आँधी
चंदा के तट पर बहुत-से छतनारे वृक्षों की छाया है, किंतु मैं प्रायः मुचकुंद के नीचे ही जाकर टहलता, बैठता और कभी-कभी चाँदनी में ऊँघने भी लगता। वहीं मेरा विश्राम था। वहाँ मेरी एक सहचरी भी थी, किंतु वह कुछ बोलती न थी। वह रहट्ठों की बनी हुई मूसदानी-सी ए...
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