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गोदान भाग - 2

यह अभिनय जब समाप्त हुआ, तो उधर रंगशाला में धनुष-यज्ञ समाप्त हो चुका था और सामाजिक प्रहसन की तैयारी हो रही थी; मगर इन सज्जनों को उससे विशेष दिलचस्पी न थी। केवल मिस्टर मेहता देखने गये और आदि से अन्त तक जमे रहे।

उन्हें बड़ा मज़ा आ रहा था। बीच-बीच में तालियाँ बजाते थे और 'फिर कहो, फिर कहो' का आग्रह करके अभिनेताओं को प्रोत्साहन भी देते जाते थे। राय साहब ने इस प्रहसन में एक मुक़दमेबाज़ देहाती ज़मींदार का ख़ाका उड़ाया था।

कहने को तो प्रहसन था; मगर करुणा से भरा हुआ। नायक का बात-बात में क़ानून की धाराओं का उल्लेख करना, पत्नी पर केवल इसलिए मुक़दमा दायर कर देना कि उसने भोजन तैयार करने में ज़रा-सी देर कर दी।

फिर वकीलों के नख़रे और देहाती गवाहों की चालाकियाँ और झाँसे, पहले गवाही के लिए चट-पट तैयार हो जाना; मगर इजलास पर तलबी के समय ख़ूब मनावन कराना और नाना प्रकार के फ़रमाइशें करके उल्लू बनाना।

ये सभी दृश्य देखकर लोग हँसी के मारे लोटे जाते थे। सबसे सुन्दर वह दृश्य था, जिसमें वकील गवाहों को उनके बयान रटा रहा था। गवाहों का बार-बार भूलें करना, वकील का बिगड़ना।

फिर नायक का देहाती बोली में गवाहों को समझाना और अन्त में इजलास पर गवाहों का बदल जाना, ऐसा सजीव और सत्य था कि मिस्टर मेहता उछल पड़े और तमाशा समाप्त होने पर नायक को गले लगा लिया।

उन्होंने सभी नटों को एक-एक मेडल देने की घोषणा की। राय साहब के प्रति उनके मन में श्रद्धा के भाव जाग उठे। राय साहब स्टेज के पीछे ड्रामे का संचालन कर रहे थे।

— 'मेहता दौड़कर उनके गले लिपट गये और मुग्ध होकर बोले -- आपकी दृष्टि इतनी पैनी है, इसका मुझे अनुमान न था।'

दूसरे दिन जलपान के बाद शिकार का प्रोग्राम था। वहीं किसी नदी के तट पर बाग़ में भोजन बने, ख़ूब जल-क्रीड़ा की जाय और शाम को लोग घर आयँ। देहाती जीवन का आनन्द उठाया जाय।

जिन मेहमानों को विशेष काम था, वह तो बिदा हो गये, केवल वे ही लोग बच रहे जिनकी राय साहब से घनिष्टता थी। मिसेज़ खन्ना के सिर में दर्द था, न जा सकीं।

सम्पादकजी इस मंडली से जले हुए थे और इनके विरुद्ध एक लेख-माला निकालकर इनकी ख़बर लेने के विचार में मग्न थे। सब-के-सब छटे हुए गुंडे हैं। हराम के पैसे उड़ाते हैं और मूछों पर ताव देते हैं।

दुनिया में क्या हो रहा है, इन्हें क्या ख़बर। इनके पड़ोस में कौन मर रहा है, इन्हें क्या परवा। इन्हें तो अपने भोग-विलास से काम है।

जिसको यह फ़िक्र दबाये डालती है कि लड़कों का ब्याह कैसे हो, या बीमार स्त्री के लिए वैद्य कैसे आयँ या अब की घर का किराया किसके घर से आएगा, वह अपना जीवन कैसे सम्पूर्ण बनाये!

छूटे साँड़ बने दूसरों के खेत में मुँह मारते फिरते हो और समझते हो संसार में सब सुखी हैं। तुम्हारी आँखें तब खुलेंगी, जब क्रान्ति होगी और तुमसे कहा जायगा -- बचा, खेत में चलकर हल जोतो।

और वह जो है मालती, जो बहत्तर घाटों का पानी पीकर भी मिस बनी फिरती है! शादी नहीं करेगी, इससे जीवन बन्धन में पड़ जाता है। बस जीवन का पूरा विकास इसी में है कि दुनिया को लूटे जाओ।

सारे बन्धन तोड़ दो, धर्म और समाज को गोली मारो, जीवन के कर्तव्यों को पास न फटकने दो, बस तुम्हारा जीवन सम्पूर्ण हो गया। माँ-बाप से नहीं पटती, उन्हें धता बताओ।

मगर टैक्स क्यों देते हो? क़ानून भी तो बन्धन है, उसे क्यों नहीं तोड़ते? उससे क्यों कन्नी काटते हो। जानते हो न कि क़ानून की ज़रा भी अवज्ञा की और बेड़ियाँ पड़ जायँगी।

बस वही बन्धन तोड़ो, जिसमें अपनी भोग-लिप्सा में बाधा नहीं पड़ती। रस्सी को साँप बनाकर पीटो और तीस मारखाँ बनो। जीते साँप के पास जाओ ही क्यों वह फूकार भी मारेगा।

आठ बजे शिकार-पार्टी चली। खन्ना ने कभी शिकार न खेला था, बन्दूक़ की आवाज़ से काँपते थे; लेकिन मिस मालती जा रही थीं, वह कैसे रुक सकते थे।

मिस्टर तंखा को अभी तक एलेक्शन के विषय में बातचीत करने का अवसर न मिला था। राय साहब अपने इस इलाक़े में बहुत दिनों से नहीं गये थे। वहाँ का रंग-ढंग देखना चाहते थे।

मिरज़ा खुर्शेद को जीवन के नये अनुभव प्राप्त करने का शौक़ था। मिस मालती अकेले कैसे रहतीं। उन्हें तो रसिकों का जमघट चाहिए। केवल मिस्टर मेहता शिकार खेलने के सच्चे उत्साह से जा रहे थे।

राय साहब की इच्छा तो थी कि भोजन की सामग्री, रसोईया, सब साथ चलें, लेकिन मिस्टर मेहता ने उसका विरोध किया। खन्ना ने कहा -- 'आख़िर वहाँ भोजन करेंगे या भूखों मरेंगे?'

— 'मेहता ने जवाब दिया -- भोजन क्यों न करेंगे, लेकिन आज हम लोग ख़ुद अपना सारा काम करेंगे। देखना तो चाहिए कि नौकरों के बग़ैर हम ज़िन्दा रह सकते हैं या नहीं।'

— 'मिस मालती पकायँगी और हम लोग खायँगे। देहातों में हाँडियाँ और पत्तल मिल ही जाते हैं, और ईधन की कोई कमी नहीं। शिकार हम करेंगे ही।'

— 'मालती ने गिला किया -- क्षमा कीजिए। आपने रात मेरी क़लाई इतने ज़ोर से पकड़ी कि अभी तक दर्द हो रहा है।'

— 'मेहता बोले -- काम तो हम लोग करेंगे, आप केवल बताती जाइएगा। मिरज़ा खुर्शेद बोले -- अजी आप लोग तमाशा देखते रहिएगा, मैं सारा इन्तज़ाम कर दूँगा।'

यही प्रस्ताव स्वीकृत हुआ। दो मोटरें चलीं। एक मिस मालती ड्राइव कर रही थीं, दूसरी ख़ुद राय साहब। कोई बीस-पचीस मील पर पहाड़ी प्रान्त शुरू हो गया।

दूर से नदी का पाट नज़र आया। एक घने वटवृक्ष की छाँह में कारें रोक दी गयीं और लोग उतरे। यह सलाह हुई कि दो-दो की टोली बने और शिकार खेलकर बारह बजे तक यहाँ आ जाय।

मिस मालती मेहता के साथ चलने को तैयार हो गयीं। खन्ना मन में ऐंठकर रह गये। राय साहब का साथ रोचक न होते हुए भी बुरा न था। खुर्शेद और तंखा की टोली बनी-बनायी थी।

— 'कुछ दूर चलने के बाद मालती ने कहा -- तुम तो चले ही जाते हो। ज़रा दम ले लेने दो। मेहता मुस्कराये -- अभी तो हम एक मील भी नहीं आये।'

— 'मालती बोली -- थकीं नहीं; लेकिन क्यों न ज़रा दम ले लो। मेहता ने कहा -- जब तक कोई शिकार हाथ न आ जाय, हमें आराम करने का अधिकार नहीं।'

— 'मालती ने कहा -- मैं शिकार खेलने न आयी थी। मेहता ने अनजान बनकर पूछा -- फिर क्या करने आयी थीं? मालती बोली -- अब तुमसे क्या बताऊँ।'

हिरनों का एक झुंड चरता हुआ नज़र आया। दोनों एक चट्टान की आड़ में छिप गये और निशाना बाँधकर गोली चलायी। निशाना ख़ाली गया। झुंड भाग निकला।

— 'मालती ने ज़रा रुककर कहा -- गर्मी के मारे बुरा हाल हो रहा है। आओ, इस वृक्ष के नीचे बैठ जायँ। मेहता बोले -- अभी नहीं। तुम बैठना चाहती हो, तो बैठो।'

— 'मालती बोली -- बड़े निर्दयी हो तुम। मेहता बोले -- जब तक कोई शिकार न मिल जाय, मैं बैठ नहीं सकता। मालती बोली -- तब तो तुम मुझे मार ही डालोगे।'

— 'मालती ने पूछा -- रात तुमने मुझे इतना क्यों सताया? याद है, तुमने मुझे क्या कहा था -- तुम हमारे साथ चलेगा दिलदार? सच कहना, तुम उस वक़्त मुझे अपने साथ ले जाते?'

मेहता ने कोई जवाब न दिया। मालती थककर बैठ गयी। मेहता बोले -- 'अच्छी बात है, तुम आराम कर लो। मैं यहीं आ जाऊँगा।' मालती ने पूछा -- 'मुझे अकेले छोड़कर चले जाओगे?'

— 'मेहता ने कहा -- मैं जानता हूँ, तुम अपनी रक्षा कर सकती हो। नये युग की देवियों की यही सिफ़त है। वह मर्द का आश्रय नहीं चाहतीं।'

— 'मालती ने झेंपते हुए कहा -- तुम कोरे फ़िलासफ़र हो मेहता। मेहता ने एक मोर पर निशाना साधा पर वह उड़ गया। मालती बोली -- बहुत अच्छा हुआ। मेरा शाप पड़ा।'

— 'मेहता बोले -- तुमने अपने आपको शाप दिया। अब तो तुमको फ़ौरन चलना पड़ेगा।' मालती मेहता का हाथ पकड़कर बोली -- 'तुम मुझे छोड़कर नहीं जा सकते।'

मेहता ने हाथ छुड़ा लिया और आगे बढ़े। मालती झुँझलाकर उनके पीछे दौड़ी। समीप आकर बोली -- 'मैं तुम्हें इतना पशु न समझती थी।' मेहता बोले -- 'मैं जो हिरन मारूँगा, उसकी खाल तुम्हें भेंट करूँगा।'

एक चौड़ा नाला बीच में था। धार में बहुत वेग था। मालती ने कहा -- 'अब तो लौटना पड़ा।' मेहता बोले -- 'क्यों? उस पार चलेंगे। तुम यहीं बैठो, मैं जाता हूँ।'

मेहता पानी में पैठे। पानी छाती तक आ गया। मालती अधीर होकर बोली -- 'ठहर जाओ, मैं भी आती हूँ।' मालती कमर तक पानी में गयी, तो धार उसे बहाने लगी।

मेहता ने उसे थाम लिया। मालती बोली -- 'तुम्हारी यही इच्छा है कि मैं मर जाऊँ, तो तुम्हारे पास ही मरूँगी।' मेहता ने मालती को कन्धे पर बिठा लिया। मालती बोली -- 'अगर कोई देख ले?'

— 'मालती ने करुण स्वर में पूछा -- मैं यहीं पानी में डूब जाऊँ, तो तुम्हें रंज हो या न हो? मेहता ने कहा -- तुम समझती हो, मैं आदमी नहीं हूँ? मालती बोली -- मैं तो यही समझती हूँ।'

पानी मेहता के गर्दन तक आ गया। मालती का हृदय धक-धक करने लगा। उस संकट में उसे ईश्वर याद आया। पानी कम होने लगा, तो मालती बोली -- 'अब तुम मुझे उतार दो।'

— 'मेहता बोले -- चुपचाप बैठी रहो। मालती ने कहा -- तुम समझते होगे, यह कितनी स्वार्थिनी है। मेहता बोले -- मुझे इसकी मज़दूरी दे देना -- जब जीवन में ऐसा अवसर आए तो मुझे बुला लेना।'

किनारे पहुँचकर मालती ने साड़ी और जूते का पानी निचोड़ा। वह मेहता के शब्दों के आशय पर विचार करने लगी। उसने कहा -- 'यह दिन याद रहेगा।'

— 'मेहता ने पूछा -- तुम बहुत डर रही थीं? मालती बोली -- पहले तो डरी; लेकिन फिर मुझे विश्वास हो गया कि तुम हम दोनों की रक्षा कर सकते हो।'

— 'मेहता गर्व से बोले -- मुझे यह सुनकर कितना आनन्द आ रहा है। मालती बोली -- तुमने समझाया कब। मुझे तुम्हारे साथ रहना पड़े, तो एक दिन न पटे।'

— 'मेहता मुस्कराये -- और जो मैं कहूँ कि तुमसे प्रेम करता हूँ। मुझसे विवाह करोगी? मालती बोली -- ऐसे काठ-कठोर से कौन विवाह करेगा! रात-दिन जलाकर मार डालोगे।'

— 'मेहता ने कहा -- मैं किसी रमणी को प्रसन्न नहीं रख सकता। मुझसे कोई स्त्री प्रेम का स्वाँग नहीं कर सकती। मालती ने पूछा -- तुम कैसे प्रेम से सन्तुष्ट होगे?'

— 'मेहता बोले -- बस यही कि जो मन में हो, वही मुख पर हो! मालती ने पूछा -- मेरे विषय में तुम्हारा क्या ख़याल है? मेहता बोले -- तुम सब कुछ कर सकती हो; लेकिन प्रेम नहीं कर सकती।'

मालती को आज के सम्भाषण में नया आनन्द आ रहा था। मेहता ने एक लालसर चिड़िया पर निशाना मारा। वह पानी में गिरकर बहने लगी। मेहता उसे लेने के लिए पानी में कूद पड़े।

एक काली, गँवारिन युवती झोपड़ी से निकली और पानी में घुसकर चिड़िया पकड़ लायी। वह बोली -- 'पानी से निकल जाओ बाबूजी, तुम्हारी चिड़िया यह है।' मेहता उसके साहस पर मुग्ध हो गये।

युवती का रंग गहरा काला था पर अंगों में सुडौलपन और स्वास्थ्य का तेज था। वह बोली -- 'तेंदुआ मारना चाहो, तो मैं उसका ठौर दिखा दूँ। चलो मेरे द्वार पर पीपल की छाया है।'

युवती ने कहा -- 'मक्के की रोटियाँ खाओ और चिड़िये का सालन पका दूँगी।' मेहता ने बताया कि उनके साथ एक औरत भी है। युवती दौड़कर मालती को बुला लायी।

मालती खिन्न मन से पीपल की छाँह में बैठी। मेहता ने युवती के हाथ से मटके छीन लिये और गहरा कुआँ होने पर भी पानी खींच लाये। युवती उन्हें श्रद्धा से देखने लगी।

युवती ने मांस पकाया और रोटियाँ बनाईं। मालती ने बताया कि उसे सिर में ज़ोर का दर्द हो रहा है। युवती बोली -- 'मैं अभी दौड़ के एक दवा लाती हूँ।' वह धूप में पहाड़ी पर चढ़ गयी।

मालती ने कहा -- 'कहाँ गयी वह कलूटी। तुम तो इस छोकरी पर लट्टू हो गये हो।' मेहता बोले -- 'कुछ बातें तो उसमें ऐसी हैं कि अगर तुममें होतीं, तो तुम देवी हो जातीं।'

मेहता ने युवती की प्रशंसा करते हुए कहा -- वह प्रेम और त्याग का व्यवहार कर सकती है।

युवती जड़ी लेकर हाँफती हुई आयी। मालती ने दवा लेने से मना कर दिया और कहा -- 'तू जाकर गाड़ी ला।' युवती बोली -- 'मैं किसी की लौंडी नहीं हूँ। मैं गाड़ी लेने न जाऊँगी।'

मालती ने उसे पिटवाने की धमकी दी। मेहता बोले -- 'वह नहीं जायगी। मैं जा रहा हूँ।' मालती जलकर बोली -- 'अच्छा, तो मैं ही जाती हूँ, तुम उसके चरणों की पूजा करके पीछे आना।'

मेहता ने युवती को विदा किया और कहा -- 'तुम्हारा यह नेह हमेशा याद रहेगा।' युवती ने सजलनेत्र होकर उन्हें प्रणाम किया।

दूसरी टोली राय साहब और खन्ना की थी। खन्ना ने मेहता की आलोचना की। राय साहब बोले -- 'वह मनोरंजन की वस्तु है। मज़े से एक हज़ार मारते हैं, चिन्ता कोई है नहीं।'

खन्ना ने मालती के बारे में बात की। राय साहब बोले -- 'आप जितनी ही उसकी पूजा करेंगे, उतना ही वह आप से दूर भागेगी।' राय साहब ने अपने जेल जाने और बलिदान की बातें भी बताईं।

खन्ना ने अपने शुगर मिल के हिस्से ख़रीदने और बीमा कराने का प्रस्ताव दिया। राय साहब सोच में पड़ गये। फिर उन्हें एक जड़ी-बूटी बेचने वाला देहाती मिला।

खन्ना ने उससे एक रुपए में बूटियाँ खरीदीं और बोले -- 'इनकी अशर्फ़ियाँ बनाऊँगा। ज़रा से एहसान से बड़े-बड़े काम निकल जाते हैं।' उन्होंने एक सिद्ध महात्मा की कहानी भी सुनाई।

झाड़ी में से एक तेंदुआ निकला। खन्ना डर के मारे राय साहब के पीछे छिप गये। वे बोले -- 'मैं तो अब यहाँ नहीं ठहर सकता।' राय साहब को उनके साथ लौटना पड़ा।

तीसरी टोली मिरज़ा खुर्शेद और तंखा की थी। तंखा ने चुनाव की बात छेड़ी। मिरज़ा बोले -- 'मुझे अब इस डेमाक्रेसी में भक्ति नहीं रही। चुनाव में वही बाज़ी ले जाता है जिसके पास रुपए हैं।'

मिरज़ा ने एक हिरन का शिकार किया। पास ही एक लकड़हारा था। मिरज़ा ने वह हिरन लकड़हारे को दे दिया और उसके घर साथ चलने का निश्चय किया।

तंखा ने मिरज़ा को रिश्वत लेकर चुनाव से बैठने का प्रस्ताव दिया, पर मिरज़ा ने उसे 'हराम की कमाई' कहकर ठुकरा दिया। लकड़हारा हिरन लेकर चला।

मिरज़ा ने लकड़हारे की मदद के लिए हिरन स्वयं उठा लिया पर पचास क़दम में ही हाँफ गये। तंखा ने शर्त के लिए हिरन उठाया पर वे बोझ से ज़मीन पर गिर पड़े।

वे एक छोटे से पुरवे (गाँव) पहुँचे। मिरज़ा ने वहाँ के सभी आदमियों को भोज दिया। वे बच्चों के साथ बच्चे बन गये और सबने ख़ूब दावत उड़ायी। सूर्यास्त के समय सबने उन्हें विदा किया।

जब टोलियाँ वापस बरगद के पास पहुँचीं, तो मेहता और मालती विमन थे। राय साहब और खन्ना भूखे रह गये थे। अकेले मिरज़ा खुर्शेद अलौकिक प्रसन्नता में थे।

जब से होरी के घर में गाय आ गयी है, घर की श्री ही कुछ और हो गयी है। धनिया का घमंड तो उसके सँभाल से बाहर हो-हो जाता है। जब देखो गाय की चर्चा।

भूसा छिज गया था। ऊख में थोड़ी-सी चरी बो दी गयी थी। उसी की कुट्टी काटकर जानवरों को खिलाना पड़ता था। आँखें आकाश की ओर लगी रहती थीं कि कब पानी बरसे और घास निकले।

आधा आसाढ़ बीत गया और वर्षा न हुई। सहसा एक दिन बादल उठे और आसाढ़ का पहला दौंगड़ा गिरा।

किसान ख़रीफ़ बोने के लिए हल ले-लेकर निकले कि राय साहब के कारकुन ने कहला भेजा, जब तक बाक़ी न चुक जायगी किसी को खेत में हल न ले जाने दिया जायगा।

सब मिलकर कारकुन के पास जाकर रोये। कारकुन का नाम था पण्डित नोखेराम। आदमी बुरे न थे; मगर मालिक का हुक्म था। उसे कैसे टालें।

होरी मालिक के पास जाने को तैयार हुआ; लेकिन फिर सोचा, उन्होंने कारकुन को एक बार जो हुक्म दे दिया, उसे क्यों टालने लगे। वह अगुवा बनकर क्यों बुरा बने।

किसानों में खलबली मची हुई थी। सभी गाँव के महाजनों के पास रुपए के लिए दौड़े। गाँव में मँगरू साह की आजकल चढ़ी हुई थी।

पण्डित दातादीन और दुलारी सहुआइन भी लेन-देन करती थीं। सबसे बड़े महाजन थे झिंगुरीसिंह। वह शहर के एक बड़े महाजन के एजेंट थे।

होरी में आत्म-सम्मान का सर्वथा लोप न हुआ था। झिंगुरीसिंह के सिवा उसे और कोई न सूझा। वह पक्का काग़ज़ लिखाते थे, नज़राना अलग लेते थे, दस्तूरी अलग।

झिंगुरीसिंह नाटे, मोटे, खल्वाट, काले, लम्बी नाक और बड़ी-बड़ी मूछोंवाले आदमी थे। लेन-देन में बड़े कठोर थे। सूद की एक पाई न छोड़ते थे।

— 'होरी ने सलाम करके अपनी विपत्ति-कथा सुनायी। झिंगुरीसिंह ने मुस्कराकर कहा -- वह सब पुराना रुपया क्या कर डाला?'

— 'पुराने रुपए होते ठाकुर, तो महाजनी से अपना गला न छुड़ा लेता। कहाँ के गड़े रुपए बाबू साहब, खाने को तो होता नहीं।'

झिंगुरीसिंह ने होरी को गाय बेचने का प्रस्ताव दिया। होरी पहले तो इस प्रस्ताव पर हँसा, लेकिन ठाकुर ने महाजनी के हथकंडों का ऐसा भीषण रूप दिखाया कि उसके मन में यह बात बैठ गयी।

होरी ने कहा -- 'मैं घर जाकर सबसे सलाह कर लूँ, तो बताऊँ।' झिंगुरीसिंह बोले -- 'सलाह नहीं करना है, उनसे कह देना है कि रुपए उधार लेने में अपनी बर्बादी के सिवा और कुछ नहीं।'

घर आकर होरी ने प्रस्ताव रखा तो कुहराम मच गया। धनिया और दोनों लड़कियां, सोना और रूपा, गाय बेचने के सख्त खिलाफ थीं। सोना ने कहा -- 'इससे तो कहीं अच्छा है, मुझे बेच डालो।'

मगर होरी ने धनिया को किसी तरह राज़ी कर लिया। यह तय किया गया कि जब दोनों लड़कियाँ रात को सो जायँ, तो गाय झिंगुरीसिंह के पास पहुँचा दी जाय।

साँझ हुई। दोनों लड़कियाँ सो गयीं। होरी भी दुविधा में था। उसे लगा जैसे गाय की आँखों में आँसू भरे हैं और वह कह रही है -- 'क्या चार दिन में ही तुम्हारा मन मुझसे भर गया?'

होरी का मन बदल गया। उसने धनिया से कहा -- 'मेरा तो हाथ नहीं उठता धनिया! रहने दो, रुपए सूद पर ले लूँगा।' धनिया ने गर्व से उसकी ओर देखा।

होरी ने गाय को बाहर हवा में बाँध दिया और अपने मँझले भाई शोभा को देखने गया जिसे दमे का रोग था। वहाँ राय साहब के फरमान की चर्चा होती रही।

ग्यारह बजे लौटते समय होरी को लगा जैसे गाय के पास कोई खड़ा है। वह हीरा था। हीरा ने कहा -- 'मैं हूँ दादा, तुम्हारे कौड़े में आग लेने आया था।'

दोनों भाइयों में आत्मीयता की बातें हुईं। हीरा ने अपनी बीमारी के समय होरी और भाभी द्वारा की गई सेवा को याद किया।

हीरा के जाने के बाद धनिया ने होरी को गोबर और झुनिया के प्रेम संबंध के बारे में बताया और चेतावनी दी कि झुनिया को घर में न लाना।

— 'सहसा गोबर आकर घबड़ाई हुई आवाज़ में बोला -- दादा, सुन्दरिया को क्या हो गया? वह तो पड़ी तड़प रही है।' तीनों बाहर भागे।

गाय के मुँह से फिचकुर निकल रहा था, आँखें पथरा गयी थीं। साफ दिख रहा था कि उसे विष दिया गया है। सारा गाँव जमा हो गया।

हीरा सबसे ज्यादा दुखी होने का नाटक कर रहा था और बधिक को धमकियाँ दे रहा था। आधी रात तक जमघट रहा।

सबके जाने के बाद धनिया ने होरी को कोसा कि उसने मना करने पर भी गाय बाहर क्यों बाँधी। सोना और रूपा बिलख-बिलखकर रो रही थीं।

होरी ने धनिया से कहा -- 'तेरी बात पचती नहीं, किसी से कहेगी तो नहीं? मेरा सन्देह हीरा पर होता है। मैंने उसे सुन्दरिया की नाँद के पास खड़े देखा था।'

धनिया आग-बबूला हो गयी। उसने कहा -- 'सबेरा होते ही थाने न पहुँचाऊँ, तो अपने असल बाप की नहीं। मैं बिना लाला को बड़े घर भिजवाये मानूँगी नहीं।'

होरी को अपनी भूल पर पश्चात्ताप होने लगा कि उसने धनिया को यह बात क्यों बताई। बाहर मृतक गाय पड़ी थी और होरी अंधकार में करवटें बदल रहा था।

अन्धकार में प्रकाश की रेखा कहीं नज़र न आती थी।

प्रातःकाल होरी के घर में एक पूरा हंगामा हो गया। होरी धनिया को मार रहा था। धनिया उसे गालियाँ दे रही थी। दोनों लड़कियाँ बाप के पाँवों से लिपटी चिल्ला रही थीं और गोबर माँ को बचा रहा था। बार-बार होरी का हाथ पकड़कर पीछे ढकेल देता; पर ज्योंही धनिया के मुँह से कोई गाली निकल जाती, होरी अपने हाथ छुड़ाकर उसे दो-चार घूँसे और लात जमा देता। उसका बूढ़ा क्रोध जैसे किसी गुप्त संचित शक्ति को निकाल लाया हो। सारे गाँव में हलचल पड़ गयी। लोग समझाने के बहाने तमाशा देखने आ पहुँचे। शोभा लाठी टेकता खड़ा हुआ। दातादीन ने डाँटा -- यह क्या है होरी, तुम बावले हो गये हो क्या? कोई इस तरह घर की लक्ष्मी पर हाथ छोड़ता है! तुम्हें यह रोग न था। क्या हीरा की छूत तुम्हें भी लग गयी।

होरी ने पालागन करके कहा -- महाराज, तुम इस बखत न बोलो। मैं आज इसकी बान छुड़ाकर तब दम लूँगा। मैं जितना ही तरह देता हूँ, उतना ही यह सिर चढ़ती जाती है।

धनिया सजल क्रोध में बोली -- महाराज तुम गवाह रहना। मैं आज इसे और इसके हत्यारे भाई को जेहल भेजवाकर तब पानी पिऊँगी। इसके भाई ने गाय को माहुर खिलाकर मार डाला। अब जो मैं थाने में रपट लिखाने जा रही हूँ तो यह हत्यारा मुझे मारता है। इसके पीछे अपनी ज़िन्दगी चौपट कर दी, उसका यह इनाम दे रहा है।

होरी ने दाँत पीसकर और आँखें निकालकर कहा -- फिर वही बात मुँह से निकाली। तूने देखा था हीरा को माहुर खिलाते?

'तू क़सम खा जा कि तूने हीरा को गाय की नाँद के पास खड़े नहीं देखा? '

'हाँ, मैंने नहीं देखा, क़सम खाता हूँ। '

'बेटे के माथे पर हाथ रख के क़सम खा! '

होरी ने गोबर के माथे पर काँपता हुआ हाथ रखकर काँपते हुए स्वर में कहा -- मैं बेटे की क़सम खाता हूँ कि मैंने हीरा को नाँद के पास नहीं देखा। धनिया ने ज़मीन पर थूक कर कहा -- थुड़ी है। तेरी झुठाई पर। तूने ख़ुद मुझसे कहा कि हीरा चोरों की तरह नाँद के पास खड़ा था। और अब भाई के पक्ष में झूठ बोलता है। थुड़ी है! अगर मेरे बेटे का बाल भी बाँका हुआ, तो घर में आग लगा दूँगी। सारी गृहस्थी में आग लगा दूँगी। भगवान्, आदमी मुँह से बात कहकर इतनी बेसरमी से मुकुर जाता है।

होरी पाँव पटककर बोला -- धनिया, ग़ुस्सा मत दिखा, नहीं बुरा होगा।

'मार तो रहा है, और मार ले। जा, तू अपने बाप का बेटा होगा तो आज मुझे मारकर तब पानी पियेगा। पापी ने मारते-मारते मेरा भुरकस निकाल लिया, फिर भी इसका जी नहीं भरा। मुझे मारकर समझता है मैं बड़ा वीर हूँ। भाइयों के सामने भीगी बिल्ली बन जाता है, पापी कहीं का, हत्यारा! '

फिर वह बैन कहकर रोने लगी -- इस घर में आकर उसने क्या नहीं झेला, किस किस तरह पेट-तन नहीं काटा, किस तरह एक-एक लत्ते को तरसी, किस तरह एक-एक पैसा प्राणों की तरह संचा, किस तरह घर-भर को खिलाकर आप पानी पीकर सो रही। और आज उन सारे बलिदानों का यह पुरस्कार! भगवान् बैठे यह अन्याय देख रहे हैं और उसकी रक्षा को नहीं दौड़ते। गज की और द्रौपदी की रक्षा करने बैकुंठ से दौड़े थे। आज क्यों नींद में सोये हुए हैं।

जनमत धीरे-धीरे धनिया की ओर आने लगा। इसमें अब किसी को सन्देह नहीं रहा कि हीरा ने ही गाय को ज़हर दिया। होरी ने बिलकुल झूठी क़सम खाई है, इसका भी लोगों को विश्वास हो गया। गोबर को भी बाप की इस झूठी क़सम और उसके फलस्वरूप आनेवाली विपित्त की शंका ने होरी के विरुद्ध कर दिया। उस पर जो दातादीन ने डाँट बतायी, तो होरी परास्त हो गया। चुपके से बाहर चला गया, सत्य ने विजय पायी। दातादीन ने शोभा से पूछा -- तुम कुछ जानते हो शोभा, क्या बात हुई?

शोभा ज़मीन पर लेटा हुआ बोला -- मैं तो महाराज, आठ दिन से बाहर नहीं निकला। होरी दादा कभी-कभी जाकर कुछ दे आते हैं, उसी से काम चलता है। रात भी वह मेरे पास गये थे। किसने क्या किया, मैं कुछ नहीं जानता। हाँ, कल साँझ को हीरा मेरे घर खुरपी माँगने गया था। कहता था, एक जड़ी खोदना है। फिर तब से मेरी उससे भेंट नहीं हुई।

धनिया इतनी शह पाकर बोली -- पण्डित दादा, वह उसी का काम है। सोभा के घर से खुरपी माँगकर लाया और कोई जड़ी खोदकर गाय को खिला दी। उस रात को जो झगड़ा हुआ था, उसी दिन से वह खार खाये बैठा था।

दातादीन बोले -- यह बात साबित हो गयी, तो उसे हत्या लगेगी। पुलिस कुछ करे या न करे, धरम तो बिना दंड दिये न रहेगा। चली तो जा रुपिया, हीरा को बुला ला। कहना, पण्डित दादा बुला रहे हैं। अगर उसने हत्या नहीं की है, तो गंगाजली उठा ले और चौरे पर चढ़कर क़सम खाय।

धनिया बोली -- महाराज, उसके क़सम का भरोसा नहीं। चटपट खा लेगा। जब इसने झूठी क़सम खा ली, जो बड़ा धर्मात्मा बनता है, तो हीरा का क्या विश्वास।

अब गोबर बोला -- खा ले झूठी क़सम। बंस का अन्त हो जाय। बूढ़े जीते रहें। जवान जीकर क्या करेंगे!

रूपा एक क्षण में आकर बोली -- काका घर में नहीं है, पण्डित दादा! काकी कहती हैं, कहीं चले गये हैं। दातादीन ने लम्बी दाढ़ी फटकारकर कहा -- तूने पूछा नहीं, कहाँ चले गये किया? घर में छिपा बैठा न हो। देख तो सोना, भीतर तो नहीं बैठा है।

धनिया ने टोका -- उसे मत भेजो दादा! हीरा के सिर हत्या सवार है, न जाने क्या कर बैठे। दातादीन ने ख़ुद लकड़ी सँभाली और ख़बर लाये कि हीरा सचमुच कहीं चला गया है। पुनिया कहती है लुटिया-डोर और डंडा सब लेकर गये हैं। पुनिया ने पूछा भी, कहाँ जाते हो; पर बताया नहीं। उसने पाँच रुपए आले में रखे थे। रुपए वहाँ नहीं हैं। साइत रुपए भी लेता गया।

धनिया शीतल हृदय से बोली -- मुँह में कालिख लगाकर कहीं भागा होगा।

शोभा बोला -- भाग के कहाँ जायगा। गंगा नहाने न चला गया हो।

धनिया ने शंका की -- गंगा जाता तो रुपए क्यों ले जाता, और आजकल कोई परब भी तो नहीं है?

इस शंका का कोई समाधान न मिला। धारणा दृढ़ हो गयी। आज होरी के घर भोजन नहीं पका। न किसी ने बैलों को सानी-पानी दिया। सारे गाँव में सनसनी फैली हुई थी। दो-दो चार-चार आदमी जगह-जगह जमा होकर इसी विषय की आलोचना कर रहे थे। हीरा अवश्य कहीं भाग गया। देखा होगा कि भेद खुल गया, अब जेहल जाना पड़ेगा, हत्या अलग लगेगी। बस, कहीं भाग गया। पुनिया अलग रो रही थी, कुछ कहा न सुना, न जाने कहाँ चल दिये। जो कुछ कसर रह गयी थी वह सन्ध्या-समय हलके के थानेदार ने आकर पूरी कर दी। गाँव के चौकीदार ने इस घटना की रपट की, जैसा उसका कर्तव्य था। और थानेदार साहब भला अपने कर्तव्य से कब चूकनेवाले थे। अब गाँववालों को भी उनकी सेवा-सत्कार करके अपने कर्तव्य का पालन करना चाहिए। दातादीन, झिंगुरीसिंह, नोखेराम, उनके चारों प्यादे, मँगरू साह और लाला पटेश्वरी, सभी आ पहुँचे और दारोग़ाजी के सामने हाथ बाँधकर खड़े हो गये। होरी की तलबी हुई। जीवन में यह पहला अवसर था कि वह दारोग़ा के सामने आया। ऐसा डर रहा था, जैसे फाँसी हो जायेगी। धनिया को पीटते समय उसका एक-एक अंग फड़क रहा था। दारोग़ा के सामने कछुए की भाँति भीतर सिमटा जाता था। दारोग़ा ने उसे आलोचक नेत्रों से देखा और उसके हृदय तक पहुँच गये। आदमियों की नस पहचानने का उन्हें अच्छा अभ्यास था। किताबी मनोविज्ञान में कोरे, पर व्यावहारिक मनोविज्ञान के मर्मज्न थे। यक़ीन हो गया, आज अच्छे का मुँह देखकर उठे हैं। और होरी का चेहरा कहे देता था, इसे केवल एक घुड़की काफ़ी है। दारोग़ा ने पूछा -- तुझे किस पर शुबहा है?

होरी ने ज़मीन छुई और हाथ बाँधकर बोला -- मेरा सुबहा किसी पर नहीं है सरकार, गाय अपनी मौत से मरी है। बुड्ढी हो गयी थी।

धनिया भी आकर पीछे खड़ी थी। तुरन्त बोली -- गाय मारी है तुम्हारे भाई हीरा ने। सरकार ऐसे बौड़म नहीं हैं कि जो कुछ तुम कह दोगे, वह मान लेंगे। यहाँ जाँच-तहक़िक़ात करने आये हैं।

दारोग़ाजी ने पूछा -- यह कौन औरत है?

कई आदमियों ने दारोग़ाजी से कुछ बातचीत करने का सौभाग्य प्राप्त करने के लिए चढ़ा-ऊपरी की। एक साथ बोले और अपने मन को इस कल्पना से सन्तोष दिया कि पहले मैं बोला -- होरी की घरवाली है सरकार!

'तो इसे बुलाओ, मैं पहले इसी का बयान लिखूँगा। वह कहाँ है हीरा? '

विशिष्ट जनों ने एक स्वर से कहा -- वह तो आज सबेरे से कहीं चला गया है सरकार!

'मैं उसके घर की तलाशी लूँगा। '

तलाशी! होरी की साँस तले-ऊपर होने लगी। उसके भाई हीरा के घर की तलाशी होगी और हीरा घर में नहीं है। और फिर होरी के जीते-जी, उसके देखते यह तलाशी न होने पायेगी; और धनिया से अब उसका कोई सम्बन्ध नहीं। जहाँ चाहे जाय। जब वह उसकी इज़्ज़त बिगाड़ने पर आ गयी है, तो उसके घर में कैसे रह सकती है। जब गली-गली ठोकर खायेगी, तब पता चलेगा। गाँव के विशिष्ट जनों ने इस महान संकट को टालने के लिए काना-फूसी शुरू की।

दातादीन ने गंजा सिर हिलाकर कहा -- यह सब कमाने के ढंग हैं। पूछो, हीरा के घर में क्या रखा है।

पटेश्वरीलाल बहुत लम्बे थे; पर लम्बे होकर भी बेवक़ूफ़ न थे। अपना लम्बा काला मुँह और लम्बा करके बोले -- और यहाँ आया है किस लिए, और जब आया है बिना कुछ लिये-दिये गया कब है?

झिंगुरीसिंह ने होरी को बुलाकर कान में कहा -- निकालो जो कुछ देना हो। यों गला न छूटेगा।

दारोग़ाजी ने अब ज़रा गरजकर कहा -- मैं हीरा के घर की तलाशी लूँगा। होरी के मुख का रंग ऐसा उड़ गया था, जैसे देह का सारा रक्त सूख गया हो। तलाशी उसके घर हुई तो, उसके भाई के घर हुई तो, एक ही बात है। हीरा अलग सही; पर दुनिया तो जानती है, वह उसका भाई है; मगर इस वक़्त उसका कुछ बस नहीं। उसके पास रुपए होते, तो इसी वक़्त पचास रुपए लाकर दारोग़ाजी के चरणों पर रख देता और कहता -- सरकार, मेरी इज़्ज़त अब आपके हाथ है। मगर उसके पास तो ज़हर खाने को भी एक पैसा नहीं है। धनिया के पास चाहे दो-चार रुपए पड़े हों; पर वह चुड़ैल भला क्यों देने लगी। मृत्यु-दंड पाये हुए आदमी की भाँति सिर झुकाये, अपने अपमान की वेदना का तीव्र अनुभव करता हुआ चुपचाप खड़ा रहा।

दातादीन ने होरी को सचेत किया -- अब इस तरह खड़े रहने से काम न चलेगा होरी, रुपए की कोई जुगत करे।

होरी दीन स्वर में बोला -- अब मैं क्या अरज करूँ महाराज! अभी तो पहले ही की गठरी सिर पर लदी है; और किस मुँह से मागूँ; लेकिन इस संकट से उबार लो। जीता रहा, तो कौड़ी-कौड़ी चुका दूँगा। मैं मर भी जाऊँ तो गोबर तो है ही। नेताओं में सलाह होने लगी। दारोग़ाजी को क्या भेंट किया जाय। दातादीन ने पचास का प्रस्ताव किया। झिंगुरीसिंह के अनुमान में सौ से कम पर सौदा न होगा। नोखेराम भी सौ के पक्ष में थे। और होरी के लिए सौ और पचास में कोई अन्तर न था। इस तलाशी का संकट उसके सिर से टल जाय। पूजा चाहे कितनी ही चढ़ानी पड़े। मरे को मन-भर लकड़ी से जलाओ, या दस मन से; उसे क्या चिन्ता! मगर पटेश्वरी से यह अन्याय न देखा गया। कोई डाका या क़तल तो हुआ नहीं। केवल तलाशी हो रही है। इसके लिए बीस रुपए बहुत हैं। नेताओं ने धिक्कारा -- तो फिर दारोग़ाजी से बातचीत करना। हम लोग नगीच न जायेंगे। कौन घुड़कियाँ खाय। होरी ने पटेश्वरी के पाँव पर अपना सिर रख दिया -- भैया, मेरा उद्धार करो। जब तक जिऊँगा, तुम्हारी ताबेदारी करूँगा।

दारोग़ाजी ने फिर अपने विशाल वक्ष और विशालतर उदर की पूरी शिक्त से कहा -- कहाँ है हीरा का घर? मैं उसके घर की तलाशी लूँगा।

पटेश्वरी ने आगे बढ़कर दारोग़ाजी के कान में कहा -- तलासी लेकर क्या करोगे हुज़ूर, उसका भाई आपकी ताबेदारी के लिए हाज़िर है। दोनों आदमी ज़रा अलग जाकर बातें करने लगे।

'कैसा आदमी है? '

'बहुत ही ग़रीब हुज़ूर! भोजन का ठिकाना भी नहीं! '

'सच? '

'हाँ, हुज़ूर, ईमान से कहता हूँ। '

'अरे तो क्या एक पचासे का डौल भी नहीं है? '

'कहाँ की बात हुज़ूर! दस मिल जायँ, तो हज़ार समझिए। पचास तो पचास जनम में भी मुमकिन नहीं और वह भी जब कोई महाजन खड़ा हो जायगा! '

दारोग़ाजी ने एक मिनट तक विचार करके कहा -- तो फिर उसे सताने से क्या फ़ायदा। मैं ऐसों को नहीं सताता, जो आप ही मर रहे हों।

पटेश्वरी ने देखा, निशाना और आगे जा पड़ा। बोले -- नहीं हुज़ूर, ऐसा न कीजिए, नहीं फिर हम कहाँ जायँगे। हमारे पास दूसरी और कौन-सी खेती है?

'तुम इलाक़े के पटवारी हो जी, कैसी बातें करते हो? '

'जब ऐसा ही कोई अवसर आ जाता है, तो आपकी बदौलत हम भी कुछ पा जाते हैं। नहीं पटवारी को कौन पूछता है। '

'अच्छा जाओ, तीस रुपए दिलवा दो; बीस रुपए हमारे, दस रुपए तुम्हारे। '

'चार मुखिया हैं, इसका ख़्याल कीजिए। '

'अच्छा आधे-आधे पर रखो, जल्दी करो। मुझे देर हो रही है। '

पटेश्वरी ने झिंगुरी से कहा, झिंगुरी ने होरी को इशारे से बुलाया, अपने घर ले गये, तीस रुपए गिनकर उसके हवाले किये और एहसान से दबाते हुए बोले -- आज ही कागद लिखा लेना। तुम्हारा मुँह देखकर रुपए दे रहा हूँ, तुम्हारी भलमंसी पर। होरी ने रुपए लिये और अँगोछे के कोर में बाँधे प्रसन्न मुख आकर दारोग़ाजी के ओर चला। सहसा धनिया झपटकर आगे आयी और अँगोछी एक झटके के साथ उसके हाथ से छीन ली। गाँठ पक्की न थी। झटका पाते ही खुल गयी और सारे रुपए ज़मीन पर बिखर गये। नागिन की तरह फुँकारकर बोली -- ये रुपए कहाँ लिये जा रहा है, बता। भला चाहता है, तो सब रुपए लौटा दे, नहीं कहे देती हूँ। घर के परानी रात-दिन मरें और दाने-दाने को तरसें, लत्ता भी पहनने को मयस्सर न हो और अँजुली-भर रुपए लेकर चला है इज़्ज़त बचाने! ऐसी बड़ी है तेरी इज़्ज़त! जिसके घर में चूहे लोटें, वह भी इज़्ज़तवाला है! दारोग़ा तलासी ही तो लेगा। ले-ले जहाँ चाहे तलासी। एक तो सौ रुपए की गाय गयी, उस पर यह पलेथन! वाह री तेरी इज़्ज़त!

होरी ख़ून का घूँट पीकर रह गया। सारा समूह जैसे थर्रा उठा। नेताओं के सिर झुक गये। दारोग़ा का मुँह ज़रा-सा निकल आया। अपने जीवन में उसे ऐसी लताड़ न मिली थी। होरी स्तम्भित-सा खड़ा रहा। जीवन में आज पहली बार धनिया ने उसे भरे अखाड़े में पटकनी दी, आकाश तका दिया। अब वह कैसे सिर उठाये! मगर दारोग़ाजी इतनी जल्दी हार माननेवाले न थे। खिसियाकर बोले -- मुझे ऐसा मालूम होता है, कि इस शैतान की ख़ाला ने हीरा को फँसाने के लिए ख़ुद गाय को ज़हर दे दिया।

धनिया हाथ मटकाकर बोली -- हाँ, दे दिया। अपनी गाय थी, मार डाली, फिर किसी दूसरे का जानवर तो नहीं मारा? तुम्हारे तहक़ीक़ात में यही निकलता है, तो यही लिखो। पहना दो मेरे हाथ में हथकड़ियाँ। देख लिया तुम्हारा न्याय और तुम्हारे अक्कल की दौड़। ग़रीबों का गला काटना दूसरी बात है। दूध का दूध और पानी का पानी करना दूसरी बात।

होरी आँखों से अँगारे बरसाता धनिया की ओर लपका; पर गोबर सामने आकर खड़ा हो गया और उग्र भाव से बोला -- अच्छा दादा, अब बहुत हुआ। पीछे हट जाओ, नहीं मैं कहे देता हूँ, मेरा मुँह न देखोगे। तुम्हारे ऊपर हाथ न उठाऊँगा। ऐसा कपूत नहीं हूँ। यहीं गले में फाँसी लगा लूँगा।

होरी पीछे हट गया और धनिया शेर होकर बोली -- तू हट जा गोबर, देखूँ तो क्या करता है मेरा। दारोग़ाजी बैठे हैं। इसकी हिम्मत देखूँ। घर में तलाशी होने से इसकी इज़्ज़त जाती है। अपनी मेहरिया को सारे गाँव के सामने लतियाने से इसकी इज़्ज़त नहीं जाती! यही तो बीरों का धरम है। बड़ा बीर है, तो किसी मर्द से लड़। जिसकी बाँह पकड़कर लाया, उसे मारकर बहादुर न कहलायेगा। तू समझता होगा, मैं इसे रोटी कपड़ा देता हूँ। आज से अपना घर सँभाल। देख तो इसी गाँव में तेरी छाती पर मूँग दलकर रहती हूँ कि नहीं, और उससे अच्छा खाऊँ-पहनूँगी। इच्छा हो, देख ले।

होरी परास्त हो गया। उसे ज्ञात हुआ, स्त्री के सामने पुरुष कितना निर्बल, कितना निरुपाय है। नेताओं ने रुपए चुनकर उठा लिये थे और दारोग़ाजी को वहाँ से चलने का इशारा कर रहे थे। धनिया ने एक ठोकर और जमायी -- जिसके रुपए हों, ले जाकर उसे दे दो। हमें किसी से उधार नहीं लेना है। और जो देना है, तो उसी से लेना। मैं दमड़ी भी न दूँगी, चाहे मुझे हाकिम के इजलास तक ही चढ़ना पड़े। हम बाक़ी चुकाने को पचीस रुपए माँगते थे, किसी ने न दिया। आज अँजुली-भर रुपये ठनाठन निकाल के दिये। मैं सब जानती हूँ। यहाँ तो बाँट-बखरा होनेवाला था, सभी के मुँह मीठे होते। ये हत्यारे गाँव के मुखिया हैं, ग़रीबों का ख़ून चूसनेवाले! सूद-ब्याज डेढ़ी-सवाई, नज़र-नज़राना, घूस-घास जैसे भी हो, ग़रीबों को लूटो। उस पर सुराज चाहिए। जेल जाने से सुराज न मिलेगा। सुराज मिलेगा धरम से, न्याय से।

नेताओं के मुँह में कालिख-सी लगी हुई थी। दारोग़ाजी के मुँह पर झाड़-सी फिरी हुई थी। इज़्ज़त बचाने के लिए हीरा के घर की ओर चले। रास्ते में दारोग़ा ने स्वीकार किया -- औरत है बड़ी दिलेर!

पटेश्वरी बोले -- दिलेर है हुज़ूर, कर्कशा है। ऐसी औरत को तो गोली मार दे।

'तुम लोगों का क़ाफ़िया तंग कर दिया उसने। चार-चार तो मिलते ही। '

'हुज़ूर के भी तो पन्द्रह रुपए गये। '

'मेरे कहाँ जा सकते हैं। वह न देगा, गाँव के मुखिया देंगे और पन्द्रह रुपये की जगह पूरे पचास रुपए। आप लोग चटपट इन्तज़ाम कीजिए। '

पटेश्वरीलाल ने हँसकर कहा -- हुज़ूर बड़े दिल्लगीबाज़ हैं। दातादीन बोले-बड़े आदमियों के यही लक्षण हैं। ऐसे भाग्यवानों के दर्शन कहाँ होते हैं।

दारोग़ाजी ने कठोर स्वर में कहा -- यह ख़ुशामद फिर कीजिएगा। इस वक़्त तो मुझे पचास रुपए दिलवाइए, नक़द; और यह समझ लो कि आनाकानी की, तो मैं तुम चारों के घर की तलाशी लूँगा। बहुत मुमकिन है कि तुमने हीरा और होरी को फँसाकर उनसे सौ-पचास ऐंठने के लिए यह पाखंड रचा हो।

नेतागण अभी तक यही समझ रहे हैं, दारोग़ाजी विनोद कर रहे हैं। झिंगुरीसिंह ने आँखें मारकर कहा -- निकालो पचास रुपए पटवारी साहब!

नोखेराम ने उनका समर्थन किया -- पटवारी साहब का इलाक़ा है। उन्हें ज़रूर आपकी ख़ातिर करनी चाहिए।

पण्डित नोखेरामजी की चौपाल आ गयी। दारोग़ाजी एक चारपाई पर बैठ गये और बोले -- तुम लोगों ने क्या निश्चय किया? रुपए निकालते हो या तलाशी करवाते हो?

दातादीन ने आपत्ति की -- मगर हुज़ूर...

'मैं अगर-मगर कुछ नहीं सुनना चाहता। '

झिंगुरीसिंह ने साहस किया -- सरकार यह तो सरासर...

'मैं पन्द्रह मिनट का समय देता हूँ। अगर इतनी देर में पूरे पचास रुपए न आये, तो तुम चारों के घर की तलाशी होगी। और गंडासिंह को जानते हो। उसका मारा पानी भी नहीं माँगता। '

पटेश्वरीलाल ने तेज़ स्वर से कहा -- आपको अख़्तियार है, तलाशी ले लें। यह अच्छी दिल्लगी है, काम कौन करे, पकड़ा कौन जाय।

'मैंने पचीस साल थानेदारी की है जानते हो? '

'लेकिन ऐसा अँधेर तो कभी नहीं हुआ। '

'तुमने अभी अँधेर नहीं देखा। कहो तो वह भी दिखा दूँ। एक-एक को पाँच-पाँच साल के लिए भेजवा दूँ। यह मेरे बायें हाथ का खेल है। डाके में सारे गाँव को काले पानी भेजवा सकता हूँ। इस धोखे में न रहना! '

चारों सज्जन चौपाल के अन्दर जाकर विचार करने लगे। फिर क्या हुआ किसी को मालूम नहीं, हाँ, दारोग़ाजी प्रसन्न दिखायी दे रहे थे। और चारों सज्जनों के मुँह पर फटकार बरस रही थी। दारोग़ाजी घोड़े पर सवार होकर चले, तो चारों नेता दौड़ रहे थे। घोड़ा दूर निकल गया तो चारों सज्जन लौटे; इस तरह मानो किसी प्रियजन का संस्कार करके श्मशान से लौट रहे हों। सहसा दातादीन बोले -- मेरा सराप न पड़े तो मुँह न दिखाऊँ।

नोखेराम ने समर्थन किया -- ऐसा धन कभी फलते नहीं देखा।

पटेश्वरी ने भविष्यवाणी की -- हराम की कमाई हराम में जायगी।

झिंगुरीसिंह को आज ईश्वर की न्यायपरता में सन्देह हो गया था। भगवान् न जाने कहाँ हैं कि यह अँधेर देखकर भी पापियों को दंड नहीं देते। इस वक़्त इन सज्जनों की तस्वीर खींचने लायक़ थी।

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