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पहला-परिच्छेद

वैशाख की एक दोपहरी में जब चिलचिलाती धूप का कोई अन्त नहीं था और गरमी की कोई हद नहीं थी, मुकर्जी-कुल का देवदास ठीक उसी समय पाठशाला के कमरे के कोने में एक फटी हुई चटाई के ऊपर बैठकर स्लेट हाथ में लिये हुए कभी आँखें खोलता, कभी मूँदता और कभी पैर फैला कर...

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पहला-परिच्छेद

वैशाख की एक दोपहरी में जब चिलचिलाती धूप का कोई अन्त नहीं था और गरमी की कोई हद नहीं थी, मुकर्जी-कुल का देवदास ठीक उसी समय पाठशाला के कमरे के कोने में एक फटी हुई चटाई के ऊपर बैठकर...

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