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गोदान भाग - 4

गोबर अँधेरे ही मुँह उठा और कोदई से बिदा माँगी। सबको मालूम हो गया था कि उसका ब्याह हो चुका है; इसलिए उससे कोई विवाह-सम्बन्धी चर्चा नहीं की। उसके शील-स्वभाव ने सारे घर को मुग्ध कर लिया था।

— 'कोदई की माता को उसने उपदेश दिया -- तुम बड़ी हो माता जी, पूज्य हो। पुत्र माता के रिन से लाख जन्म लेकर भी उरिन नहीं हो सकता।' बुढ़िया इस श्रद्धा पर गद्गद हो गयी।

— 'गोबर ने आगे कहा -- बहू घर से रूठकर चली गयी, तो हँसी तुम्हारी और तुम्हारे आदमी की हुई। वह अभी अबोध लड़की है। मारने से वह पढ़ेगी नहीं, उसे स्नेह से पढ़ाया जा सकता है।'

बुढ़िया ने उसे खाँड़ और सत्तू खाने को दिया। गोबर गाँव के अन्य आदमियों के साथ मजूरी की टोह में शहर चल दिया और नौ बजे अमीनाबाद के बाज़ार पहुँच गया।

गोबर अँधेरे ही मुँह उठा और कोदई से बिदा माँगी। सबको मालूम हो गया था कि उसका ब्याह हो चुका है; इसलिए उससे कोई विवाह-सम्बन्धी चर्चा नहीं की। उसके शील-स्वभाव ने सारे घर को मुग्ध कर लिया था।

— 'कोदई की माता को उसने उपदेश दिया -- तुम बड़ी हो माता जी, पूज्य हो। पुत्र माता के रिन से लाख जन्म लेकर भी उरिन नहीं हो सकता।' बुढ़िया इस श्रद्धा पर गद्गद हो गयी।

— 'गोबर ने आगे कहा -- बहू घर से रूठकर चली गयी, तो हँसी तुम्हारी और तुम्हारे आदमी की हुई। वह अभी अबोध लड़की है। मारने से वह पढ़ेगी नहीं, उसे स्नेह से पढ़ाया जा सकता है।'

बुढ़िया ने उसे खाँड़ और सत्तू खाने को दिया। गोबर गाँव के अन्य आदमियों के साथ मजूरी की टोह में शहर चल दिया और नौ बजे अमीनाबाद के बाज़ार पहुँच गया।

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गोदान भाग - 4

गोबर अँधेरे ही मुँह उठा और कोदई से बिदा माँगी। सबको मालूम हो गया था कि उसका ब्याह हो चुका है; इसलिए उससे कोई विवाह-सम्बन्धी चर्चा नहीं की। उसके शील-स्वभाव ने सारे घर को मुग्ध कर लिया था।

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9;कोदई की माता को उसने उपदेश दिया -- तुम बड़ी हो माता जी, पूज्य हो। पुत्र माता के रिन से लाख जन्म लेकर भी उरिन नहीं हो सकता।' बुढ़िया इस श्रद्धा पर गद्गद हो गयी।

— 'गोबर ने आगे कहा -- बहू घर से रूठकर चली गयी, तो हँसी तुम्हारी और तुम्हारे आदमी की हुई। वह अभी अबोध लड़की है। मारने स...
गोबर अँधेरे ही मुँह उठा और कोदई से बिदा माँगी। सबको मालूम हो गया था कि उसका ब्याह हो चुका है; इसलिए उससे कोई विवाह-सम्बन्धी चर्चा नहीं की। उसके शील-स्वभाव ने सारे घर को मुग्ध कर लिया था।

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