तीसरा परिच्छेद
दिन पर दिन बीतते चले जाते थे, इन दोनों बालक-बालिका के आमोद की सीमा नहीं थी। दिन भर धूप में घूमते-फिरते, सन्ध्या को घर लौट कर मार खाते। दूसरे दिन सबेरा होते ही भाग जाते और सन्ध्या को फिर डॉट-फटकार और पिटाई का प्रसाद पाते। रात को निश्चिन्त निरुद्वेश...
Smooth, continuous scrolling. Best for reading at your own pace like a standard webpage.