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गोदान भाग - 2

यह अभिनय जब समाप्त हुआ, तो उधर रंगशाला में धनुष-यज्ञ समाप्त हो चुका था और सामाजिक प्रहसन की तैयारी हो रही थी; मगर इन सज्जनों को उससे विशेष दिलचस्पी न थी। केवल मिस्टर मेहता देखने गये और आदि से अन्त तक जमे रहे।

उन्हें बड़ा मज़ा आ रहा था। बीच-बीच में तालियाँ बजाते थे और 'फिर कहो, फिर कहो' का आग्रह करके अभिनेताओं को प्रोत्साहन भी देते जाते थे। राय साहब ने इस प्रहसन में एक मुक़दमेबाज़ देहाती ज़मींदार का ख़ाका उड़ाया था।

कहने को तो प्रहसन था; मगर करुणा से भरा हुआ। नायक का बात-बात में क़ानून की धाराओं का उल्लेख करना, पत्नी पर केवल इसलिए मुक़दमा दायर कर देना कि उसने भोजन तैयार करने में ज़रा-सी देर कर दी।

फिर वकीलों के नख़रे और देहाती गवाहों की चालाकियाँ और झाँसे, पहले गवाही के लिए चट-पट तैयार हो जाना; मगर इजलास पर तलबी के समय ख़ूब मनावन कराना और नाना प्रकार के फ़रमाइशें करके उल्लू बनाना।

ये सभी दृश्य देखकर लोग हँसी के मारे लोटे जाते थे। सबसे सुन्दर वह दृश्य था, जिसमें वकील गवाहों को उनके बयान रटा रहा था। गवाहों का बार-बार भूलें करना, वकील का बिगड़ना।

फिर नायक का देहाती बोली में गवाहों को समझाना और अन्त में इजलास पर गवाहों का बदल जाना, ऐसा सजीव और सत्य था कि मिस्टर मेहता उछल पड़े और तमाशा समाप्त होने पर नायक को गले लगा लिया।

उन्होंने सभी नटों को एक-एक मेडल देने की घोषणा की। राय साहब के प्रति उनके मन में श्रद्धा के भाव जाग उठे। राय साहब स्टेज के पीछे ड्रामे का संचालन कर रहे थे।

— 'मेहता दौड़कर उनके गले लिपट गये और मुग्ध होकर बोले -- आपकी दृष्टि इतनी पैनी है, इसका मुझे अनुमान न था।'

दूसरे दिन जलपान के बाद शिकार का प्रोग्राम था। वहीं किसी नदी के तट पर बाग़ में भोजन बने, ख़ूब जल-क्रीड़ा की जाय और शाम को लोग घर आयँ। देहाती जीवन का आनन्द उठाया जाय।

जिन मेहमानों को विशेष काम था, वह तो बिदा हो गये, केवल वे ही लोग बच रहे जिनकी राय साहब से घनिष्टता थी। मिसेज़ खन्ना के सिर में दर्द था, न जा सकीं।

सम्पादकजी इस मंडली से जले हुए थे और इनके विरुद्ध एक लेख-माला निकालकर इनकी ख़बर लेने के विचार में मग्न थे। सब-के-सब छटे हुए गुंडे हैं। हराम के पैसे उड़ाते हैं और मूछों पर ताव देते हैं।

दुनिया में क्या हो रहा है, इन्हें क्या ख़बर। इनके पड़ोस में कौन मर रहा है, इन्हें क्या परवा। इन्हें तो अपने भोग-विलास से काम है।

जिसको यह फ़िक्र दबाये डालती है कि लड़कों का ब्याह कैसे हो, या बीमार स्त्री के लिए वैद्य कैसे आयँ या अब की घर का किराया किसके घर से आएगा, वह अपना जीवन कैसे सम्पूर्ण बनाये!

छूटे साँड़ बने दूसरों के खेत में मुँह मारते फिरते हो और समझते हो संसार में सब सुखी हैं। तुम्हारी आँखें तब खुलेंगी, जब क्रान्ति होगी और तुमसे कहा जायगा -- बचा, खेत में चलकर हल जोतो।

और वह जो है मालती, जो बहत्तर घाटों का पानी पीकर भी मिस बनी फिरती है! शादी नहीं करेगी, इससे जीवन बन्धन में पड़ जाता है। बस जीवन का पूरा विकास इसी में है कि दुनिया को लूटे जाओ।

सारे बन्धन तोड़ दो, धर्म और समाज को गोली मारो, जीवन के कर्तव्यों को पास न फटकने दो, बस तुम्हारा जीवन सम्पूर्ण हो गया। माँ-बाप से नहीं पटती, उन्हें धता बताओ।

मगर टैक्स क्यों देते हो? क़ानून भी तो बन्धन है, उसे क्यों नहीं तोड़ते? उससे क्यों कन्नी काटते हो। जानते हो न कि क़ानून की ज़रा भी अवज्ञा की और बेड़ियाँ पड़ जायँगी।

बस वही बन्धन तोड़ो, जिसमें अपनी भोग-लिप्सा में बाधा नहीं पड़ती। रस्सी को साँप बनाकर पीटो और तीस मारखाँ बनो। जीते साँप के पास जाओ ही क्यों वह फूकार भी मारेगा।

आठ बजे शिकार-पार्टी चली। खन्ना ने कभी शिकार न खेला था, बन्दूक़ की आवाज़ से काँपते थे; लेकिन मिस मालती जा रही थीं, वह कैसे रुक सकते थे।

मिस्टर तंखा को अभी तक एलेक्शन के विषय में बातचीत करने का अवसर न मिला था। राय साहब अपने इस इलाक़े में बहुत दिनों से नहीं गये थे। वहाँ का रंग-ढंग देखना चाहते थे।

मिरज़ा खुर्शेद को जीवन के नये अनुभव प्राप्त करने का शौक़ था। मिस मालती अकेले कैसे रहतीं। उन्हें तो रसिकों का जमघट चाहिए। केवल मिस्टर मेहता शिकार खेलने के सच्चे उत्साह से जा रहे थे।

राय साहब की इच्छा तो थी कि भोजन की सामग्री, रसोईया, सब साथ चलें, लेकिन मिस्टर मेहता ने उसका विरोध किया। खन्ना ने कहा -- 'आख़िर वहाँ भोजन करेंगे या भूखों मरेंगे?'

— 'मेहता ने जवाब दिया -- भोजन क्यों न करेंगे, लेकिन आज हम लोग ख़ुद अपना सारा काम करेंगे। देखना तो चाहिए कि नौकरों के बग़ैर हम ज़िन्दा रह सकते हैं या नहीं।'

— 'मिस मालती पकायँगी और हम लोग खायँगे। देहातों में हाँडियाँ और पत्तल मिल ही जाते हैं, और ईधन की कोई कमी नहीं। शिकार हम करेंगे ही।'

— 'मालती ने गिला किया -- क्षमा कीजिए। आपने रात मेरी क़लाई इतने ज़ोर से पकड़ी कि अभी तक दर्द हो रहा है।'

— 'मेहता बोले -- काम तो हम लोग करेंगे, आप केवल बताती जाइएगा। मिरज़ा खुर्शेद बोले -- अजी आप लोग तमाशा देखते रहिएगा, मैं सारा इन्तज़ाम कर दूँगा।'

यही प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। दो मोटरें चलीं। एक मिस मालती ड्राइव कर रही थीं, दूसरी ख़ुद राय साहब। कोई बीस-पचीस मील पर पहाड़ी प्रान्त शुरू हो गया।

दूर से नदी का पाट नज़र आया। एक घने वटवृक्ष की छाँह में कारें रोक दी गयीं और लोग उतरे। यह सलाह हुई कि दो-दो की टोली बने और शिकार खेलकर बारह बजे तक यहाँ आ जाय।

मिस मालती मेहता के साथ चलने को तैयार हो गयीं। खन्ना मन में ऐंठकर रह गये। राय साहब का साथ रोचक न होते हुए भी बुरा न था। खुर्शेद और तंखा की टोली बनी-बनायी थी।

— 'कुछ दूर चलने के बाद मालती ने कहा -- तुम तो चले ही जाते हो। ज़रा दम ले लेने दो। मेहता मुस्कराये -- अभी तो हम एक मील भी नहीं आये।'

— 'मालती बोली -- थकीं नहीं; लेकिन क्यों न ज़रा दम ले लो। मेहता ने कहा -- जब तक कोई शिकार हाथ न आ जाय, हमें आराम करने का अधिकार नहीं।'

— 'मालती ने कहा -- मैं शिकार खेलने न आयी थी। मेहता ने अनजान बनकर पूछा -- फिर क्या करने आयी थीं? मालती बोली -- अब तुमसे क्या बताऊँ।'

हिरनों का एक झुंड चरता हुआ नज़र आया। दोनों एक चट्टान की आड़ में छिप गये और निशाना बाँधकर गोली चलायी। निशाना ख़ाली गया। झुंड भाग निकला।

— 'मालती ने ज़रा रुककर कहा -- गर्मी के मारे बुरा हाल हो रहा है। आओ, इस वृक्ष के नीचे बैठ जायँ। मेहता बोले -- अभी नहीं। तुम बैठना चाहती हो, तो बैठो।'

— 'मालती बोली -- बड़े निर्दयी हो तुम। मेहता बोले -- जब तक कोई शिकार न मिल जाय, मैं बैठ नहीं सकता। मालती बोली -- तब तो तुम मुझे मार ही डालोगे।'

— 'मालती ने पूछा -- रात तुमने मुझे इतना क्यों सताया? याद है, तुमने मुझे क्या कहा था -- तुम हमारे साथ चलेगा दिलदार? सच कहना, तुम उस वक़्त मुझे अपने साथ ले जाते?'

मेहता ने कोई जवाब न दिया। मालती थककर बैठ गयी। मेहता बोले -- 'अच्छी बात है, तुम आराम कर लो। मैं यहीं आ जाऊँगा।' मालती ने पूछा -- 'मुझे अकेले छोड़कर चले जाओगे?'

— 'मेहता ने कहा -- मैं जानता हूँ, तुम अपनी रक्षा कर सकती हो। नये युग की देवियों की यही सिफ़त है। वह मर्द का आश्रय नहीं चाहतीं।'

— 'मालती ने झेंपते हुए कहा -- तुम कोरे फ़िलासफ़र हो मेहता। मेहता ने एक मोर पर निशाना साधा पर वह उड़ गया। मालती बोली -- बहुत अच्छा हुआ। मेरा शाप पड़ा।'

— 'मेहता बोले -- तुमने अपने आपको शाप दिया। अब तो तुमको फ़ौरन चलना पड़ेगा।' मालती मेहता का हाथ पकड़कर बोली -- 'तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते।'

मेहता ने हाथ छुड़ा लिया और आगे बढ़े। मालती झुँझलाकर उनके पीछे दौड़ी। समीप आकर बोली -- 'मैं तुम्हें इतना पशु न समझती थी।' मेहता बोले -- 'मैं जो हिरन मारूँगा, उसकी खाल तुम्हें भेंट करूँगा।'

एक चौड़ा नाला बीच में था। धार में बहुत वेग था। मालती ने कहा -- 'अब तो लौटना पड़ा।' मेहता बोले -- 'क्यों? उस पार चलेंगे। तुम यहीं बैठो, मैं जाता हूँ।'

मेहता पानी में पैठे। पानी छाती तक आ गया। मालती अधीर होकर बोली -- 'ठहर जाओ, मैं भी आती हूँ।' मालती कमर तक पानी में गयी, तो धार उसे बहाने लगी।

मेहता ने उसे थाम लिया। मालती बोली -- 'तुम्हारी यही इच्छा है कि मैं मर जाऊँ, तो तुम्हारे पास ही मरूँगी।' मेहता ने मालती को कन्धे पर बिठा लिया। मालती बोली -- 'अगर कोई देख ले?'

— 'मालती ने करुण स्वर में पूछा -- मैं यहीं पानी में डूब जाऊँ, तो तुम्हें रंज हो या न हो? मेहता ने कहा -- तुम समझती हो, मैं आदमी नहीं हूँ? मालती बोली -- मैं तो यही समझती हूँ।'

पानी मेहता के गर्दन तक आ गया। मालती का हृदय धक-धक करने लगा। उस संकट में उसे ईश्वर याद आया। पानी कम होने लगा, तो मालती बोली -- 'अब तुम मुझे उतार दो।'

— 'मेहता बोले -- चुपचाप बैठी रहो। मालती ने कहा -- तुम समझते होगे, यह कितनी स्वार्थिनी है। मेहता बोले -- मुझे इसकी मज़दूरी दे देना -- जब जीवन में ऐसा अवसर आए तो मुझे बुला लेना।'

किनारे पहुँचकर मालती ने साड़ी और जूते का पानी निचोड़ा। वह मेहता के शब्दों के आशय पर विचार करने लगी। उसने कहा -- 'यह दिन याद रहेगा।'

— 'मेहता ने पूछा -- तुम बहुत डर रही थीं? मालती बोली -- पहले तो डरी; लेकिन फिर मुझे विश्वास हो गया कि तुम हम दोनों की रक्षा कर सकते हो।'

— 'मेहता गर्व से बोले -- मुझे यह सुनकर कितना आनन्द आ रहा है। मालती बोली -- तुमने समझाया कब। मुझे तुम्हारे साथ रहना पड़े, तो एक दिन न पटे।'

— 'मेहता मुस्कराये -- और जो मैं कहूँ कि तुमसे प्रेम करता हूँ। मुझसे विवाह करोगी? मालती बोली -- ऐसे काठ-कठोर से कौन विवाह करेगा! रात-दिन जलाकर मार डालोगे।'

— 'मेहता ने कहा -- मैं किसी रमणी को प्रसन्न नहीं रख सकता। मुझसे कोई स्त्री प्रेम का स्वाँग नहीं कर सकती। मालती ने पूछा -- तुम कैसे प्रेम से सन्तुष्ट होगे?'

— 'मेहता बोले -- बस यही कि जो मन में हो, वही मुख पर हो! मालती ने पूछा -- मेरे विषय में तुम्हारा क्या ख़याल है? मेहता बोले -- तुम सब कुछ कर सकती हो; लेकिन प्रेम नहीं कर सकती।'

मालती को आज के सम्भाषण में नया आनन्द आ रहा था। मेहता ने एक लालसर चिड़िया पर निशाना मारा। वह पानी में गिरकर बहने लगी। मेहता उसे लेने के लिए पानी में कूद पड़े।

एक काली, गँवारिन युवती झोपड़ी से निकली और पानी में घुसकर चिड़िया पकड़ लायी। वह बोली -- 'पानी से निकल जाओ बाबूजी, तुम्हारी चिड़िया यह है।' मेहता उसके साहस पर मुग्ध हो गये।

युवती का रंग गहरा काला था पर अंगों में सुडौलपन और स्वास्थ्य का तेज था। वह बोली -- 'तेंदुआ मारना चाहो, तो मैं उसका ठौर दिखा दूँ। चलो मेरे द्वार पर पीपल की छाया है।'

युवती ने कहा -- 'मक्के की रोटियाँ खाओ और चिड़िये का सालन पका दूँगी।' मेहता ने बताया कि उनके साथ एक औरत भी है। युवती दौड़कर मालती को बुला लायी।

मालती खिन्न मन से पीपल की छाँह में बैठी। मेहता ने युवती के हाथ से मटके छीन लिये और गहरा कुआँ होने पर भी पानी खींच लाये। युवती उन्हें श्रद्धा से देखने लगी।

युवती ने मांस पकाया और रोटियाँ बनाईं। मालती ने बताया कि उसे सिर में ज़ोर का दर्द हो रहा है। युवती बोली -- 'मैं अभी दौड़ के एक दवा लाती हूँ।' वह धूप में पहाड़ी पर चढ़ गयी।

मालती ने कहा -- 'कहाँ गयी वह कलूटी। तुम तो इस छोकरी पर लट्टू हो गये हो।' मेहता बोले -- 'कुछ बातें तो उसमें ऐसी हैं कि अगर तुममें होतीं, तो तुम देवी हो जातीं।'

मेहता ने युवती की प्रशंसा करते हुए कहा -- वह प्रेम और त्याग का व्यवहार कर सकती है।

युवती जड़ी लेकर हाँफती हुई आयी। मालती ने दवा लेने से मना कर दिया और कहा -- 'तू जाकर गाड़ी ला।' युवती बोली -- 'मैं किसी की लौंडी नहीं हूँ। मैं गाड़ी लेने न जाऊँगी।'

मालती ने उसे पिटवाने की धमकी दी। मेहता बोले -- 'वह नहीं जायगी। मैं जा रहा हूँ।' मालती जलकर बोली -- 'अच्छा, तो मैं ही जाती हूँ, तुम उसके चरणों की पूजा करके पीछे आना।'

मेहता ने युवती को विदा किया और कहा -- 'तुम्हारा यह नेह हमेशा याद रहेगा।' युवती ने सजलनेत्र होकर उन्हें प्रणाम किया।

दूसरी टोली राय साहब और खन्ना की थी। खन्ना ने मेहता की आलोचना की। राय साहब बोले -- 'वह मनोरंजन की वस्तु है। मज़े से एक हज़ार मारते हैं, चिन्ता कोई है नहीं।'

खन्ना ने मालती के बारे में बात की। राय साहब बोले -- 'आप जितनी ही उसकी पूजा करेंगे, उतना ही वह आप से दूर भागेगी।' राय साहब ने अपने जेल जाने और बलिदान की बातें भी बताईं।

खन्ना ने अपने शुगर मिल के हिस्से ख़रीदने और बीमा कराने का प्रस्ताव दिया। राय साहब सोच में पड़ गये। फिर उन्हें एक जड़ी-बूटी बेचने वाला देहाती मिला।

खन्ना ने उससे एक रुपए में बूटियाँ खरीदीं और बोले -- 'इनकी अशर्फ़ियाँ बनाऊँगा। ज़रा से एहसान से बड़े-बड़े काम निकल जाते हैं।' उन्होंने एक सिद्ध महात्मा की कहानी भी सुनाई।

झाड़ी में से एक तेंदुआ निकला। खन्ना डर के मारे राय साहब के पीछे छिप गये। वे बोले -- 'मैं तो अब यहाँ नहीं ठहर सकता।' राय साहब को उनके साथ लौटना पड़ा।

तीसरी टोली मिरज़ा खुर्शेद और तंखा की थी। तंखा ने चुनाव की बात छेड़ी। मिरज़ा बोले -- 'मुझे अब इस डेमाक्रेसी में भक्ति नहीं रही। चुनाव में वही बाज़ी ले जाता है जिसके पास रुपए हैं।'

मिरज़ा ने एक हिरन का शिकार किया। पास ही एक लकड़हारा था। मिरज़ा ने वह हिरन लकड़हारे को दे दिया और उसके घर साथ चलने का निश्चय किया।

तंखा ने मिरज़ा को रिश्वत लेकर चुनाव से बैठने का प्रस्ताव दिया, पर मिरज़ा ने उसे 'हराम की कमाई' कहकर ठुकरा दिया। लकड़हारा हिरन लेकर चला।

मिरज़ा ने लकड़हारे की मदद के लिए हिरन स्वयं उठा लिया पर पचास क़दम में ही हाँफ गये। तंखा ने शर्त के लिए हिरन उठाया पर वे बोझ से ज़मीन पर गिर पड़े।

वे एक छोटे से पुरवे (गाँव) पहुँचे। मिरज़ा ने वहाँ के सभी आदमियों को भोज दिया। वे बच्चों के साथ बच्चे बन गये और सबने ख़ूब दावत उड़ायी। सूर्यास्त के समय सबने उन्हें विदा किया।

जब टोलियाँ वापस बरगद के पास पहुँचीं, तो मेहता और मालती विमन थे। राय साहब और खन्ना भूखे रह गये थे। अकेले मिरज़ा खुर्शेद अलौकिक प्रसन्नता में थे।

जब से होरी के घर में गाय आ गयी है, घर की श्री ही कुछ और हो गयी है। धनिया का घमंड तो उसके सँभाल से बाहर हो-हो जाता है। जब देखो गाय की चर्चा।

भूसा छिज गया था। ऊख में थोड़ी-सी चरी बो दी गयी थी। उसी की कुट्टी काटकर जानवरों को खिलाना पड़ता था। आँखें आकाश की ओर लगी रहती थीं कि कब पानी बरसे और घास निकले।

आधा आसाढ़ बीत गया और वर्षा न हुई। सहसा एक दिन बादल उठे और आसाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा।

किसान ख़रीफ़ बोने के लिए हल ले-लेकर निकले कि राय साहब के कारकुन ने कहला भेजा, जब तक बाक़ी न चुक जायगी किसी को खेत में हल न ले जाने दिया जायगा।

सब मिलकर कारकुन के पास जाकर रोये। कारकुन का नाम था पण्डित नोखेराम। आदमी बुरे न थे; मगर मालिक का हुक्म था। उसे कैसे टालें।

होरी मालिक के पास जाने को तैयार हुआ; लेकिन फिर सोचा, उन्होंने कारकुन को एक बार जो हुक्म दे दिया, उसे क्यों टालने लगे। वह अगुवा बनकर क्यों बुरा बने।

किसानों में खलबली मची हुई थी। सभी गाँव के महाजनों के पास रुपए के लिए दौड़े। गाँव में मँगरू साह की आजकल चढ़ी हुई थी।

पण्डित दातादीन और दुलारी सहुआइन भी लेन-देन करती थीं। सबसे बड़े महाजन थे झिंगुरीसिंह। वह शहर के एक बड़े महाजन के एजेंट थे।

होरी में आत्म-सम्मान का सर्वथा लोप न हुआ था। झिंगुरीसिंह के सिवा उसे और कोई न सूझा। वह पक्का काग़ज़ लिखाते थे, नज़राना अलग लेते थे, दस्तूरी अलग।

झिंगुरीसिंह नाटे, मोटे, खल्वाट, काले, लम्बी नाक और बड़ी-बड़ी मूछोंवाले आदमी थे। लेन-देन में बड़े कठोर थे। सूद की एक पाई न छोड़ते थे।

— 'होरी ने सलाम करके अपनी विपत्ति-कथा सुनायी। झिंगुरीसिंह ने मुस्कराकर कहा -- वह सब पुराना रुपया क्या कर डाला?'

— 'पुराने रुपए होते ठाकुर, तो महाजनी से अपना गला न छुड़ा लेता। कहाँ के गड़े रुपए बाबू साहब, खाने को तो होता नहीं।'

झिंगुरीसिंह ने होरी को गाय बेचने का प्रस्ताव दिया। होरी पहले तो इस प्रस्ताव पर हँसा, लेकिन ठाकुर ने महाजनी के हथकंडों का ऐसा भीषण रूप दिखाया कि उसके मन में यह बात बैठ गयी।

होरी ने कहा -- 'मैं घर जाकर सबसे सलाह कर लूँ, तो बताऊँ।' झिंगुरीसिंह बोले -- 'सलाह नहीं करना है, उनसे कह देना है कि रुपए उधार लेने में अपनी बर्बादी के सिवा और कुछ नहीं।'

घर आकर होरी ने प्रस्ताव रखा तो कुहराम मच गया। धनिया और दोनों लड़कियां, सोना और रूपा, गाय बेचने के सख्त खिलाफ थीं। सोना ने कहा -- 'इससे तो कहीं अच्छा है, मुझे बेच डालो।'

मगर होरी ने धनिया को किसी तरह राज़ी कर लिया। यह तय किया गया कि जब दोनों लड़कियाँ रात को सो जायँ, तो गाय झिंगुरीसिंह के पास पहुँचा दी जाय।

साँझ हुई। दोनों लड़कियाँ सो गयीं। होरी भी दुविधा में था। उसे लगा जैसे गाय की आँखों में आँसू भरे हैं और वह कह रही है -- 'क्या चार दिन में ही तुम्हारा मन मुझसे भर गया?'

होरी का मन बदल गया। उसने धनिया से कहा -- 'मेरा तो हाथ नहीं उठता धनिया! रहने दो, रुपए सूद पर ले लूँगा।' धनिया ने गर्व से उसकी ओर देखा।

होरी ने गाय को बाहर हवा में बाँध दिया और अपने मँझले भाई शोभा को देखने गया जिसे दमे का रोग था। वहाँ राय साहब के फरमान की चर्चा होती रही।

ग्यारह बजे लौटते समय होरी को लगा जैसे गाय के पास कोई खड़ा है। वह हीरा था। हीरा ने कहा -- 'मैं हूँ दादा, तुम्हारे कौड़े में आग लेने आया था।'

दोनों भाइयों में आत्मीयता की बातें हुईं। हीरा ने अपनी बीमारी के समय होरी और भाभी द्वारा की गई सेवा को याद किया।

हीरा के जाने के बाद धनिया ने होरी को गोबर और झुनिया के प्रेम संबंध के बारे में बताया और चेतावनी दी कि झुनिया को घर में न लाना।

— 'सहसा गोबर आकर घबड़ाई हुई आवाज़ में बोला -- दादा, सुन्दरिया को क्या हो गया? वह तो पड़ी तड़प रही है।' तीनों बाहर भागे।

गाय के मुँह से फिचकुर निकल रहा था, आँखें पथरा गयी थीं। साफ दिख रहा था कि उसे विष दिया गया है। सारा गाँव जमा हो गया।

हीरा सबसे ज्यादा दुखी होने का नाटक कर रहा था और बधिक को धमकियाँ दे रहा था। आधी रात तक जमघट रहा।

सबके जाने के बाद धनिया ने होरी को कोसा कि उसने मना करने पर भी गाय बाहर क्यों बाँधी। सोना और रूपा बिलख-बिलखकर रो रही थीं।

होरी ने धनिया से कहा -- 'तेरी बात पचती नहीं, किसी से कहेगी तो नहीं? मेरा सन्देह हीरा पर होता है। मैंने उसे सुन्दरिया की नाँद के पास खड़े देखा था।'

धनिया आग-बबूला हो गयी। उसने कहा -- 'सबेरा होते ही थाने न पहुँचाऊँ, तो अपने असल बाप की नहीं। मैं बिना लाला को बड़े घर भिजवाये मानूँगी नहीं।'

होरी को अपनी भूल पर पश्चात्ताप होने लगा कि उसने धनिया को यह बात क्यों बताई। बाहर मृतक गाय पड़ी थी और होरी अंधकार में करवटें बदल रहा था।

अन्धकार में प्रकाश की रेखा कहीं नज़र न आती थी।

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