घंटे में; मगर गोबर अभी तक न आया था। धनिया ने कहा -- 'अब खड़े क्या हो? गोबर साँझ को आयेगा।'
भोजन करके नीम की छाँह में लेट रहा। रूपा रोती हुई आई। उसकी बड़ी बहन सोना कहती है -- 'गाय आयेगी, तो उसका गोबर मैं पाथूँगी।'
रूपा यह नहीं बरदाश्त कर सकती। सोना रोटी पकाती है, तो क्या रूपा बरतन नहीं माँजती? सोना पानी लाती है, तो क्या रूपा कुएँ पर रस्सी नहीं ले जाती?
— 'होरी ने रूपा से कहा -- नहीं, गाय का गोबर तू पाथना। सोना गाय के पास जाये तो भगा देना। रूपा बोली -- दूध भी मैं ही दुहूँगी।'
— 'होरी ने कहा -- हाँ-हाँ, तू न दुहेगी तो और कौन दुहेगा? वह मेरी गाय होगी। होरी बोला -- हाँ, सोलहो आने तेरी।'
रूपा प्रसन्न होकर अपनी विजय का समाचार सोना को सुनाने चली गयी। सोना सिर को एक झटका देकर बोली -- 'जा तू गोबर पाथ। जब तू दूध दुहकर रखेगी तो मैं पी जाऊँगी।'
— 'रूपा बोली -- मैं दूध की हाँड़ी ताले में बन्द करके रखूँगी। सोना ने कहा -- मैं ताला तोड़ कर दूध निकाल लाऊँगी।'
सोना उम्र से किशोरी, देह के गठन में युवती और बुद्धि से बालिका थी। वह बाग़ की तरफ़ चल दी। रूपा भी बहन के पीछे हो ली।
रूपा अपने विवाह के लिए आग्रह करती है। उसका दूल्हा कैसा होगा, क्या-क्या लायेगा, इसका वह बड़ा विशद वर्णन करती।
साँझ हो रही थी। होरी अलसाया हुआ चिलम भरकर पीने लगा। इस फ़सल में सब कुछ खलिहान में तौल देने पर भी अभी उस पर कोई तीन सौ क़रज़ था।
मँगरू साह के साठ रुपए ज्यों-के-त्यों बने हुए थे। दातादीन पण्डित के तीस के सौ हो गये थे। दुलारी सहुआइन के भी लगभग सौ रुपए हो गये थे।
लगान के भी अभी पच्चीस रुपए बाक़ी पड़े हुए थे। दशहरे के दिन शगुन के रुपयों का भी कोई प्रबन्ध करना था। बाँसों के रुपए अच्छे समय पर मिल गये।
ज़िन्दगी के दो बड़े काम सिर पर सवार थे -- गोबर और सोना का विवाह। बहुत हाथ बाँधने पर भी तीन सौ से कम ख़र्च न होंगे।
होरी जब काम-धन्धे से छुट्टी पाकर चिलम पीने लगता था, तो यह चिन्ता एक काली दीवार की भाँति चारों ओर से घेर लेती थी।
सहसा सोना और रूपा दोनों दौड़ी हुई आयीं और एक साथ बोलीं -- 'भैया गाय ला रहे हैं। आगे-आगे गाय, पीछे-पछे भीया हैं।'
धनिया और होरी दोनों गाय बाँधने का प्रबन्ध करने लगे। होरी बोला -- 'चलो, जल्दी से नाँद गाड़ दें। धनिया के मुख पर जवानी चमक उठी थी।'
— 'धनिया बोली -- नहीं, पहले थाली में थोड़ा-सा आटा और गुड़ घोलकर रख दें। बेचारी धूप में चली होगी। प्यासी होगी।'
— 'होरी ने कहा -- कहीं एक घंटी पड़ी थी। उसे ढूँढ़ ले। उसके गले में बाँधेंगे। धनिया बोली -- सहुआइन की दुकान से काला डोरा मँगवा लो, गाय को नज़र बहुत लगती है।'
होरी श्रद्धा-विह्वल नेत्रों से गाय को देख रहा था। धनिया ने जल्दी से एक पुरानी साड़ी का काला किनारा फाड़कर गाय के गले में बाँध दिया।
— 'धनिया ने भयातुर होकर कहा -- खड़े क्या हो, आँगन में नाँद गाड़ दो। होरी बोला -- आँगन में, जगह कहाँ है? मैं तो बाहर ही गाड़ता हूँ।'
— 'धनिया ने डाँटा -- पागल न बनो। गाँव का हाल जानकर भी अनजान बनते हो। होरी बोला -- अरे बित्ते-भर के आँगन में गाय कहाँ बँधेगी भाई?'
— 'धनिया ने कहा -- जो बात नहीं जानते, उसमें टाँग मत अड़ाया करो। संसार-भर की बिद्या तुम्हीं नहीं पढ़े हो।'
आज धनिया के सामने होरी की एक न चली। सारा घर होरी के पक्ष में था; पर धनिया ने अकेले सब को परास्त कर दिया।
गाय क्या है, साक्षात् देवी का रूप है। दर्शकों, आलोचकों का ताँता लगा हुआ था, और होरी दौड़-दौड़कर सबका सत्कार कर रहा था।
पण्डित दातादीन लठिया टेकते हुए आये और बोले -- 'कहाँ हो होरी, तनिक हम भी तुम्हारी गाय देख लें। सुना बड़ी सुन्दर है।'
— 'दातादीन ने गऊ को अपनी अनुभवी आँखों से देखा और बोले -- कोई दोष नहीं है बेटा, बाल-भौंरी, सब ठीक। भगवान् चाहेंगे, तो तुम्हारे भाग खुल जायेंगे।'
— 'होरी ने कहा -- सब आपका असीरबाद है, दादा! दातादीन ने पूछा -- रुपए नगद दिये? होरी ने डींग मारी -- भोला ऐसा भलामानस नहीं है महाराज! नगद गिनाये।'
— 'दातादीन ने कहा -- कोई हरज़ नहीं बेटा। भगवान् सब कल्यान करेंगे। पाँच सेर दूध है इसमें? धनिया ने टोका -- अरे नहीं महाराज, इतना दूध कहाँ।'
— 'दातादीन रहस्य-भरे स्वर में बोले -- बाहर न बाँधना, इतना कहे देते हैं। धनिया ने पति की ओर विजयी आँखों से देखा।'
सारा गाँव गाय देखने आया। नहीं आये तो सोभा और हीरा जो अपने सगे भाई थे। होरी ने धनिया से कहा -- 'न सोभा आया, न हीरा। सुना न होगा?'
— 'धनिया बोली -- तो यहाँ कौन उन्हें बुलाने जाता है। होरी ने कहा -- तू बात तो समझती नहीं। अपने भाई लाख बुरे हों, हैं तो अपने भाई ही।'
— 'धनिया ने नाक सिकोड़कर कहा -- उनका नाम सुनकर मेरी देह में आग लग जाती है। सारा गाँव देखने आया, उन्हीं के पाँवों में मेंहदी लगी हुई थी।'
होरी ने रूपा को बुलाया और कहा -- 'ज़रा जाकर देख, हीरा काका आ गये कि नहीं। सोभा काका को भी देखती आना। कहना, दादा ने तुम्हें बुलाया है।'
— 'रूपा ठुनककर बोली -- छोटी काकी मुझे डाँटती है। होरी ने कहा -- तू अम्माँ की बेटी है कि दादा की? रूपा हँसी -- अम्माँ की।'
— 'होरी बोला -- तो फिर मेरी गोद से उतर जा। आज मैं तुझे अपनी थाली में न खिलाऊँगा। रूपा हुमककर बोली -- अच्छा, तुम्हारी।'
— 'होरी ने कहा -- तो जाकर हीरा और सोभा को खींच ला। रूपा कूदती हुई चली, पर रास्ते में धनिया तेल लिए मिल गयी और उसे घर लौटा लाई।'
— 'धनिया होरी से बोली -- मैंने तुमसे हज़ार बार कह दिया मेरे लड़कों को किसी के घर न भेजा करो। ऐसा ही बड़ा परेम है, तो आप क्यों नहीं जाते?'
— 'होरी ने अज्ञान का अभिनय किया -- किस बात पर बिगड़ती है भाई! यह तो अच्छा नहीं लगता कि अन्धे कूकर की तरह हवा को भूँका करे।'
रात हो चुकी थी। गाय मनमारे उदास बैठी थी। होरी और गोबर आधी-आधी रोटियाँ उसके लिए लाये, पर उसने सूँघा तक नहीं।
होरी बाहर खाट पर बैठ कर चिलम पीने लगा, तो फिर भाइयों की याद आयी। वह हीरा के घर की ओर चला।
दोनों अपने-अपने द्वार पर लेटे हुए थे। हीरा ने कहा -- 'जब तक एक में थे, एक बकरी भी नहीं ली। भाई का हक़ मारकर किसी को फलते-फूलते नहीं देखा।'
— 'सोभा बोला -- यह तुम अन्याय कर रहे हो हीरा! भैया ने एक-एक पैसे का हिसाब दे दिया था। हीरा ने कहा -- अच्छा तो यह रुपए कहाँ से आ गये?'
— 'हीरा बोला -- बेईमानी का धन जैसे आता है, वैसे ही जाता है। भगवान् चाहेंगे, तो बहुत दिन गाय घर में न रहेगी।'
होरी से और न सुना गया। वह बीती बातों को बिसारकर स्नेह भरे मन से आया था। इस आघात ने जैसे उसके हृदय में छेद कर दिया।
वह उलटे पाँव लौट आया। उसी उन्माद की दशा में वह अन्दर गया और गाय को खूँटे से खोल लिया। धनिया ने पूछा -- 'कहां लिये जाते हो रात को?'
— 'होरी ने कहा -- ले जाता हूँ भोला के घर। लौटा दूँगा। धनिया बोली -- क्यों बात क्या है? इतने अरमान से लाये और अब लौटाने जा रहे हो?'
— 'होरी ने उत्तर दिया -- चरचा हो रही है कि मैंने अलग होते समय रुपए दबा लिये थे। हीरा कहता होगा? होरी बोला -- सारा गाँव कह रहा है!'
— 'धनिया ने पगहिया छीन ली और बोली -- तुम्हें भाइयों का डर हो, तो जाकर उसके पैरों पर गिरो। मैं किसी से नहीं डरती। अगर गाय घर के बाहर निकली, तो अनर्थ हो जायगा।'
— 'धनिया ने डंके की चोट पर कहा -- रख लिये हमने रुपए, दबा लिये। हीरा और सोभा और संसार को जो करना हो, कर ले।'
धनिया क्रोध में बाहर हीरा के द्वार पर चली गयी। होरी वहीं सिर थामकर बैठ गया। कोलाहल प्रतिक्षण प्रचंड होता जाता था।
धनिया गरज रही थी -- 'तू हमें देखकर क्यों जलता है? पाल-पोसकर जवान कर दिया, यह उसका इनाम है?'
— 'हीरा ने जवाब दिया -- तेरे घर में कुत्तों की तरह एक टुकड़ा खाते थे और दिन-भर काम करते थे। तेरी-जैसी राच्छसिन के हाथ में पड़कर ज़िन्दगी तलख़ हो गयी।'
— 'धनिया और भी तेज़ हुई -- ज़बान सँभाल, नहीं जीभ खींच लूँगी। राच्छसिन तेरी औरत होगी। तू है किस फेर में मूँड़ी-काटे, टुकड़े-ख़ोर!'
दातादीन और पटवारी ने धनिया को टोकना चाहा, पर धनिया चौमुख लड़ाई लड़ने के लिए तैयार हो गयी।
— 'हीरा आपे से बाहर हो गया और बोला -- चली जा मेरे द्वार से, नहीं जूतों से बात करूँगा। झोंटा पकड़कर उखाड़ लूँगा। गाली देती है डाइन!'
होरी का ख़ून खौल उठा। आगे आकर बोला -- 'अच्छा बस, अब चुप हो जाओ हीरा, अब नहीं सुना जाता।' सारा गाँव हीरा के विरुद्ध हो गया।
— 'धनिया बोली -- सुन लो कान खोल के। यह मुझे जूतों से मारेगा। होरी ने डाँटा -- फिर क्यों बक-बक करने लगी तू! घर क्यों नहीं जाती?'
— 'धनिया ज़मीन पर बैठ गयी और आर्त स्वर में बोली -- अब तो इसके जूते खा के जाऊँगी। तू देख रहा है बेटा गोबर, तेरी माँ को जूते मारे जा रहे हैं!'
सहसा धनिया ने सिंहनी की भाँति झपटकर हीरा को इतने ज़ोर से धक्का दिया कि वह धम से गिर पड़ा। होरी ने धनिया का हाथ पकड़ा और घसीटता हुआ घर ले चला।
उधर गोबर खाना खाकर अहिराने में पहुँचा। आज झुनिया से उसकी बहुत-सी बातें हुई थीं। जब वह गाय लेकर चला था, तो झुनिया आधे रास्ते तक उसके साथ आयी थी।
गोबर अकेला गाय को कैसे ले जाता। अपरिचित व्यक्ति के साथ जाने में उसे आपत्ति होना स्वाभाविक था। कुछ दूर चलने के बाद झुनिया ने गोबर को मर्मभरी आँखों से देखकर कहा -- 'अब तुम काहे को यहाँ कभी आओगे।'
एक दिन पहले तक गोबर कुमार था। गाँव में जितनी युवतियाँ थीं, वह या तो उसकी बहनें थीं या भाभियाँ। बहनों से तो कोई छेड़छाड़ हो ही क्या सकती थी, भाभियाँ अलबत्ता कभी-कभी उससे ठठोली किया करती थीं।
लेकिन वह केवल सरल विनोद होता था। उनकी दृष्टि में अभी उसके यौवन में केवल फूल लगे थे। जब तक फल न लग जायँ, उस पर ढेले फेंकना व्यर्थ की बात थी।
और किसी ओर से प्रोत्साहन न पाकर उसका कौमार्य उसके गले से चिपटा हुआ था। झुनिया का वंचित मन, जिसे भाभियों के व्यंग और हास-विलास ने और भी लोलुप बना दिया था, उसके कौमार्य ही पर ललचा उठा।
और उस कुमार में भी पत्ता खड़कते ही किसी सोये हुए शिकारी जानवर की तरह यौवन जाग उठा।
— 'गोबर ने आवरण-हीन रसिकता के साथ कहा -- अगर भिक्षुक को भीभीख मिलने की आसा हो, तो वह दिन-भर और रात-भर दाता के द्वार पर खड़ा रहे।'
— 'झुनिया ने कटाक्ष करके कहा -- तो यह कहो तुम भी मतलब के यार हो।' गोबर की धमनियों का रक्त प्रबल हो उठा।
— 'गोबर बोला -- भूखा आदमी अगर हाथ फैलाये तो उसे क्षमा कर देना चाहिए।' झुनिया और गहरे पानी में उतरी।
— 'झुनिया बोली -- भिक्षुक जब तक दस द्वारे न जाय, उसका पेट कैसे भरेगा। मैं ऐसे भिक्षुकों को मुँह नहीं लगाती। ऐसे तो गली-गली मिलते हैं।'
— 'फिर भिक्षुक देता क्या है, असीस! असीसों से तो किसी का पेट नहीं भरता।' मन्द-बुद्धि गोबर झुनिया का आशय न समझ सका।
झुनिया छोटी-सी थी तभी से ग्राहकों के घर दूध लेकर जाया करती थी। ससुराल में उसे ग्राहकों के घर दूध पहुँचाना पड़ता था। आजकल भी दही बेचने का भार उसी पर था।
उसे तरह-तरह के मनुष्यों से साबिक़ा पड़ चुका था। दो-चार रुपए उसके हाथ लग जाते थे, घड़ी-भर के लिए मनोरंजन भी हो जाता था; मगर यह आनन्द जैसे मँगनी की चीज़ हो।
उसमें टिकाव न था, समर्पण न था, अधिकार न था। वह ऐसा प्रेम चाहती थी, जिसके लिए वह जिये और मरे, जिस पर वह अपने को समर्पित कर दे।
वह केवल जुगनू की चमक नहीं, दीपक का स्थायी प्रकाश चाहती थी। वह एक गृहस्थ की बालिका थी, जिसके गृहिणीत्व को रसिकों की लगावटबाज़ियों ने कुचल नहीं पाया था।
— 'गोबर ने कामना से उद्दीप्त मुख से कहा -- भिक्षुक को एक ही द्वार पर भरपेट मिल जाय, तो क्यों द्वार-द्वार घूमे?'
— 'झुनिया ने सदय भाव से उसकी ओर ताका। कितना भोला है, कुछ समझता ही नहीं। भिक्षुक को एक द्वार पर भरपेट कहाँ मिलता है। उसे तो चुटकी ही मिलेगी।'
— 'सर्बस तो तभी पाओगे, जब अपना सर्बस दोगे। गोबर ने पूछा -- मेरे पास क्या है झुनिया?'
— 'झुनिया बोली -- तुम्हारे पास कुछ नहीं है? मैं तो समझती हूँ, मेरे लिए तुम्हारे पास जो कुछ है, वह बड़े-बड़े लखपतियों के पास नहीं है।'
— 'तुम मुझसे भीख न माँगकर मुझे मोल ले सकते हो।' गोबर उसे चकित नेत्रों से देखने लगा।
— 'झुनिया ने फिर कहा -- और जानते हो, दाम क्या देना होगा? मेरा होकर रहना पड़ेगा। फिर किसी के सामने हाथ फैलाये देखूँगी, तो घर से निकाल दूँगी।'
गोबर को जैसे अँधेरे में टटोलते हुए इच्छित वस्तु मिल गयी। एक विचित्र भय-मिश्रित आनन्द से उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा।
लेकिन यह कैसे होगा? झुनिया को रख ले, तो रखेली को लेकर घर में रहेगा कैसे। बिरादरी का झंझट जो है। सारा गाँव काँव-काँव करने लगेगा।
बहुत होगा, लोग उसे अलग कर देंगे। वह अलग ही रहेगा। झुनिया जैसी औरत गाँव में दूसरी कौन है? कितनी समझदारी की बातें करती है।
क्या जानती नहीं कि मैं उसके जोग नहीं हूँ। फिर भी मुझसे प्रेम करती है। मेरी होने को राज़ी है। गाँववाले निकाल देंगे, तो क्या संसार में दूसरा गाँव ही नहीं है?
और गाँव क्यों छोड़े? मातादीन ने चमारिन बैठा ली, तो किसी ने क्या कर लिया। दातादीन दाँत कटकटाकर रह गये।
मातादीन ने इतना ज़रूर किया कि अपना धरम बचा लिया। अब भी बिना असनान-पूजा किये मुँह में पानी नहीं डालते। दोनों जून अपना भोजन आप पकाते हैं।
दातादीन और वह साथ बैठकर खाते हैं। झिंगुरीसिंह ने बाम्हनी रख ली, उनका किसी ने क्या कर लिया? उनका जितना आदर-मान तब था, उतना ही आज भी है।
बल्कि और बढ़ गया। पहले नौकरी खोजते फिरते थे। अब उसके रुपए से महाजन बन बैठे। ठकुराई का रोब तो था ही, महाजनी का रोब भी जम गया।
मगर फिर ख़्याल आया, कहीं झुनिया दिल्लगी न कर रही हो। पहले इसकी ओर से निश्चिन्त हो जाना आवश्यक था।
— 'उसने पूछा -- मन से कहती हो झूना कि ख़ाली लालच दे रही हो? मैं तो तुम्हारा हो चुका; लेकिन तुम भी हो जाओगी?'
— 'झुनिया ने पूछा -- तुम मेरे हो चुके, कैसे जानूँ? गोबर बोला -- तुम जान भी चाहो, तो दे दूँ।'
— 'झुनिया ने कहा -- जान देने का अरथ भी समझते हो? गोबर बोला -- तुम समझा दो न।'
— 'झुनिया बोली -- जान देने का अरथ है, साथ रहकर निबाह करना। एक बार हाथ पकड़कर उमिर भर निबाह करते रहना, चाहे दुनिया कुछ कहे।'
— 'चाहे माँ-बाप, भाई-बन्द, घर-द्वार सब कुछ छोड़ना पड़े। मुँह से जान देनेवाले बहुतों को देख चुकी। भौरों की भाँति फूल का रस लेकर उड़ जाते हैं।'
— 'झुनिया ने पूछा -- तुम भी वैसे ही न उड़ जाओगे?' गोबर के एक हाथ में गाय की पगहिया थी। दूसरे हाथ से उसने झुनिया का हाथ पकड़ लिया।
जैसे बिजली के तार पर हाथ गया हो। सारी देह यौवन के पहले स्पर्श से काँप उठी। कितनी मुलायम, गुदगुदी, कोमल कलाई!
झुनिया ने उसका हाथ हटाया नहीं, मानो इस स्पर्श का उसके लिए कोई महत्व ही न हो। फिर एक क्षण के बाद गम्भीर भाव से बोली -- 'आज तुमने मेरा हाथ पकड़ा है, याद रखना।'
— 'गोबर बोला -- ख़ूब याद रखूँगा झूना और मरते दम तक निबाहूँगा।'
— 'झुनिया अविश्वास-भरी मुस्कान से बोली -- इसी तरह तो सब कहते हैं गोबर! बल्कि इससे भी मीठे, चिकने शब्दों में। अगर मन में कपट हो, मुझे बता दो।'
— 'सचेत हो जाऊँ। ऐसों को मन नहीं देती। उनसे तो ख़ाली हँस-बोल लेने का नाता रखती हूँ। बरसों से दूध लेकर बाज़ार जाती हूँ।'
— 'एक-से-एक बाबू, महाजन, ठाकुर, वकील, अमले, अफ़सर अपना रसियापन दिखाकर मुझे फँसा लेना चाहते हैं। कोई छाती पर हाथ रखकर कहता है, झुनिया, तरसा मत।'
— 'कोई मुझे रसीली, नसीली चितवन से घूरता है, मानो मारे प्रेम के बेहोश हो गया है, कोई रुपए दिखाता है, कोई गहने। सब मेरी ग़ुलामी करने को तैयार रहते हैं।'
— 'लेकिन मैं उन सबों की नस पहचानती हूँ। सब-के-सब भौंरे रस लेकर उड़ जानेवाले। मैं भी उन्हें ललचाती हूँ, तिरछी नज़रों से देखती हूँ, मुसकराती हूँ।'
— 'वह मुझे गधी बनाते हैं, मैं उन्हें उल्लू बनाती हूँ। मैं मर जाऊँ, तो उनकी आँखों में आँसू न आयेगा। वह मर जायँ, तो मैं कहूँगी, अच्छा हुआ, निगोड़ा मर गया।'
— 'मैं तो जिसकी हो जाऊँगी, उसकी जनम-भर के लिए हो जाऊँगी, सुख में, दुःख में, सम्पत में, बिपत में, उसके साथ रहूँगी। हरजाई नहीं हूँ।'
— 'न रुपए की भूखी हूँ, न गहने-कपड़े की। बस भले आदमी का संग चाहती हूँ, जो मुझे अपना समझे और जिसे मैं भी अपना समझूँ।'
— 'एक पण्डित जी बहुत तिलक-मुद्रा लगाते हैं। आध सेर दूध लेते हैं। एक दिन उनकी घरवाली कहीं नेवते में गयी थी। और दिनों की तरह दूध लिये भीतर चली गयी।'
— 'वहाँ पुकारती हूँ, बहूजी, बहूजी! कोई बोलता ही नहीं। इतने में देखती हूँ तो पण्डितजी बाहर के किवाड़ बन्द किये चले आ रहे हैं। मैं समझ गयी इसकी नीयत ख़राब है।'
— 'मैंने डाँटकर पूछा -- तुमने किवाड़ क्यों बन्द कर लिये? क्या बहूजी कहीं गयी हैं? घर में सन्नाटा क्यों है? उसने कहा -- वह एक नेवते में गयी हैं।'
— 'और मेरी ओर दो पग और बढ़ आया। मैंने कहा -- तुम्हें दूध लेना हो तो लो, नहीं मैं जाती हूँ। बोला -- आज तो तुम यहाँ से न जाने पाओगी झूनी रानी।'
— 'बोला -- रोज़-रोज़ कलेजे पर छुरी चलाकर भाग जाती हो, आज मेरे हाथ से न बचोगी। तुमसे सच कहती हूँ, गोबर, मेरे रोएँ खड़े हो गये।'
— 'गोबर आवेश में बोला -- मैं बच्चा को देख पाऊं, तो खोदकर ज़मीन में गाड़ दूँ। ख़ून चूस लूँ। तुम मुझे दिखा तो देना।'
— 'झुनिया बोली -- सुनो तो, ऐसों का मुँह तोड़ने के लिए मैं ही काफ़ी हूँ। मेरी छाती धक-धक करने लगी। यह कुछ बदमासी कर बैठे, तो क्या करूँगी।'
— 'कोई चिल्लाना भी तो न सुनेगा; लेकिन मन में यह निश्चय न कर लिया था कि मेरी देह छुई, तो दूध की भरी हाँड़ी उसके मुँह पर पटक दूँगी।'
— 'बला से चार-पॉँच सेर दूध जायगा, बचा को याद तो हो जायगी। कलेजा मज़बूत करके बोली -- इस फेर में न रहना पण्डितजी! मैं अहीर की लड़की हूँ।'
— 'मूँछ का एक-एक बाल चुनवा लूँगी। यही लिखा है तुम्हारे पोथी-पत्रे में कि दूसरों की बहू-बेटी को अपने घर में बन्द करके बेईज़्ज़त करो।'
— 'लगा हाथ जोड़ने, पैरों पड़ने -- एक प्रेमी का मन रख दोगी, तो तुम्हारा क्या बिगड़ जायगा, झूना रानी! कभी-कभी ग़रीबों पर दया किया करो।'
— 'बोले, मैं विप्र हूँ, रुपए-पैसे का दान तो रोज़ ही पाता हूँ, आज रूप का दान दे दो। मैंने यों ही उसका मन परखने को कह दिया, मैं पचास रुपए लूँगी।'
— 'तुरन्त कोठरी में गया और दस-दस के पॉँच नोट निकालकर मेरे हाथों में देने लगा और जब मैंने नोट ज़मीन पर गिरा दिये और द्वार की ओर चली, तो उसने मेरा हाथ पकड़ लिया।'
— 'मैं तो पहले ही से तैयार थी। हाँड़ी उसके मुँह पर दे मारी। सिर से पाँव तक सराबोर हो गया। चोट भी ख़ूब लगी। सिर पकड़कर बैठ गया।'
— 'मैंने देखा, अब यह कुछ नहीं कर सकता, तो पीठ में दो लातें जमा दीं और किवाड़ खोलकर भागी। गोबर ठट्ठा मारकर बोला -- बहुत अच्छा किया तुमने।'
— 'गोबर बोला -- दूध से नहा गया होगा। तिलक-मुद्रा भी धुल गयी होगी। मूँछें भी क्यों न उखाड़ लीं?'
— 'झुनिया बोली -- दूसरे दिन मैं फिर उसके घर गयी। उसकी घरवाली आ गयी थी। अपने बैठक में सिर में पट्टी बाँधे पड़ा था।'
— 'मैंने कहा -- कहो तो कल की तुम्हारी करतूत खोल दूँ पण्डित ! लगा हाथ जोड़ने। मैंने कहा -- अच्छा थूककर चाटो, तो छोड़ दूँ।'
— 'सिर ज़मीन पर रगड़कर कहने लगा -- अब मेरी इज़्ज़त तुम्हारे हाथ है झूना, यही समझ लो कि पण्डिताइन मुझे जीता न छोड़ेंगी। मुझे भी उस पर दया आ गयी।'
— 'गोबर को उसकी दया बुरी लगी -- यह तुमने क्या किया? उसकी औरत से जाकर कह क्यों नहीं दिया? जूतों से पीटती। ऐसे पाखण्डियों पर दया न करनी चाहिए।'
— 'गोबर बोला -- तुम मुझे कल उनकी सूरत दिखा दो, फिर देखना कैसी मरम्मत करता हूँ।'
— 'झुनिया ने उसके अर्ध-विकसित यौवन को देखकर कहा -- तुम उसे न पाओगे। ख़ासा देव है। मुफ़्त का माल उड़ाता है कि नहीं।'
— 'गोबर डींग मारकर बोला -- मोटे होने से क्या होता है। यहाँ फ़ौलाद की हड्डियाँ हैं। तीन सौ डंड रोज़ मारता हूँ। अब तक सीना यों निकल आया होता।'
यह कहकर उसने छाती फैला कर दिखायी। झुनिया ने आश्वस्त आँखों से देखा -- 'अच्छा, कभी दिखा दूँगी। लेकिन यहाँ तो सभी एक-से हैं, तुम किस-किस की मरम्मत करोगे।'
— 'न जाने मरदों की क्या आदत है कि जहाँ कोई जवान, सुन्दर औरत देखी और बस लगे घूरने, छाती पीटने। और यह जो बड़े आदमी कहलाते हैं, ये तो निरे लम्पट होते हैं।'
— 'झुनिया बोली -- फिर मैं तो कोई सुन्दरी नहीं हूँ... । गोबर ने आपत्ति की -- तुम! तुम्हें देखकर तो यही जी चाहता है कि कलेजे में बिठा लें।'
— 'झुनिया ने उसकी पीठ में हलका-सा घूँसा जमाया -- लगे औरों की तरह तुम भी चापलूसी करने। मैं जैसी कुछ हूँ, वह मैं जानती हूँ।'
— 'मगर इन लोगों को तो जवान मिल जाय। गुन तो आदमी उसमें देखता है, जिसके साथ जनम-भर निबाह करना हो। आजकल बड़े घरों की विचित्र लीला है।'
— 'जिस महल्ले में मेरी ससुराल है, उसी में गपडू-गपडू नाम के कासमीरी रहते थे। उनके यहाँ पॉँच सेर दूध लगता था। उनकी तीन लड़कियाँ थीं।'
— 'तीनों बड़े कालिज में पढ़ने जाती थीं। एक साइत कालिज में पढ़ाती भी थी। सितार वह सब बजावें, हरमुनियाँ वह सब बजावें, नाचें वह, गावें वह; लेकिन ब्याह कोई न करती थी।'
— 'एक बार मैंने बड़ी बीबी से पूछा, तो हँसकर बोलीं -- हम लोग यह रोग नहीं पालते; मगर भीतर-ही-भीतर ख़ूब गुलछर्रे उड़ाती थीं।'
— 'जब देखूँ, दो-चार लौंडे उनको घेरे हुए हैं। जो सबसे बड़ी थी, वह तो कोट-पतलून पहनकर घोड़े पर सवार होकर मर्दो के साथ सैर करने जाती थी।'
— 'गपडू बाबू सिर नीचा किये रहते थे। लड़कियों को डाँटते थे; पर सब कहती थीं -- तुमको हमारे बीच में बोलने का कुछ मजाल नहीं है। हम अपने मन की रानी हैं।'
— 'बेचारा बाप क्या बोले। लेकिन भाई बड़े आदमियों की बातें कौन चलाये। वह जो कुछ करें, सब ठीक है। उन्हें तो बिरादरी और पंचायत का भी डर नहीं।'
— 'मेरी समझ में तो यही नहीं आता कि किसी का रोज़-रोज़ मन कैसे बदल जाता है। क्या आदमी गाय-बकरी से भी गया-बीता हो गया है?'
— 'लेकिन किसी को बुरा नहीं कहती भाई! मन को जैसा बनाओ, वैसा बनता है। ऐसों को भी देखती हूँ, जिन्हें रोज़-रोज़ की दाल-रोटी के बाद हलवा-पूरी भी चाहिए।'
— 'और ऐसों को भी देखती हूँ, जिन्हें घर की रोटी-दाल देखकर ज्वर आता है। कुछ बेचारियाँ ऐसी भी हैं, जो अपनी रोटी-दाल में ही मगन रहती हैं।'
— 'मेरी दोनों भावजों ही को देखो। हमारे भाई दस जवानों में एक जवान हैं; लेकिन भावजों को नहीं भाते। उन्हें तो वह चाहिए, जो सोने की बालियाँ बनवाये, रोज़ चाट खिलाये।'
— 'बालियाँ और मिठाइयाँ मुझे भी कम अच्छी नहीं लगतीं; लेकिन जो कहो कि इसके लिए अपनी लाज बेचती फिरूँ तो भगवान् इससे बचायँ।'
— 'एक के साथ मोटा-झोटा खा-पहनकर उमिर काट देना, बस अपना तो यही राग है। बहुत करके तो मर्द ही औरतों को बिगाड़ते हैं।'
— 'जब मर्द इधर-उधर ताक-झा़ँक करेगा तो औरत भी आँख लड़ायेगी। मर्द दूसरी औरतों के पीछे दौड़ेगा, तो औरत भी ज़रूर मर्दो के पीछे दौड़ेगी।'
— 'मर्द का हरजाईपन औरत को भी उतना ही बुरा लगता है, जितना औरत का मरद को। यही समझ लो।'
— 'मैंने तो अपने आदमी से साफ़-साफ़ कह दिया था, अगर तुम इधर-उधर लपके, तो मेरी भी जो इच्छा होगी वह करूँगी।'
— 'यह चाहो कि तुम तो अपने मन की करो और औरत को मार के डर से अपने क़ाबू में रखो, तो यह न होगा। तुम खुले-ख़ज़ाने करते हो, वह छिपकर करेगी।'
गोबर के लिए यह एक नयी दुनिया की बातें थीं। तन्मय होकर सुन रहा था। कभी-कभी तो आप-ही-आप उसके पाँव रुक जाते, फिर सचेत होकर चलने लगता।
झुनिया ने पहले अपने रूप से मोहित किया था। आज उसने अपने ज्ञान और अनुभव से भरी बातों और अपने सतीत्व के बखान से मुग्ध कर लिया।
ऐसी रूप, गुण, ज्ञान की आगरी उसे मिल जाय, तो धन्य भाग। फिर वह क्यों पंचायत और बिरादरी से डरे?
झुनिया ने जब देख लिया कि उसका गहरा रंग जम गया, तो छाती पर हाथ रखकर जीभ दाँत से काटती हुई बोली -- 'अरे, यह तो तुम्हारा गाँव आ गया! तुम भी बड़े मुरहे हो, मुझसे कहा भी नहीं कि लौट जाओ।'
यह कहकर वह लौट पड़ी। गोबर ने आग्रह करके कहा -- 'एक छन के लिए मेरे घर क्यों नहीं चली चलती? अम्माँ भी तो देख लें।'
— 'झुनिया ने लज्जा से आँखें चुराकर कहा -- तुम्हारे घर यों न जाऊँगी। मुझे तो यही अचरज होता है कि मैं इतनी दूर कैसे आ गयी।'
— 'अच्छा, बताओ अब कब आओगे? रात को मेरे द्वार पर अच्छी संगत होगी। चले आना, मैं अपने पिछवाड़े मिलूँगी।'
— 'और जो न मिली?' गोबर ने पूछा। झुनिया बोली -- 'तो लौट जाना।'
— 'तो फिर मैं न आऊँगा। झुनिया बोली -- आना पड़ेगा, नहीं कहे देती हूँ। गोबर बोला -- तुम भी वचन दो कि मिलोगी?'
— 'मैं वचन नहीं देती। तो मैं भी नहीं आता। झुनिया बोली -- मेरी बला से!'
झुनिया अँगूठा दिखाकर चल दी। प्रथम-मिलन में ही दोनों एक दूसरे पर अपना-अपना अधिकार जमा चुके थे।
झुनिया जानती थी, वह आयेगा, कैसे न आयेगा? गोबर जानता था, वह मिलेगी, कैसे न मिलेगी? गोबर जब अकेला गाय को हाँकता हुआ चला, तो ऐसा लगता था, मानो स्वर्ग से गिर पड़ा है।
जेठ की उदास और गर्म सन्ध्या सेमरी की सड़कों और गलियों में पानी के छिड़काव से शीतल और प्रसन्न हो रही थी। मंडप के चारों तरफ़ फूलों और पौधों के गमले सजा दिये गये थे और बिजली के पंखे चल रहे थे।
राय साहब अपने कारख़ाने में बिजली बनवा लेते थे। उनके सिपाही पीली वर्दियाँ डाटे, नीले साफ़े बाँधे, जनता पर रोब जमाते फिरते थे। नौकर उजले कुरते पहने और केसरिया पाग बाँधे, मेहमानों और मुखियों का आदर-सत्कार कर रहे थे।
उसी वक़्त एक मोटर सिंह-द्वार के सामने आकर रुकी और उसमें से तीन महानुभाव उतरे। वह जो खद्दर का कुरता और चप्पल पहने हुए हैं उनका नाम पिण्डत ओंकारनाथ है। आप दैनिक-पत्र 'बिजली' के यशस्वी सम्पादक हैं।
दूसरे महाशप जो कोट-पैंट में हैं, वह हैं तो वकील, पर वकालत न चलने के कारण एक बीमा-कम्पनी की दलाली करते हैं और ताल्लुक़ेदारों को महाजनों और बैंकों से क़रज़ दिलाने में वकालत से कहीं ज़्यादा कमाई करते हैं। इनका नाम है श्यामबिहारी तंखा।
तीसरे सज्जन जो रेशमी अचकन और तंग पाजामा पहने हुए हैं, मिस्टर बी. मेहता, युनिवर्सिटी में दर्शनशास्त्र के अध्यापक हैं। ये तीनों सज्जन राय साहब के सहपाठियों में हैं और शगुन के उत्सव में निमंत्रित हुए हैं।
आज सारे इलाक़े के असामी आयेंगे और शगुन के रुपए भेंट करेंगे। रात को धनुष-यज्ञ होगा और मेहमानों की दावत होगी।
होरी ने पाँच रुपए शगुन के दे दिये हैं और एक गुलाबी मिरज़ई पहने, गुलाबी पगड़ी बाँधे, घुटने तक कछनी काछे, हाथ में एक खुरपी लिये और मुख पर पाउडर लगवाये राजा जनक का माली बन गया है।
वह गरूर से इतना फूल उठा है मानो यह सारा उत्सव उसी के पुरुषार्थ से हो रहा है। राय साहब ने मेहमानों का स्वागत किया। दोहरे बदन के ऊँचे आदमी थे, गठा हुआ शरीर, तेजस्वी चेहरा, ऊँचा माथा, गोरा रंग।
— 'पिण्डत ओंकारनाथ ने पूछा -- अबकी कौन-सा नाटक खेलने का विचार है? मेरे रस की तो यहाँ वही वस्तु है।'
— 'राय साहब ने तीनों सज्जनों को कुसिर्यों पर बैठाते हुए कहा -- पहले तो धनुष-यज्ञ होगा, उसके बाद एक प्रहसन। नाटक कोई अच्छा न मिला। कोई तो इतना लम्बा कि पाँच घंटों में भी ख़तम न हो और कोई इतना क्लिष्ट कि शायद यहाँ एक व्यक्ति भी उसका अर्थ न समझे।'
— 'आख़िर मैंने स्वयम् एक प्रहसन लिख डाला, जो दो घंटों में पूरा हो जायगा।' ओंकारनाथ को राय साहब की रचना-शक्ति में बहुत सन्देह था। उन्होंने उपेक्षा के साथ मुँह फेर लिया।
— 'मिस्टर तंखा बोले -- नाटक कोई भी अच्छा हो सकता है, अगर उसके अभिनेता अच्छे हों। जब तक स्टेज पर शिक्षित अभिनेत्रियाँ नहीं आतीं, हमारी नाट्य-कला का उद्धार नहीं हो सकता।'
— 'अबकी तो आपने कौंसिल में प्रश्नों की धूम मचा दी। मैं तो दावे के साथ कह सकता हूँ कि किसी मेम्बर का रिकार्ड इतना शानदार नहीं है।' मिस्टर मेहता इस प्रशंसा को सहन न कर सके।
— 'बोले -- भाई, मैं प्रश्नों का कायल नहीं। मैं चाहता हूँ हमारा जीवन हमारे सिद्धान्तों के अनुकूल हो। आप कृषकों के शुभेच्छु हैं, उन्हें तरह-तरह की रियायत देना चाहते हैं, फिर भी आप ज़मींदार हैं।'
— 'अगर आपकी धारणा है कि कृषकों के साथ रियायत होनी चाहिए, तो पहले आप ख़ुद शुरू करें -- काश्तकारों को बग़ैर नज़राने लिए पट्टे लिख दें, बेगार बन्द कर दें, चरावर ज़मीन छोड़ दें।'
— 'मुझे उन लोगों से ज़रा भी हमददीर् नहीं है, जो बातें तो करते हैं कम्युनिस्टों की-सी, मगर जीवन है रईसों का-सा, उतना ही विलासमय, उतना ही स्वार्थ से भरा हुआ।' राय साहब को आघात पहुँचा।
— 'तंखा ने राय साहब की वकालत की -- मैं समझता हूँ, राय साहब का अपने असामियों के साथ जितना अच्छा व्यवहार है, अगर सभी ज़मींदार वैसे ही हो जायँ, तो यह प्रश्न ही न रहे।'
— 'मेहता ने कहा -- मानता हूँ, आपका अपने असामियों के साथ बहुत अच्छा बतार्व है, मगर प्रश्न यह है कि उसमें स्वार्थ है या नहीं। गुड़ से मारनेवाला ज़हर से मारनेवाले की अपेक्षा कहीं सफल हो सकता है।'
— 'मैं तो केवल इतना जानता हूँ, हम या तो साम्यवादी हैं या नहीं हैं। हैं तो उसका व्यवहार करें, नहीं हैं, तो बकना छोड़ दें। मैं नक़ली ज़िन्दगी का विरोधी हूँ।'
— 'अगर मांस खाना अच्छा समझते हो तो खुलकर खाओ। बुरा समझते हो, तो मत खाओ। अच्छा समझना और छिपकर खाना, इसे मैं कायरता और धूर्तता कहता हूँ।'
राय साहब अपमान और आघात को धैर्य से सहने के अभ्यस्त थे। बोले -- 'आपका विचार बिल्कुल ठीक है मेहताजी। आप जानते हैं, मैं आपकी साफ़गोई का कितना आदर करता हूँ।'
— 'लेकिन आप यह भूल जाते हैं कि विचारों की यात्रा में भी पड़ाव होते हैं। मेरे स्वर्गवासी पिता असामियों पर दया करते थे, अनाज खिलाते थे, कन्याओं के विवाह में मदद देते थे।'
— 'मगर उसी वक़्त तक, जब तक प्रजा उनको सरकार और धमार्वतार कहती रहे, उन्हें अपना देवता समझकर उनकी पूजा करती रहे। अधिकार के नाम पर वह कौड़ी का एक दाँत भी फोड़कर देना न चाहते थे।'
— 'मैं व्यवहार में चाहे जो कुछ करूँ, विचारों में उनसे आगे बढ़ गया हूँ। मैं मानने लग गया हूँ कि जब तक किसानों को रियायतें अधिकार के रूप में न मिलेंगी, सद्भावना से उनकी दशा सुधर नहीं सकती।'
— 'मैं ख़ुद सद्भावना करते हुए भी स्वार्थ नहीं छोड़ सकता और चाहता हूँ कि हमारे वर्ग को शासन और नीति के बल से स्वार्थ छोड़ने के लिए मज़बूर कर दिया जाय। इसे मैं विवशता कहता हूँ।'
— 'मैं इसे स्वीकार करता हूँ कि किसी को भी दूसरे के श्रम पर मोटे होने का अधिकार नहीं है। समाज की ऐसी व्यवस्था, जिसमें कुछ लोग मौज करें और अधिक लोग पीसें, कभी सुखद नहीं हो सकती।'
— 'पूँजी और शिक्षा का क़िला जितनी जल्द टूट जाय, उतना ही अच्छा है। जिन्हें पेट की रोटी मयस्सर नहीं, उनके अफ़सर दस-दस हज़ार फटकारें, यह हास्यास्पद है और लज्जास्पद भी।'
— 'इस व्यवस्था ने हम ज़मींदारों में विलासिता, दुराचार और निर्लज्जता भर दी है। इस शान को निभाने के लिए हमें अपनी आत्मा की हत्या करनी पड़ती है। हममें आत्माभिमान नहीं रहा।'
— 'हम अपने असामियों को लूटने के लिए मज़बूर हैं। अफ़सरों को डालियाँ न दें, तो बागी समझे जायँ। बस, हमारी दशा उन बच्चों की-सी है, जिन्हें चम्मच से दूध पिलाकर पाला जाता है।'
— 'मेहता ने ताली बजाकर कहा -- हियर, हियर! आपकी ज़बान में जितनी बुद्धि है, काश उसकी आधी भी मस्तिष्क में होती! खेद यही है कि आप विचारों को व्यवहार में नहीं लाते।'
— 'ओंकारनाथ बोले -- अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। हमें समय के साथ चलना भी है और उसे चलाना भी। आप ही क्यों आठ सौ रुपए महीने हड़पते हैं?'
राय साहब ने सम्पादकजी को देखा और बोले -- 'व्यक्तिगत बातों पर आलोचना न कीजिए सम्पादक जी! हम यहाँ समाज की व्यवस्था पर विचार कर रहे हैं।'
— 'मिस्टर मेहता बोले -- नहीं-नहीं, मैं इसे बुरा नहीं समझता। समाज व्यक्ति ही से बनता है। मैं इसलिये इतना वेतन लेता हूँ कि मेरा इस व्यवस्था पर विश्वास नहीं है।'
— 'सम्पादकजी बोले -- अच्छा, तो आप वर्तमान व्यवस्था के समर्थक हैं? मेहता ने कहा -- मैं इस सिद्धान्त का समर्थक हूँ कि संसार में छोटे-बड़े हमेशा रहेंगे।'
— 'इसे मिटाने की चेष्टा करना मानव-जाति के सर्वनाश का कारण होगा। ओंकारनाथ बोले -- आप इस बीसवीं शताब्दी में भी ऊँच-नीच का भेद मानते हैं।'
— 'मेहता ने कहा -- जी हाँ, मानता हूँ। बुद्ध, प्लेटो और ईसा सभी समता के प्रवर्तक थे। सभी सभ्यताओं ने इसकी परीक्षा की पर अप्राकृतिक होने के कारण स्थायी न बन सकी।'
— 'ओंकारनाथ बोले -- आपकी बातें सुनकर मुझे आश्चर्य हो रहा है। मेहता ने जवाब दिया -- आश्चर्य अज्ञान का दूसरा नाम है।'
— 'ओंकारनाथ बोले -- मैं आपका कृतज्ञ हूँ! अगर आप इस विषय पर कोई लेखमाला शुरू कर दें। मेहता बोले -- जी, मैं इतना अहमक नहीं हूँ, अच्छी रक़म दिलवाइए, तो अलबत्ता।'
— 'ओंकारनाथ ने कहा -- आपने सिद्धान्त ही ऐसा लिया है कि खुले ख़ज़ाने पब्लिक को लूट सकते हैं।'
— 'मेहता बोले -- मुझमें और आपमें अन्तर इतना ही है कि मैं जो मानता हूँ उस पर चलता हूँ। आप लोग मानते कुछ हैं, करते कुछ हैं। बुद्धि, चरित्र और प्रतिभा को बराबर फैलाना आपकी शक्ति के बाहर है।'
— 'छोटे-बड़े का भेद केवल धन से ही नहीं होता। मैंने बड़े-बड़े धन-कुबेरों को भिक्षुकों के सामने घुटने टेकते देखा है। बुद्धि तब भी राज करती थी, अब भी करती है और हमेशा करेगी।'
राय साहब ने मेहमानों को पान और इलायची देते हुए कहा -- 'बुद्धि अगर स्वार्थ से मुक्त हो, तो हमें उसकी प्रभुता मानने में कोई आपित्त नहीं। हम साधु-महात्माओं के सामने इसीलिए सिर झुकाते हैं।'
— 'हम बुद्धि के हाथ में अधिकार और सम्मान देना चाहते हैं; लेकिन सम्पत्ति किसी तरह नहीं। हम केवल इस बिच्छू का डंक तोड़ देना चाहते हैं।'
दूसरी मोटर आ पहुँची और मिस्टर खन्ना उतरे, जो एक बैंक के मैनेजर और शक्करमिल के मैनेजिंग डाइरेक्टर हैं। दो देवियाँ भी उनके साथ थीं। कामिनी खन्ना खद्दर की साड़ी पहने गम्भीर दिख रही थीं।
दूसरी महिला मिस मालती थीं, जो ऊँची एड़ी का जूता पहने हुई थीं। आप इंगलैंड से डाक्टरी पढ़ आयी हैं। आप नवयुग की साक्षात् प्रतिमा, चपल, हाज़िर-जवाब और पुरुष-मनोविज्ञान की जानकार थीं।
— 'मिस मालती ने मेहता से हाथ मिलाते हुए कहा -- सच कहती हूँ, आप सूरत से ही फ़िलासफ़र मालूम होते हैं। फ़िलासफ़रों में सहृदयता क्यों ग़ायब हो जाती है?'
मेहता झेंप गये। वे महिलाओं से घबराते थे। मिस्टर खन्ना ने पूछा -- 'फ़िलासफ़रों की सूरत में क्या ख़ास बात होती है देवीजी?'
— 'मालती ने कहा -- फ़िलासफ़र हमेशा मुर्दा-दिल होते हैं। आपकी तरफ़ ताकेंगे, मगर आपको देखेंगे नहीं। जैसे शून्य में उड़ रहे हों।' सब लोगों ने क़हक़हा मारा।
मालती ने आक्सफ़ोर्ड के अपने प्रोफ़ेसर मिस्टर हसबेंड की कहानी सुनाई जो स्त्रियों से बहुत घबराते थे और उनकी बहन को उन्हें भोजन के लिए ज़बरदस्ती खींचकर लाना पड़ता था।
— 'राय साहब बोले -- मगर मेहता साहब तो बड़े ख़ुशमिज़ाज हैं। मालती ने कहा -- तो आप फ़िलासफ़र न होंगे। विश्व की चिन्ता सिर पर लादकर कोई कैसे प्रसन्न रह सकता है!'
उधर सम्पादकजी श्रीमती खन्ना से अपनी आर्थिक कठिनाइयों की कथा कह रहे थे। सम्पादकजी ने ही उन्हें प्रोत्साहित करके कवि बनाया था।
— 'कामिनी खन्ना ने पूछा -- आपने कभी मिस मालती से कुछ लिखने को नहीं कहा? सम्पादकजी बोले -- उनका समय मूल्यवान है। लिखते तो वे हैं, जिनके अन्दर कुछ दर्द है।'
— 'कामिनी ने कहा -- अगर आप उनसे कुछ लिखा सकें, तो आपका प्रचार दुगना हो जाय। सम्पादकजी बोले -- साहित्य की सेवा अपने जीवन का ध्येय है। ख़ुशामद से मुझे घृणा है।'
राय साहब ने सम्पादकजी को पुकारा और मालती से मिलवाया। मालती ने कहा -- 'दुनिया में मुझे सबसे ज़्यादा डर सम्पादकों से लगता है। आप लोग जिसे चाहें, एक क्षण में बिगाड़ दें।'
— 'ओंकारनाथ बोले -- उसकी क़लम उसी वक़्त विश्राम लेगी, जब उसकी जीवन-यात्रा समाप्त हो जायगी। उसने अनीति को जड़ से खोदकर फेंक देने का ज़िम्मा लिया है।'
— 'मिस मालती ने उकसाया -- अधिकारियों का सहयोग प्राप्त करें। सरकारी दावतों में निमंत्रित होने लगें तो यही रईस आपके द्वार के चक्कर लगायेंगे।'
— 'ओंकारनाथ बोले -- यही तो मैं नहीं कर सकता। मैंने अपने सिद्धान्तों को सदैव ऊँचा और पवित्र रखा है। मैं सिद्धान्त के पुजारियों में हूँ।'
— 'मालती ने पूछा -- तो आपके पत्र में विदेशी वस्तुओं के विज्ञापन क्यों होते हैं? आप सिद्धान्तवादी बनते हैं, पर देश का धन विदेश भेजते हुए आपको खेद नहीं होता?'
ओंकारनाथ के पास कोई जवाब न था। मेहता खिल उठे। उन्हें लगा कि इस रमणी में विचार की शक्ति भी है। मालती ने मेहता को फ़िलासफ़र होने की चुनौती दी।
— 'मेहता बोले -- धन मेरे लिए केवल साधन है। मुझे धन की इच्छा नहीं। ओंकारनाथ ने कहा -- हर मज़दूर कह सकता है कि उसे काम के लिए एक हज़ार की ज़रूरत है।'
— 'मालती ने मेहता से पूछा -- आप शादी क्यों नहीं कर लेते? मेहता बोले -- विवाह तो आत्मा को और जीवन को पिंजरे में बन्द कर देता है।'
— 'मेहता ने आगे कहा -- विवाह को मैं सामाजिक समझौता समझता हूँ। समाज की दृष्टि से विवाहित जीवन श्रेष्ठ है, व्यक्ति की दृष्टि से अविवाहित जीवन।'
भोजन की तैयारी शुरू हो गयी। सभी जातियों के लोग साथ भोजन करने बैठे। केवल सम्पादक ओंकारनाथ अलग फलाहार करने गये और कामिनी खन्ना ने सिर दर्द के कारण मना कर दिया।
मिरज़ा खुर्शेद भी वहाँ मौजूद थे। वे सूफ़ी मुसलमान थे, हज कर आये थे पर शराब ख़ूब पीते थे। मालती ने उन्हें सम्पादकजी को बुलाकर शराब पिलाने की चुनौती दी।
— 'मिरज़ाजी ने चन्दा इकट्ठा करना शुरू किया। खन्ना की जेब से पाँच रुपए निकले। मेहता ने मिसेज़ खन्ना से पाँच सौ रुपए वसूल कर लिए।'
— 'मेहता ने बताया कि उन्होंने मिसेज़ खन्ना से कहा कि ब्रिज में अँगूठी दाँव पर है और वे पाँच सौ देकर उसे बचा लें। इस तरह चन्दा पूरा हुआ।'
सम्पादकजी हाल में आये। मालती ने उनकी बहुत प्रशंसा की और उन्हें 'देहात-सुधार संघ' का सभापति बनने का प्रस्ताव दिया। ओंकारनाथ नशे में झूमने लगे।
— 'मालती ने कहा -- हम ओंकारनाथजी में सच्चा गुरु पाते हैं। आज हमें अपने अहंकार को तिलांजलि दे देनी चाहिए। हममें आज से कोई भेदभाव नहीं है।'
— 'मालती ने ओंकारनाथ को शराब का ग्लास दिया। ओंकारनाथ ने समय के साथ चलने के विचार से उसे पी लिया। सबने कमाल है कहकर शोर मचाया।'
शराब पीते ही सम्पादकजी बहकने लगे। उन्होंने मिरज़ाजी को क़सीदा पढ़ने से मना कर दिया और मालती के चरणों में गिर पड़े। उन्हें उनके कमरे में लिटा दिया गया।
अचानक एक अफ़गान (पठान) कमरे में आया। वह गरजकर बोला -- 'अमारे आदमी को लूट लिया गया है। सरदार को बुलाओ। अमारा रुपया नहीं देगा, तो अम सबको क़तल कर देगा।'
— 'पठान ने मालती को उठा ले जाने की धमकी दी। राय साहब ने कहा कि हम चोर नहीं हैं। पठान बोला -- काउंसिल का मेम्बर को अम पैरों से कुचल देता है।'
मजलिस पर आतंक छा गया। मालती और खन्ना डर के मारे काँप रहे थे। राय साहब ने पठान को थाने जाने की सलाह दी, पर वह बन्दूक़ तानकर खड़ा रहा।
— 'मालती ने पुरुषों को कायर कहा। खन्ना ने कहा कि एक हज़ार देकर इसे बिदा कर दो। राय साहब पठान से भिड़ने को तैयार थे।'
— 'पठान ने मालती का हाथ पकड़कर खींचा। उसी वक़्त होरी (राजा जनक का माली) कमरे में आया। उसने पठान को अड़ंगा मारकर ज़मीन पर गिरा दिया।'
होरी पठान की छाती पर चढ़ बैठा और उसकी दाढ़ी खींच ली। दाढ़ी हाथ में आ गयी। पठान ने कुलाह उतार दी।
— 'मालती ने कहा -- मेरा दिल अभी तक धड़-धड़ कर रहा है। मेहता मुस्कराते हुए बोले -- ज़रा इन भले आदमियों की जवाँमर्दी की परीक्षा ले रहा था।'