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गोदान भाग - 3

गोदान भाग - 3

हीरा का कहीं पता न चला और दिन गुज़रते जाते थे। होरी से जहाँ तक दौड़धूप हो सकी की; फिर हारकर बैठ रहा। खेती-बारी की भी फ़िक्र करनी थी। अकेला आदमी क्या-क्या करता। और अब अपनी खेती से ज़्यादा फ़िक्र थी पुनिया की खेती की। पुनिया अब अकेली होकर और भी प्रचंड हो गयी थी। होरी को अब उसकी ख़ुशामद करते बीतती थी। हीरा था, तो वह पुनिया को दबाये रहता था। उसके चले जाने से अब पुनिया पर कोई अंकुस न रह गया था। होरी की पट्टीदारी हीरा से थी। पुनिया अबला थी। उससे वह क्या तनातनी करता। और पुनिया उसके स्वभाव से परिचित थी और उसकी सज्जनता का उसे ख़ूब दंड देती थी। ख़ैरियत यही हुई कि कारकुन साहब ने पुनिया से बक़ाया लगान वसूल करने की कोई सख़्ती न की, केवल थोड़ी सी पूजा लेकर राज़ी हो गये। नहीं, होरी अपनी बक़ाया के साथ उसकी बक़ाया चुकाने के लिए भी क़रज़ लेने को तैयार था। सावन में धान की रोपाई की ऐसी धूम रही कि मजूर न मिले और होरी अपने खेतों में धान न रोप सका; लेकिन पुनिया के खेतों में कैसे न रोपाई होती। होरी ने पहर रात-रात तक काम करके उसके धान रोपे। अब होरी ही तो उसका रक्षक है! अगर पुनिया को कोई कष्ट हुआ, तो दुनिया उसी को तो हँसेगी। नतीजा यह हुआ कि होरी को ख़रीफ़ फ़सल में बहुत थोड़ा अनाज मिला, और पुनिया के बखार में धान रखने की जगह न रही। होरी और धनिया में उस दिन से बराबर मनमुटाव चला आता था। गोबर से भी होरी की बोल-चाल बन्द थी। माँ-बेटे ने मिलकर जैसे उसका बहिष्कार कर दिया था। अपने घर में परदेशी बना हुआ था। दो नावों पर सवार होनेवालों की जो दुर्गति होती है, वही उसकी हो रही थी। गाँव में भी अब उसका उतना आदर न था। धनिया ने अपने साहस से स्त्रियों का ही नहीं, पुरुषों का नेतृत्व भी प्राप्त कर लिया था। महीनों तक आसपास के इलाक़ों में कांड की ख़ूब चर्चा रही। यहाँ तक कि वह अलौकिक रूप तक धारण करता जाता था -- 'धनिया नाम है उसका जी। भवानी का इष्ट है उसे। दारोग़ाजी ने ज्योंही उसके आदमी के हाथ में हथकड़ी डाली कि धनिया ने भवानी का सुमिरन किया। भवानी उसके सिर आ गयी। फिर तो उसमें इतनी शिक्त आ गयी कि उसने एक झटके में पति की हथकड़ी तोड़ डाली और दारोग़ा की मूँछें पकड़कर उखाड़ लीं, फिर उसकी छाती पर चढ़ बैठी। दारोग़ा ने जब बहुत मानता की, तब जाकर उसे छोड़ा'

कुछ दिन तक तो लोग धनिया के दर्शनों को आते रहे। वह बात अब पुरानी पड़ गयी थी; लेकिन गाँव में धनिया का सम्मान बहुत बढ़ गया। उसमें अद्भुत साहस है और समय पड़ने पर वह मर्दो के भी कान काट सकती है। मगर धीरे-धीरे धनिया में एक परिवर्तन हो रहा था। होरी को पुनिया की खेती में लगे देखकर भी वह कुछ न बोलती थी। और यह इसलिए नहीं कि वह होरी से विरक्त हो गयी थी; बल्कि इसलिए कि पुनिया पर अब उसे भी दया आती थी। हीरा का घर से भाग जाना उसकी प्रतिशोध-भावना की तुष्टि के लिए काफ़ी था। इसी बीच में होरी को ज्वर आने लगा। फ़स्ली बुख़ार फैला था ही। होरी उसके चपेट में आ गया। और कई साल के बाद जो ज्वर आया, तो उसने सारी बक़ाया चुका ली। एक महीने तक होरी खाट पर पड़ा रहा। इस बीमारी ने होरी को तो कुचल डाला ही, पर धनिया पर भी विजय पा गयी। पति जब मर रहा है, तो उससे कैसा बैर। ऐसी दशा में तो बैरियों से भी बैर नहीं रहता, वह तो अपना पति है। लाख बुरा हो; पर उसी के साथ जीवन के पचीस साल कटे हैं, सुख किया है तो उसी के साथ, दुःख भोगा है तो उसी के साथ, अब तो चाहे वह अच्छा है या बुरा, अपना है। दाढ़ीजार ने मुझे सबके सामने मारा, सारे गाँव के सामने मेरा पानी उतार लिया; लेकिन तब से कितना लज्जित है कि सीधे ताकता नहीं। खाने आता है तो सिर झुकाये खाकर उठ जाता है, डरता रहता है कि मैं कुछ कह न बैठूँ। होरी जब अच्छा हुआ, तो पति-पत्नी में मेल हो गया था।

एक दिन धनिया ने कहा -- तुम्हें इतना ग़ुस्सा कैसे आ गया। मुझे तो तुम्हारे ऊपर कितना ही ग़ुस्सा आये मगर हाथ न उठाऊँगी।

होरी लजाता हुआ बोला -- अब उसकी चर्चा न कर धनिया! मेरे ऊपर कोई भूत सवार था। इसका मुझे कितना दुःख हुआ है, वह मैं ही जानता हूँ।

'और जो मैं भी उस क्रोध में डूब मरी होती!'

'तो क्या मैं रोने के लिए बैठा रहता? मेरी लहाश भी तेरे साथ चिता पर जाती।'

'अच्छा चुप रहो, बेबात की बात मत बको। '

'गाय गयी सो गयी, मेरे सिर पर एक विपत्ति डाल गयी। पुनिया की फ़िक्र मुझे मारे डालती है। '

'इसीलिए तो कहते हैं, भगवान् घर का बड़ा न बनाये। छोटों को कोई नहीं हँसता। नेकी-बदी सब बड़ों के सिर जाती है। '

माघ के दिन थे। मघावट लगी हुई थी। घटाटोप अँधेरा छाया हुआ था। एक तो जाड़ों की रात, दूसरे माघ की वर्षा। मौत का-सा सन्नाटा छाया हुआ था। अँधेरा तक न सूझता था। होरी भोजन करके पुनिया के मटर के खेत की मेंड़ पर अपनी मड़ैया में लेटा हुआ था। चाहता था, शीत को भूल जाय और सो रहे; लेकिन तार-तार कम्बल और फटी हुई मिरज़ई और शीत के झोंकों से गीली पुआल। इतने शत्रुओं के सम्मुख आने का नींद में साहस न था। आज तमाखू भी न मिला कि उसी से मन बहलाता। उपला सुलगा लाया था, पर शीत में वह भी बुझ गया। बेवाय फटे पैरों को पेट में डालकर और हाथों को जाँघों के बीच में दबाकर और कम्बल में मुँह छिपाकर अपनी ही गर्म साँसों से अपने को गर्म करने की चेष्टा कर रहा था। पाँच साल हुए, यह मिरज़ई बनवाई थी। धनिया ने एक प्रकार से ज़बरदस्ती बनवा दी थी, वही जब एक बार काबुली से कपड़े लिये थे, जिसके पीछे कितनी साँसत हुई, कितनी गालियाँ खानी पड़ीं, और कम्बल तो उसके जन्म से भी पहले का है। बचपन में अपने बाप के साथ वह इसी में सोता था, जवानी में गोबर को लेकर इसी कम्बल में उसके जाड़े कटे थे और बुढ़ापे में आज वही बूढ़ा कम्बल उसका साथी है, पर अब वह भोजन को चबानेवाला दाँत नहीं, दुखनेवाला दाँत है। जीवन में ऐसा तो कोई दिन ही नहीं आया कि लगान और महाजन को देकर कभी कुछ बचा हो। और बैठे बैठाये यह एक नया जंजाल पड़ गया। न करो तो दुनिया हँसे, करो तो यह संशय बना रहे कि लोग क्या कहते हैं। सब यह समझते हैं कि वह दुनिया को लूट लेता है, उसकी सारी उपज घर में भर लेता है। एहसान तो क्या होगा उलटा कलंक लग रहा है। और उधर भोला कई बेर याद दिला चुके हैं कि कहीं कोई सगाई का डौल करो, अब काम नहीं चलता। सोभा उससे कई बार कह चुका है कि पुनिया के विचार उसकी ओर से अच्छे नहीं हैं। न हों। पुनिया की गृहस्थी तो उसे सँभालनी ही पड़ेगी, चाहे हँसकर सँभाले या रोकर। धनिया का दिल भी अभी तक साफ़ नहीं हुआ। अभी तक उसके मन में मलाल बना हुआ है। मुझे सब आदमियों के सामने उसको मारना न चाहिए था। जिसके साथ पचीस साल गुज़र गये, उसे मारना और सारे गाँव के सामने, मेरी नीचता थी; लेकिन धनिया ने भी तो मेरी आबरू उतारने में कोई कसर नहीं छोड़ी। मेरे सामने से कैसा कतराकर निकल जाती है जैसे कभी की जान-पहचान ही नहीं। कोई बात कहनी होती है, तो सोना या रूपा से कहलाती है। देखता हूँ उसकी साड़ी फट गयी है; मगर कल मुझसे कहा भी, तो सोना की साड़ी के लिए, अपनी साड़ी का नाम तक न लिया। सोना की साड़ी अभी दो-एक महीने थेगलियाँ लगाकर चल सकती है। उसकी साड़ी तो मारे पेवन्दों के बिलकुल कथरी हो गयी है। और फिर मैं ही कौन उसका मनुहार कर रहा हूँ। अगर मैं ही उसके मन की दो-चार बातें करता रहता, तो कौन छोटा हो जाता। यही तो होता वह थोड़ा-सा अदरवान कराती, दो-चार लगनेवाली बात कहती तो क्या मुझे चोट लग जाती; लेकिन मैं बुड्ढा होकर भी उल्लू बना रह गया। वह तो कहो इस बीमारी ने आकर उसे नर्म कर दिया, नहीं जाने कब तक मुँह फुलाये रहती। और आज उन दोनों में जो बातें हुई थीं, वह मानो भूखे का भोजन थीं। वह दिल से बोली थी और होरी गद्गद हो गया था। उसके जी में आया, उसके पैरों पर सिर रख दे और कहे -- मैंने तुझे मारा है तो ले मैं सिर झुकाये लेता हूँ, जितना चाहे मार ले, जितनी गालियाँ देना चाहे दे ले। सहसा उसे मँड़ैया के सामने चूड़ियों की झंकार सुनायी दी। उसने कान लगाकर सुना। हाँ, कोई है। पटवारी की लड़की होगी, चाहे पण्डित की घरवाली हो। मटर उखाड़ने आयी होगी। न जाने क्यों इन लोगों की नीयत इतनी खोटी है। सारे गाँव से अच्छा पहनते हैं, सारे गाँव से अच्छा खाते हैं, घर में हज़ारों रुपए गड़े हैं, लेन-देन करते हैं, डयोढ़ी-सवाई चलाते हैं, घूस लेते हैं, दस्तूरी लेते हैं, एक-न-एक मामला खड़ा करके हमा-सुमा को पीसते रहते हैं, फिर भी नीयत का यह हाल! बाप जैसा होगा, वैसी ही सन्तान भी होगी। और आप नहीं आते, औरतों को भेजते हैं। अभी उठकर हाथ पकड़ लूँ तो क्या पानी रह जाय। नीच कहने को नीच हैं; जो ऊँचे हैं, उनका मन तो और नीचा है। औरत जात का हाथ पकड़ते भी तो नहीं बनता, आँखों देखकर मक्खी निगलनी पड़ती है। उखाड़ ले भाई, जितना तेरा जी चाहे। समझ ले, मैं नहीं हूँ। बड़े आदमी अपनी लाज न रखें, छोटों को तो उनकी लाज रखनी ही पड़ती है। मगर नहीं, यह तो धनिया है। पुकार रही है।

धनिया ने पुकारा -- सो गये कि जागते हो? होरी झटपट उठा और मँड़ैया के बाहर निकल आया। आज मालूम होता है, देवी प्रसन्न हो गयी, उसे वरदान देने आयी हैं, इसके साथ ही इस बादल-बूँदी और जाड़े-पाले में इतनी रात गये उसका आना शंकाप्रद भी था। ज़रूर कोई-न-कोई बात हुई है। बोला -- ठंडी के मारे नींद भी आती है? तू इस जाड़े-पाले में कैसे आयी? कुसल तो है?

'हाँ सब कुसल है। '

'गोबर को भेजकर मुझे क्यों नहीं बुलवा लिया। '

धनिया ने कोई उत्तर न दिया। मँड़ैया में आकर पुआल पर बैठती हुई बोली -- गोबर ने तो मुँह में कालिख लगा दी, उसकी करनी क्या पूछते हो। जिस बात को डरती थी, वह होकर रही।

'क्या हुआ क्या? किसी से मार-पीट कर बैठा?'

'अब मैं जानूँ, क्या कर बैठा, चलकर पूछो उसी राँड़ से?'

'किस राँड़ से? क्या कहती है तू? बौरा तो नहीं गयी?'

'हाँ, बौरा क्यों न जाऊँगी। बात ही ऐसी हुई है कि छाती दुगुनी हो जाय।'

होरी के मन में प्रकाश की एक लंबी रेखा ने प्रवेश किया।

'साफ़-साफ़ क्यों नहीं कहती। किस राँड़ को कह रही है? '

'उसी झुनिया को, और किसको! '

'तो झुनिया क्या यहाँ आयी है? '

'और कहाँ जाती, पूछता कौन? '

'गोबर क्या घर में नहीं है? '

'गोबर का कहीं पता नहीं। जाने कहाँ भाग गया। इसे पाँच महीने का पेट है। '

होरी सब कुछ समझ गया। गोबर को बार-बार अहिराने जाते देखकर वह खटका था ज़रूर; मगर उसे ऐसा खिलाड़ी न समझता था। युवकों में कुछ रसिकता होती ही है, इसमें कोई नयी बात नहीं। मगर जिस रूई के गाले को उसने नीले आकाश में हवा के झोंके से उड़ते देखकर केवल मुस्करा दिया था, वह सारे आकाश में छाकर उसके मार्ग को इतना अन्धकारमय बना देगा, यह तो कोई देवता भी न जान सकता था। गोबर ऐसा लम्पट! वह सरल गँवार जिसे वह अभी बच्चा समझता था; लेकिन उसे भोज की चिन्ता न थी, पंचायत का भय न था, झुनिया घर में कैसे रहेगी इसकी चिन्ता भी उसे न थी। उसे चिन्ता थी गोबर की। लड़का लज्जाशील है, अनाड़ी है आत्माभिमानी है, कहीं कोई नादानी न कर बैठे। घबड़ाकर बोला -- झुनिया ने कुछ कहा नहीं, गोबर कहाँ गया? उससे कहकर ही गया होगा। धनिया झुँझलाकर बोली -- तुम्हारी अक्कल तो घास खा गयी है। उसकी चहेती तो यहाँ बैठी है, भागकर जायगा कहाँ? यहीं कहीं छिपा बैठा होगा। दूध थोड़े ही पीता है कि खो जायगा। मुझे तो इस कलमुँही झुनिया की चिन्ता है कि इसे क्या करूँ? अपने घर में तो मैं छन-भर भी न रहने दूँगी। जिस दिन गाय लाने गया है, उसी दिन से दोनों में ताक-झाँक होने लगी। पेट न रहता तो अभी बात न खुलती। मगर जब पेट रह गया तो झुनिया लगी घबड़ाने। कहने लगी, कहीं भाग चलो। गोबर टालता रहा। एक औरत को साथ लेके कहाँ जाय, कुछ न सूझा। आख़िर जब आज वह सिर हो गयी कि मुझे यहाँ से ले चलो, नहीं मैं परान दे दूँगी, तो बोला -- तू चलकर मेरे घर में रह, कोई कुछ न बोलेगा, अम्माँ को मना लूँगा। यह गधी उसके साथ चल पड़ी। कुछ दूर तो आगे-आगे आता रहा, फिर न जाने किधर सरक गया। यह खड़ी-खड़ी उसे पुकारती रही। जब रात भींग गयी और वह न लौटा, भागी यहाँ चली आयी। मैंने तो कह दिया, जैसा किया है वैसा फल भोग। चुड़ैल ने लेके मेरे लड़के को चौपट कर दिया। तब से बैठी रो रही है। उठती ही नहीं। कहती है, अपने घर कौन मुँह लेकर जाऊँ। भगवान् ऐसी सन्तान से तो बाँझ ही रखे तो अच्छा। सबेरा होते-होते सारे गाँव में काँव काँव मच जायगी। ऐसा जी होता है, माहुर खा लूँ। मैं तुमसे कहे देती हूँ, मैं अपने घर में न रखूँगी। गोबर को रखना हो, अपने सिर पर रखे। मेरे घर में ऐसी छत्तीसियों के लिए जगह नहीं है और अगर तुम बीच में बोले, तो फिर या तो तुम्हीं रहोगे, या मैं ही रहूँगी। होरी बोला -- तुझसे बना नहीं। उसे घर में आने ही न देना चाहिए था।

'सब कुछ कहके हार गयी। टलती ही नहीं। धरना दिये बैठी है। '

'अच्छा चल, देखूँ कैसे नहीं उठती, घसीटकर बाहर निकाल दूँगा। '

'दाढ़ीजार भोला सब कुछ देख रहा था; पर चुप्पी साधे बैठा रहा। बाप भी ऐसे बेहया होते हैं! '

'वह क्या जानता था, इनके बीच में क्या खिचड़ी पक रही है। '

'जानता क्यों नहीं था। गोबर रात-दिन घेरे रहता था तो क्या उसकी आँखें फूट गयी थीं। सोचना चाहिए था न, कि यहाँ क्यों दौड़-दौड़ आता है। '

'चल मैं झुनिया से पूछता हूँ न।'

दोनों मँड़ैया से निकलकर गाँव की ओर चले। होरी ने कहा -- पाँच घड़ी रात के ऊपर गयी होगी। धनिया बोली -- हाँ, और क्या; मगर कैसा सोता पड़ गया है। कोई चोर आये, तो सारे गाँव को मूस ले जाय।

'चोर ऐसे गाँव में नहीं आते। धनियों के घर जाते हैं। '

धनिया ने ठिठक कर होरी का हाथ पकड़ लिया और बोली -- देखो, हल्ला न मचाना; नहीं सारा गाँव जाग उठेगा और बात फैल जायगी। होरी ने कठोर स्वर में कहा -- मैं यह कुछ नहीं जानता। हाथ पकड़कर घसीट लाऊँगा और गाँव के बाहर कर दूँगा। बात तो एक दिन खुलनी ही है, फिर आज ही क्यों न खुल जाय। वह मेरे घर आयी क्यों? जाय जहाँ गोबर है। उसके साथ कुकरम किया, तो क्या हमसे पूछकर किया था? धनिया ने फिर उसका हाथ पकड़ा और धीरे से बोली -- तुम उसका हाथ पकड़ोगे, तो वह चिल्लायेगी।

'तो चिल्लाया करे। '

'मुदा इतनी रात गये इस अँधेरे सन्नाटे रात में जायगी कहाँ, यह तो सोचो। '

'जाय जहाँ उसके सगे हों। हमारे घर में उसका क्या रखा है! '

'हाँ, लेकिन इतनी रात गये घर से निकालना उचित नहीं। पाँव भारी है, कहीं डर-डरा जाय, तो और आफ़त हो। ऐसी दशा में कुछ करते-धरते भी तो नहीं बनता! '

'हमें क्या करना है, मरे या जीये। जहाँ चाहे जाय। क्यों अपने मुँह में कालिख लगाऊँ। मैं तो गोबर को भी निकाल बाहर करूँगा। '

धनिया ने गम्भीर चिन्ता से कहा -- कालिख जो लगनी थी, वह तो अब लग चुकी। वह अब जीते-जी नहीं छूट सकती। गोबर ने नौका डुबा दी।

'गोबर ने नहीं, डुबाई इसी ने। वह तो बच्चा था। इसके पंजे में आ गया। '

'किसी ने डुबाई, अब तो डूब गयी। '

दोनों द्वार के सामने पहुँच गये। सहसा धनिया ने होरी के गले में हाथ डालकर कहा -- देखो तुम्हें मेरी सौंह, उस पर हाथ न उठाना। वह तो आप ही रो रही है। भाग की खोटी न होती, तो यह दिन ही क्यों आता। होरी की आँखें आद्रर् हो गयीं। धनिया का यह मातृ-स्नेह उस अँधेरे में भी जैसे दीपक के समान उसकी चिन्ता-जर्जर आकृति को शोभा प्रदान करने लगा। दोनों ही के हृदय में जैसे अतीत-यौवन सचेत हो उठा। होरी को इस वीत-यौवना में भी वही कोमल हृदय बालिका नज़र आयी, जिसने पच्चीस साल पहले उसके जीवन में प्रवेश किया था। उस आलिंगन में कितना अथाह वात्सल्य था, जो सारे कलंक, सारी बाधाओं और सारी मूलबद्ध परम्पराओं को अपने अन्दर समेटे लेता था। दोनों ने द्वार पर आकर किवाड़ों के दराज़ से अन्दर झाँका। दीवट पर तेल की कुप्पी जल रही थी और उसके मध्यम प्रकाश में झुनिया घुटने पर सिर रखे, द्वार की ओर मुँह किये, अन्धकार में उस आनन्द को खोज रही थी, जो एक क्षण पहले अपनी मोहिनी छवि दिखाकर विलीन हो गया था। वह आफ़त की मारी व्यंग-बाणों से आहत और जीवन के आघातों से व्यथित किसी वृक्ष की छाँह खोजती फिरती थी, और उसे एक भवन मिल गया था, जिसके आश्रय में वह अपने को सुरिक्षत और सुखी समझ रही थी; पर आज वह भवन अपना सारा सुख-विलास लिये अलादीन के राजमहल की भाँति ग़ायब हो गया था और भविष्य एक विकराल दानव के समान उसे निगल जाने को खड़ा था। एकाएक द्वार खुलते और होरी को आते देखकर वह भय से काँपती हुई उठी और होरी के पैरों पर गिरकर रोती हुई बोली -- दादा, अब तुम्हारे सिवाय मुझे दूसरा ठौर नहीं है, चाहे मारो चाहे काटो; लेकिन अपने द्वार से दुरदुराओ मत। होरी ने झुककर उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए प्यार-भरे स्वर में कहा -- डर मत बेटी, डर मत। तेरा घर है, तेरा द्वार है, तेरे हम हैं। आराम से रह। जैसी तू भोला की बेटी है, वैसी ही मेरी बेटी है। जब तक हम जीते हैं, किसी बात की चिन्ता मत कर। हमारे रहते कोई तुझे तिरछी आँखों न देख सकेगा। भोज-भात जो लगेगा, वह हम सब दे लेंगे, तू ख़ातिर-जमा रख। झुनिया, सान्त्वना पाकर और भी होरी के पैरों से चिमट गयी और बोली -- दादा अब तुम्हीं मेरे बाप हो और अम्माँ, तुम्हीं मेरी माँ हो। मैं अनाथ हूँ। मुझे सरन दो, नहीं मेरे काका और भाई मुझे कच्चा ही खा जायँगे। धनिया अपनी करुणा के आवेश को अब न रोक सकी। बोली -- तू चल घर में बैठ, मैं देख लूँगी काका और भैया को। संसार में उन्हीं का राज नहीं है। बहुत करेंगे, अपने गहने ले लेंगे। फेंक देना उतारकर। अभी ज़रा देर पहले धनिया ने क्तोध के आवेश में झुनिया को कुलटा और कलंकिनी और कलमुँही न जाने क्या-क्या कह डाला था। झाड़ू मारकर घर से निकालने जा रही थी। अब जो झुनिया ने स्नेह, क्षमा और आश्वासन से भरे यह वाक्य सुने, तो होरी के पाँव छोड़कर धनिया के पाँव से लिपट गयी और वही साध्वी जिसने होरी के सिवा किसी पुरुष को आँख भरकर देखा भी न था, इस पापिष्ठा को गले लगाये उसके आँसू पोछ रही थी और उसके त्रस्त हृदय को अपने कोमल शब्दों से शान्त कर रही थी, जैसे कोई चिड़िया अपने बच्चे को परों में छिपाये बैठी हो। होरी ने धनिया को संकेत किया कि इसे कुछ खिला-पिला दे और झुनिया से पूछा -- क्यों बेटी, तुझे कुछ मालूम है, गोबर किधर गया! झुनिया ने सिसकते हुए कहा -- मुझसे तो कुछ नहीं कहा। मेरे कारन तुम्हारे ऊपर । यह कहते-कहते उसकी आवाज़ आँसुओं में डूब गयी। होरी अपनी व्याकुलता न छिपा सका।

'जब तूने आज उसे देखा, तो कुछ दुखी था? '

'बातें तो हँस-हँसकर कर रहे थे। मन का हाल भगवान् जाने। '

'तेरा मन क्या कहता है, है गाँव में ही कि कहीं बाहर चला गया? '

'मुझे तो शंका होती है, कहीं बाहर चले गये हैं। '

'यही मेरा मन भी कहता है, कैसी नादानी की। हम उसके दुसमन थोड़े ही थे। जब भली या बुरी एक बात हो गयी, तो उसे निभानी पड़ती है। इस तरह भागकर तो उसने हमारी जान आफ़त में डाल दी। '

धनिया ने झुनिया का हाथ पकड़कर अन्दर ले जाते हुए कहा -- कायर कहीं का। जिसकी बाँह पकड़ी, उसका निबाह करना चाहिए कि मुँह में कालिख लगाकर भाग जाना चाहिए। अब जो आये, तो घर में पैठने न दूँ। होरी वहीं पुआल में लेटा। गोबर कहाँ गया? यह प्रश्न उसके हृदयाकाश में किसी पक्षी की भाँति मँडराने लगा।

ऐसे असाधारण कांड पर गाँव में जो कुछ हलचल मचना चाहिए था, वह मचा और महीनों तक मचता रहा। झुनिया के दोनों भाई लाठियाँ लिये गोबर को खोजते फिरते थें। भोला ने क़सम खायी कि अब न झुनिया का मुँह देखेंगे और न इस गाँव का।

होरी से उन्होंने अपनी सगाई की जो बातचीत की थी, वह अब टूट गयी थी। अब वह अपनी गाय के दाम लेंगे और नक़द और इसमें विलम्ब हुआ तो होरी पर दावा करके उसका घर-द्वार नीलाम करा लेंगे। गाँववालों ने होरी को जाति-बाहर कर दिया।

कोई उसका हुक़्क़ा नहीं पीता, न उसके घर का पानी पीता है। पानी बन्द कर देने की कुछ बातचीत थी; लेकिन धनिया का चंडी-रूप सब देख चुके थे; इसलिये किसी की आगे आने की हिम्मत न पड़ी।

— 'धनिया ने सबको सुना-सुनाकर कह दिया -- किसी ने उसे पानी भरने से रोका, तो उसका और अपना ख़ून एक कर देगी।' इस ललकार ने सभी के पित्ते पानी कर दिये।

सबसे दुखी है झुनिया, जिसके कारण यह सब उपद्रव हो रहा है, और गोबर की कोई खोज-ख़बर न मिलना इस दुःख को और भी दारुण बना रहा है। सारे दिन मुँह छिपाये घर में पड़ी रहती है।

बाहर निकले तो चारों ओर से वाग्बाणों की ऐसी वर्षा हो कि जान बचाना मुश्किल हो जाय। दिन-भर घर के धन्धे करती रहती है और जब अवसर पाती है, रो लेती है। हरदम थर-थर काँपती रहती है कि कहीं धनिया कुछ कह न बैठे।

अकेला भोजन तो नहीं पका सकती; क्योंकि कोई उसके हाथ का खायेगा नहीं, बाक़ी सारा काम उसने अपने ऊपर ले लिया। गाँव में जहाँ चार स्त्री-पुरुष जमा हो जाते हैं, यही कुत्सा होने लगती है।

एक दिन धनिया हाट से चली आ रही थी कि रास्ते में पण्डित दातादीन मिल गये। धनिया ने सिर नीचा कर लिया और चाहती थी कि कतराकर निकल जाय; पर पण्डितजी छेड़ने का अवसर पाकर कब चूकनेवाले थे।

— 'छेड़ ही तो दिया -- गोबर का कुछ सर-सन्देश मिला कि नहीं धनिया? ऐसा कपूत निकला कि घर की सारी मरजाद बिगाड़ दी।'

धनिया के मन में स्वयम् यही भाव आते रहते थे। उदास मन से बोली -- 'बुरे दिन आते हैं बाबा, तो आदमी की मति फिर जाती है, और क्या कहूँ।'

— 'दातादीन बोले -- तुम्हें इस दुष्टा को घर में न रखना चाहिए था। दूध में मक्खी पड़ जाती है, तो आदमी उसे निकालकर फेंक देता है, और दूध पी जाता है। सोचो, कितनी बदनामी और जग-हँसाई हो रही है।'

— 'वह कुलटा घर में न रहती, तो कुछ न होता। लड़कों से इस तरह की भूल-चूक होती रहती है। जब तक बिरादरी को भात न दोगे, बाम्हनों को भोज न दोगे, कैसे उद्धार होगा? उसे घर में न रखते, तो कुछ न होता। होरी तो पागल है ही, तू कैसे धोखा खा गयी।'

दातादीन का लड़का मातादीन एक चमारिन से फँसा हुआ था। इसे सारा गाँव जानता था; पर वह तिलक लगाता था, पोथी-पत्रे बाँचता था, कथा-भागवत कहता था, धर्म-संस्कार कराता था। उसकी प्रतिष्ठा में ज़रा भी कमी न थी।

धनिया जानती थी, झुनिया को आश्रय देने ही से यह सारी विपित्त आयी है। उसे न जाने कैसे दया आ गयी, नहीं उसी रात को झुनिया को निकाल देती, तो क्यों इतना उपहास होता; लेकिन यह भय भी होता था कि तब उसके लिए नदी या कुआँ के सिवा और ठिकाना कहाँ था।

एक प्राण का मूल्य देकर -- एक नहीं दो प्राणों का -- वह अपने मरजाद की रक्षा कैसे करती? फिर झुनिया के गर्भ में जो बालक है, वह घनिया ही के हृदय का टुकड़ा तो है। हँसी के डर से उसके प्राण कैसे ले लेती!

झुनिया की नम्रता और दीनता भी उसे निरस्त्र करती रहती थी। यह जली-भुनी बाहर से आती; पर ज्योंही झुनिया लोटे का पानी लाकर रख देती और उसके पाँव दबाने लगती, उसका क्रोध पानी हो जाता। बेचारी अपनी लज्जा और दुःख से आप दबी हुई है, उसे और क्या दबाये, मरे को क्या मारे।

— 'उसने तीव्र स्वर में कहा -- हमको कुल-परतिसठा इतनी प्यारी नहीं है महाराज, कि उसके पीछे एक जीव की हत्या कर डालते। ब्याहता न सही; पर उसकी बाँह तो पकड़ी है मेरे बेटे ने ही। किस मुँह से निकाल देती।'

— 'वही काम बड़े-बड़े करते हैं, मुदा उनसे कोई नहीं बोलता, उन्हें कलंक ही नहीं लगता। वही काम छोटे आदमी करते हैं, तो उनकी मरजाद बिगड़ जाती है, नाक कट जाती है। बड़े आदमियों को अपनी नाक दूसरों की जान से प्यारी होगी, हमें तो अपनी नाक इतनी प्यारी नहीं।'

दातादीन हार माननेवाले जीव न थे। वह इस गाँव के नारद थे। यहाँ की वहाँ, वहाँ की यहाँ, यही उनका व्यवसाय था। ज़मींदार को आज तक लगान की एक पाई न दी थी, क़ुर्क़ी आती, तो कुएँ में गिरने चलते; मगर असामियों को सूद पर रुपए उधार देते थे।

वे सभा-चतुर इतने हैं कि जवानों में जवान बन जाते हैं, बालकों में बालक और बूढ़ों में बूढ़े। गाँव में किसी को उन पर विश्वास नहीं है; पर उनकी वाणी में कुछ ऐसा आकर्षण है कि लोग बार-बार धोखा खाकर भी उन्हीं की शरण जाते हैं।

— 'सिर और दाढ़ी हिलाकर बोले -- यह तू ठीक कहती है धनिया! धमार्त्मा लोगों का यही धरम है; लेकिन लोक-रीति का निबाह तो करना ही पड़ता है।'

इसी तरह एक दिन लाला पटेश्वरी ने होरी को छेड़ा। वह गाँव में पुण्यात्मा मशहूर थे, पर पटवारी होने के नाते खेत बेगार में जुतवाते थे और असामियों को एक दूसरे से लड़ाकर रक़में मारते थे। सारा गाँव उनसे काँपता था!

— 'बोले -- यह तुमने क्या रोग पाल लिया होरी?' होरी ने पीछे फिरकर पूछा -- 'तुमने क्या कहा लाला -- मैंने सुना नहीं।'

— 'पटेश्वरी पीछे से क़दम बढ़ाते हुए बराबर आकर बोले -- धनिया के साथ क्या तुम्हारी बुद्धि भी घास खा गयी। झुनिया को क्यों नहीं उसके बाप के घर भेज देते, सेंत-मेंत में अपनी हँसीं करा रहे हो। न जाने किसका लड़का लेकर आ गयी और तुमने घर में बैठा लिया।'

— 'अभी तुम्हारी दो-दो लड़कियाँ ब्याहने को बैठी हुई हैं, सोचो कैसे बेड़ा पार होगा।' होरी इस तरह की आलोचनाएँ और शुभ कामनाएँ सुनते-सुनते तंग आ गया था।

— 'खिन्न होकर बोला -- यह सब मैं समझता हूँ लाला! लेकिन तुम्हीं बताओ, मैं क्या करूँ! मैं झुनिया को निकाल दूँ, तो भोला उसे रख लेंगे? वहाँ तो उनके दोनों लड़के ख़ून करने को उतारू हो रहे हैं।'

— 'फिर मैं उसे कैसे निकाल दूँ। एक तो नालायक़ आदमी मिला कि उसकी बाँह पकड़कर दग़ा दे गया। मैं भी निकाल दूँगा, तो इस दशा में वह कहीं मेहनत-मजूरी भी तो न कर सकेगी। कहीं डूब-धस मरी तो किसे अपराध लगेगा।'

— 'रहा लड़कियों का ब्याह सो भगवान् मालिक हैं। जब उसका समय आयेगा, कोई न कोई रास्ता निकल ही आयेगा। लड़की तो हमारी बिरादरी में आज तक कभी कुँआरी नहीं रही। बिरादरी के डर से हत्यारे का काम नहीं कर सकता।'

होरी नम्र स्वभाव का आदमी था। सदा सिर झुकाकर चलता और चार बातें ग़म खा लेता था। हीरा को छोड़कर गाँव में कोई उसका अहित न चाहता था, पर समाज इतना बड़ा अनर्थ कैसे सह ले! उसी रात को इस समस्या पर विचार करने के लिए गाँव के विधाताओं की बैठक हुई।

— 'दातादीन बोले -- मेरी आदत किसी की निन्दा करने की नहीं है। मगर वह राँड़ धनिया तो मुझसे लड़ने पर उतारू हो गयी। नीच जात, जहाँ पेट-भर रोटी खायी और टेढे चले, इसी से तो सासतरों में कहा है -- नीच जात लतियाये अच्छा।'

— 'पटेश्वरी ने कहा -- यही तो इनमें बुराई है कि चार पैसे देखे और आँखें बदलीं। आज होरी ने ऐसी हेकड़ी जतायी कि मैं अपना-सा मुँह लेकर रह गया। झुनिया को देखकर दूसरी विधवाओं का मन बढ़ेगा कि नहीं? समाज तो भय के बल से चलता है।'

झिंगुरीसिंह दो स्त्रियों के पति थे और तीसरा ब्याह भी कर डाला था। वे स्त्रियों पर बड़ा कठोर शासन रखते थे। बोले -- 'ऐसी औरत का तो सिर काट ले। होरी ने इस कुलटा को घर रखकर समाज में विष बोया है। राय साहब को इसकी सूचना देनी चाहिए।'

पण्डित नोखेराम कारकुन प्रातःकाल पूजा पर बैठ जाते थे; मगर भगवान् के सामने से उठते ही उनकी मानवता विकृत हो जाती थी। बोले -- 'इसमें राय साहब से क्या पूछना है। मैं जो चाहूँ, कर सकता हूँ। लगा दो सौ रुपये डाँड़। आप गाँव छोड़कर भागेगा। इधर बेदख़ली भी दायर किये देता हूँ।'

— 'पटेश्वरी ने कहा -- मगर लगान तो बेबाक़ कर चुका है? झिंगुरीसिंह ने समर्थन किया -- हाँ, लगान के लिए ही तो हमसे तीस रुपए लिये हैं।'

— 'नोखेराम ने घमंड के साथ कहा -- लेकिन अभी रसीद तो नहीं दी। सबूत क्या है कि लगान बेबाक़ कर दिया।' सर्वसम्मति से यही तय हुआ कि होरी पर सौ रुपए तवान लगा दिया जाय।

पर आज ही रात को झुनिया के लड़का पैदा हो गया। और दूसरे ही दिन गाँववालों की पंचायत बैठ गयी। होरी और धनिया, दोनों अपनी क़िस्मत का फ़ैसला सुनने के लिए बुलाए गये।

— 'धनिया भरी सभा में रकुँआरधे हुए कंठ से बोली -- पंचो, ग़रीब को सताकर सुख न पाओगे, इतना समझ लेना। मेरा सराप तुमको भी ज़रूर से ज़रूर लगेगा। मुझसे इतना कड़ा जरीबाना इसलिये लिया जा रहा है कि मैंने अपनी बहू को क्यों अपने घर में रखा।'

— 'पटेश्वरी बोले -- वह तेरी बहू नहीं है, हरजाई है। होरी ने धनिया को डाँटा -- तू क्यों बोलती है धनिया! पंच में परमेसर रहते हैं। उनका जो न्याय है, वह सिर आँखों पर।'

— 'होरी ने कहा -- पंचो, हमारे पास जो कुछ है, वह अभी खलिहान में है। एक दाना भी घर में नहीं आया, जितना चाहो, ले लो। सब लेना चाहो, सब ले लो। भगवान् मालिक है, जितनी कमी पड़े, उसमें हमारे दोनों बैल ले लेना।'

— 'धनिया दाँत कटकटाकर बोली -- मैं एक दाना न अनाज दूँगी, न एक कौड़ी डाँड़। सोचा होगा डाँड़ के बहाने इसकी सब जैजात ले लो। धनिया के जीते-जी यह नहीं होने का। हमें नहीं रहना है बिरादरी में। मुकुत न हो जायगी।'

— 'होरी ने उसके सामने हाथ जोड़कर कहा -- धनिया, तेरे पैरों पड़ता हूँ, चुप रह। हम सब बिरादरी के चाकर हैं, उसके बाहर नहीं सकते। वह जो डाँड़ लगाती है, उसे सिर झुकाकर मंज़ूर कर। नक्कू बनकर जीने से तो गले में फाँसी लगा लेना अच्छा है।'

— 'आज मर जायँ, तो बिरादरी ही तो इस मिट्टी को पार लगायेगी? पंचो, मुझे अपने जवान बेटे का मुँह देखना नसीब न हो, अगर मेरे पास खलिहान के अनाज के सिवा और कोई चीज़ हो। मुझे तो उनकी आज्ञा पालनी है।'

धनिया झल्लाकर वहाँ से चली गयी और होरी पहर रात तक खलिहान से अनाज ढो-ढोकर झिंगुरीसिंह की चौपाल में ढेर करता रहा। बीस मन जौ था, पाँच मन गेहूँ और मटर, थोड़ा-सा चना और तेलहन भी था।

यह जो कुछ हुआ, धनिया के पुरुषार्थ से हुआ था। दोनों ने सोचा था, गेहूँ और तेलहन से लगान की एक क़िस्त अदा हो जायगी। वह सारी आशा मिट्टी में मिल गयी। अनाज तो हाथ से गये ही, सौ रुपए की गठरी और सिर पर लद गयी।

बिरादरी का वह आतंक था कि होरी अपने सिर पर लादकर अनाज ढो रहा था, मानो अपने हाथों अपनी क़ब्र खोद रहा हो। बिरादरी उसके जीवन में वृक्ष की भाँति जड़ जमाये हुए थी। बिरादरी से निकलकर उसका जीवन विशृंखल हो जायगा -- तार-तार हो जायगा।

जब खलिहान में केवल डेढ़-दो मन जौ रह गया, तो धनिया ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोली -- 'अच्छा, अब रहने दो। ढो तो चुके बिरादरी की लाज। बच्चों के लिए भी कुछ छोड़ोगे कि सब बिरादरी के भाड़ में झोंक दोगे?'

— 'होरी ने अपना हाथ छुड़ाकर टोकरी में शेष अनाज भरते हुए कहा -- यह न होगा धनिया, पंचों की आँख बचाकर एक दाना भी रख लेना मेरे लिए हराम है। मैं सब वहाँ ढेर कर देता हूँ। फिर पंचों के मन में दया उपजेगी।'

— 'धनिया तिलमिलाकर बोली -- यह पंच नहीं हैं, राक्षस हैं, पक्के राछस! यह सब हमारी जगह-ज़मीन छीनकर माल मारना चाहते हैं। डाँड़ तो बहाना है। तुम इन पिशाचों से दया की आसा रखते हो? मुँह धो रखो।'

— 'जब होरी ने न माना और टोकरी सिर पर रखने लगा तो धनिया ने दोनों हाथों से टोकरी पकड़ ली और बोली -- इसे तो मैं न ले जाने दूँगी, चाहे तुम मेरी जान ही ले लो। मर-मरकर हमने कमाया कि पंच लोग मूछों पर ताव देकर भोग लगायें।'

— 'धनिया ने आगे कहा -- तुमने अकेले ही सब कुछ नहीं कर लिया है। मैं भी अपनी बच्चियों के साथ सती हुई हूँ। सीधे से टोकरी रख दो, नहीं आज सदा के लिए नाता टूट जायगा। कहे देती हूँ।'

होरी सोच में पड़ गया। धनिया के कथन में सत्य था। उसे अपने बाल-बच्चों की कमाई छीनकर तावान देने का क्या अधिकार है? टोकरी उसके हाथ से छूट गयी। धीरे से बोला -- 'तू ठीक कहती है धनिया! दूसरों के हिस्से पर मेरा कोई ज़ोर नहीं है।'

— 'जो कुछ बचा है, वह ले जा, मैं जाकर पंचों से कहे देता हूँ।' धनिया अनाज की टोकरी घर में रखकर अपनी दोनों लड़कियों के साथ पोते के जन्मोत्सव में सोहर गा रही थी। आज बिरादरी की कोई औरत न थी।

सौर से झुनिया ने कहला भेजा था, सोहर गाने का काम नहीं है; लेकिन धनिया कब मानने लगी। उसी वक़्त होरी अपने घर को अस्सी रुपए पर झिंगुरीसिंह के हाथ गिरों रख रहा था।

होरी रेहननामा लिखकर कोई ग्यारह बजे रात घर आया तो, धनिया ने पूछा -- ' इतनी रात तक वहाँ क्या करते रहे? ' होरी बोला -- ' इस लौंडे की करनी भरता रहा। अस्सी रुपए में घर रेहन लिखना पड़ा। '

— 'होरी ने आगे कहा -- अब हुक़्क़ा खुल गया। बिरादरी ने अपराध क्षमा कर दिया।' धनिया ने ओठ चबाकर कहा -- ' न हुक़्क़ा खुलता, तो हमारा क्या बिगड़ा जाता था। तुमने बाप-दादों की निसानी घर का वारा-न्यारा कर दिया। '

— 'धनिया बोली -- इसी तरह कल ज़मीन भी लिख देना। मैं पूछती हूँ, उन पंचों से पूछते, तुम कहाँ के बड़े धमार्त्मा हो। तुम्हारा तो मुँह देखना भी पाप है। ' होरी ने डाँटा -- ' चुप रह, बिरादरी के चक्कर में अभी पड़ी नहीं है। '

— 'धनिया उत्तेजित हो गयी -- कौन-सा पाप किया है? आदमी का बहुत सीधा होना भी बुरा है। मेरे भाग फूट गये थे कि तुम जैसे मर्द से पाला पड़ा। होरी ने कहा -- मैं तेरे बाप के पाँव पड़ने गया था? वही तुझे मेरे गले बाँध गया।'

— 'धनिया बोली -- पत्थर पड़ गया था उनकी अक्कल पर। ऐसे कोई बड़े सुन्दर भी तो न थे तुम।' विवाद विनोद के क्षेत्र में आ गया। लाख रुपए का बालक तो मिल गया! होरी ने पूछा -- ' बच्चा किसको पड़ा है? '

— 'धनिया ने प्रसन्न मुख होकर जवाब दिया -- बिलकुल गोबर को पड़ा है। होरी ने पूछा -- रिष्ट-पुष्ट तो है? धनिया बोली -- हाँ, अच्छा है। '

रात को गोबर झुनिया के साथ चला, तो ऐसा काँप रहा था, जैसे उसकी नाक कटी हुई हो। झुनिया को देखते ही सारे गाँव में कुहराम मच जायगा, लोग चारों ओर से कैसी हाय-हाय मचायेंगे, धनिया कितनी गालियाँ देगी, यह सोच-सोचकर उसके पाँव पीछे रहे जाते थे।

होरी का तो उसे भय न था। वह केवल एक बार धाड़ेंगे, फिर शान्त हो जायँगे। डर था धनिया का, ज़हर खाने लगेगी, घर में आग लगाने लगेगी। नहीं, इस वक़्त वह झुनिया के साथ घर नहीं जा सकता।

लेकिन कहीं धनिया ने झुनिया को घर में घुसने ही न दिया और झाड़ू लेकर मारने दौड़ी, तो वह बेचारी कहाँ जायगी। अपने घर तो लौट ही नहीं सकती। कहीं कुएँ में कूद पड़े या गले में फाँसी लगा ले, तो क्या हो।

उसने लम्बी साँस ली। किसकी शरण ले। मगर अम्माँ इतनी निर्दयी नहीं हैं कि मारने दौड़ें। क्रोध में दो-चार गालियाँ देंगी! लेकिन जब झुनिया उसके पाँव पड़कर रोने लगेगी, तो उन्हें ज़रूर दया आ जायगी।

तब तक वह ख़ुद कहीं छिपा रहेगा। जब उपद्रव शान्त हो जायगा, तब वह एक दिन धीरे से आयेगा और अम्माँ को मना लेगा, अगर इस बीच उसे कहीं मजूरी मिल जाय और दो-चार रुपए लेकर घर लौटे, तो फिर धनिया का मुँह बन्द हो जायगा।

— 'झुनिया बोली -- मेरी छाती धक-धक कर रही है। मैं क्या जानती थी, तुम मेरे गले यह रोग मढ़ दोगे। न जाने किस बुरी साइत में तुमको देखा। न तुम गाय लेने आते, न यह सब कुछ होता। तुम आगे-आगे जाकर जो कुछ कहना-सुनना हो, कह-सुन लेना। मैं पीछे से जाऊँगी।'

— 'गोबर ने कहा -- नहीं-नहीं, पहले तुम जाना और कहना, मैं बाज़ार से सौदा बेचकर घर जा रही थी। रात हो गयी है, अब कैसे जाऊँ। तब तक मैं आ जाऊँगा।'

— 'झुनिया ने चिन्तित मन से कहा -- तुम्हारी अम्माँ बड़ी ग़ुस्सैल हैं। मेरा तो जी काँपता है। कहीं मुझे मारने लगें तो क्या करूँगी।'

— 'गोबर ने धीरज दिलाया -- अम्माँ की आदत ऐसी नहीं। हम लोगों तक को तो कभी एक तमाचा मारा नहीं, तुम्हें क्या मारेंगी। उनको जो कुछ कहना होगा मुझे कहेंगी, तुमसे तो बोलेंगी भी नहीं।'

गाँव समीप आ गया। गोबर ने ठिठककर कहा -- 'अब तुम जाओ।' झुनिया ने अनुरोध किया -- 'तुम भी देर न करना।'

— 'नहीं-नहीं, छन भर में आता हूँ, तू चल तो।'

— 'मेरा जी न जाने कैसा हो रहा है। तुम्हारे ऊपर क्रोध आता है।'

— 'तुम इतना डरती क्यों हो? मैं तो आ ही रहा हूँ।'

— 'इससे तो कहीं अच्छा था कि किसी दूसरी जगह भाग चलते।'

— 'जब अपना घर है, तो क्यों कहीं भागें? तुम नाहक़ डर रही हो।'

— 'जल्दी से आओगे न?'

— 'हाँ-हाँ, अभी आता हूँ।'

— 'मुझसे दग़ा तो नहीं कर रहे हो? मुझे घर भेजकर आप कहीं चलते बनो।'

— 'इतना नीच नहीं हूँ झूना! जब तेरी बाँह पकड़ी है, तो मरते दम तक निभाऊँगा।'

झुनिया घर की ओर चली। गोबर एक क्षण दुविधे में पड़ा खड़ा रहा। फिर एका-एक सिर पर मँडरानेवाली धिक्कार की कल्पना भयंकर रूप धारण करके उसके सामने खड़ी हो गयी। कहीं सचमुच अम्माँ मारने दौड़ें, तो क्या हो? उसके पाँव जैसे धरती से चिमट गये।

उसके और उसके घर के बीच केवल आमों का छोटा-सा बाग़ था। झुनिया की काली परछाईं धीरे-धीरे जाती हुई दीख रही थी। उसकी ज्ञानेंद्रियाँ बहुत तेज़ हो गयी थीं। उसके कानों में ऐसी भनक पड़ी, जैसे अम्माँ झुनिया को गाली दे रही हैं।

उसके मन की कुछ ऐसी दशा हो रही थी, मानो सिर पर गड़ाँसे का हाथ पड़ने वाला हो। देह का सारा रक्त जैसे सूख गया हो। एक क्षण के बाद उसने देखा, जैसे धनिया घर से निकलकर कहीं जा रही हो। दादा के पास जाती होगी!

साइत दादा खा-पीकर मटर अगोरने चले गये हैं। वह मटर के खेत की ओर चला। जौ-गेहूँ के खेतों को रौंदता हुआ वह इस तरह भागा जा रहा था, मानो पीछे दौड़ आ रही है। वह है दादा की मँड़ैया।

वह रुक गया और दबे पाँव जाकर मँड़ैया के पीछे बैठ गया। उसका अनुमान ठीक निकला। वह पहुँचा ही था कि धनिया की बोली सुनायी दी। ओह! ग़ज़ब हो गया। अम्माँ इतनी कठोर हैं।

एक अनाथ लड़की पर इन्हें तनिक भी दया नहीं आती। और जो मैं भी सामने जाकर फटकार दूँ कि तुमको झुनिया से बोलने का कोई मजाल नहीं है, तो सारी सेखी निकल जाय। अच्छा! दादा भी बिगड़ रहे हैं।

केले के लिए आज ठीकरा भी तेज़ हो गया। मैं ज़रा अदब करता हूँ, उसी का फल है। यह तो दादा भी वहीं जा रहे हैं। अगर झुनिया को इन्होंने मारा-पीटा तो मुझसे न सहा जायगा। भगवान्! अब तुम्हारा ही भरोसा है।

मैं न जानता था इस विपत में जान फँसेगी। झुनिया मुझे अपने मन में कितना धूर्त, कायर और नीच समझ रही होगी; मगर उसे मार कैसे सकते हैं? घर से निकाल भी कैसे सकते हैं? क्या घर में मेरा हिस्सा नहीं है?

अगर झुनिया पर किसी ने हाथ उठाया, तो आज महाभारत हो जायगा। माँ-बाप जब तक लड़कों की रक्षा करें, तब तक माँ-बाप हैं। जब उनमें ममता ही नहीं है, तो कैसे माँ-बाप!

होरी ज्यों ही मँड़ैया से निकला, गोबर भी दबे पाँव धीरे-धीरे पीछे-पीछे चला; लेकिन द्वार पर प्रकाश देखकर उसके पाँव बँध गये। उस प्रकाशरेखा के अन्दर वह पाँव नहीं रख सकता। वह अँधेरे में ही दीवार से चिमट कर खड़ा हो गया।

उसकी हिम्मत ने जवाब दे दिया। हाय! बेचारी झुनिया पर निरपराध यह लोग झल्ला रहे हैं, और वह कुछ नहीं कर सकता। उसने खेल-खेल में जो एक चिनगारी फेंक दी थी, वह सारे खलिहान को भस्म कर देगी, यह उसने न समझा था।

और अब उसमें इतना साहस न था कि सामने आकर कहे -- हाँ, मैंने चिनगारी फेंकी थी। जिन टिकौनों से उसने अपने मन को सँभाला था, वे सब इस भूकम्प में नीचे आ रहे और वह झोंपड़ा नीचे गिर पड़ा। वह पीछे लौटा।

अब वह झुनिया को क्या मुँह दिखाये। वह सौ क़दम चला; पर इस तरह, जैसे कोई सिपाही मैदान से भागे। उसने झुनिया से प्रीति और विवाह की जो बातें की थीं, वह सब याद आने लगीं।

वह अभिसार की मीठी स्मृतियाँ याद आयीं जब वह अपने उन्मत्त उसासों में, अपनी नशीली चितवनों में मानो अपने प्राण निकालकर उसके चरणों पर रख देता था।

झुनिया किसी वियोगी पक्षी की भाँति अपने छोटे-से घोंसले में एकान्त-जीवन काट रही थी। वहाँ नर का मत्त आग्रह न था, न वह उद्दीप्त उल्लास, न शावकों की मीठी आवाज़ें; मगर बहेलिये का जाल और छल भी तो वहाँ न था।

गोबर ने उसके एकान्त घोसले में जाकर उसे कुछ आनन्द पहुँचाया या नहीं, कौन जाने; पर उसे विपत्ति में तो डाल ही दिया। वह सँभल गया। भागता हुआ सिपाही मानो अपने एक साथी का बढ़ावा सुनकर पीछे लौट पड़ा।

उसने द्वार पर आकर देखा, तो किवाड़ बन्द हो गये थे। किवाड़ों के दराजों से प्रकाश की रेखाएँ बाहर निकल रही थीं। उसने एक दराज़ से बाहर झाँका। धनिया और झुनिया बैठी हुई थीं। होरी खड़ा था।

झुनिया की सिसकियाँ सुनायी दे रही थीं और धनिया उसे समझा रही थी -- 'बेटी, तू चलकर घर में बैठ। मैं तेरे काका और भाइयों को देख लूँगी। जब तक हम जीते हैं, किसी बात की चिन्ता नहीं है। हमारे रहते कोई तुझे तिरछी आँखों देख भी न सकेगा।'

गोबर गद्गद हो गया। आज वह किसी लायक़ होता, तो दादा और अम्माँ को सोने से मढ़ देता और कहता -- अब तुम कुछ परवा न करो, आराम से बैठे खाओ और जितना दान-पुन करना चाहो, करो।

झुनिया के प्रति अब उसे कोई शंका नहीं है। वह उसे जो आश्रय देना चाहता था वह मिल गया। झुनिया उसे दग़ाबाज़ समझती है, तो समझे।

वह तो अब तभी घर आयेगा, जब वह पैसे के बल से सारे गाँव का मुँह बन्द कर सके और दादा और अम्माँ उसे कुल का कलंक न समझकर कुल का तिलक समझें।

मन पर जितना ही गहरा आघात होता है, उसकी प्रतिक्रिया भी उतनी ही गहरी होती है। इस अपकीर्ति और कलंक ने गोबर के अन्तस्तल को मथकर वह रत्न निकाल लिया जो अभी तक छिपा पड़ा था।

आज पहली बार उसे अपने दायित्व का ज्ञान हुआ और उसके साथ ही संकल्प भी। अब तक वह कम से कम काम करता और ज़्यादा से ज़्यादा खाना अपना हक़ समझता था।

उसके मन में कभी यह विचार ही नहीं उठा था कि घरवालों के साथ उसका भी कुछ कर्तव्य है। आज माता-पिता की उदात्त क्षमा ने जैसे उसके हृदय में प्रकाश डाल दिया।

जब धनिया और झुनिया भीतर चली गयीं, तो वह होरी की उसी मड़ैया में जा बैठा और भविष्य के मंसूबे बाँधने लगा। शहर के बेलदारों को पाँच-छः आने रोज़ मिलते हैं, यह उसने सुन रखा था।

अगर उसे छः आने रोज़ मिलें और वह एक आने में गुज़र कर ले, तो पाँच आने रोज़ बच जायँ। महीने में दस रुपए होते हैं, और साल-भर में सवा सौ।

वह सवा सौ की थैली लेकर घर आये, तो किसकी मजाल है, जो उसके सामने मुँह खोल सके। यही दातादीन और यही पटेसुरी आकर उसकी हाँ में हाँ मिलायेंगे। और झुनिया तो मारे गर्व के फूल जाय।

दो चार साल वह इसी तरह कमाता रहे, तो घर का सारा दलिद्दर मिट जाय। अभी तो सारे घर की कमाई भी सवा सौ नहीं होती। अब वह अकेला सवा सौ कमायेगा।

यही तो लोग कहेंगे कि मजूरी करता है। कहने दो। मजूरी करना कोई पाप तो नहीं है। और सदा छः आने ही थोड़े मिलेंगे। जैसे-जैसे वह काम में होशियार होगा, मजूरी भी तो बढ़ेगी।

तब वह दादा से कहेगा, अब तुम घर बैठकर भगवान् का भजन करो। इस खेती में जान खपाने के सिवा और क्या रखा है। सबसे पहले वह एक पछायीं गाय लायेगा, जो चार-पांच सेर दूध देगी।

और दादा से कहेगा, तुम गऊ माता की सेवा करो। इससे तुम्हारा लोक भी बनेगा, परलोक भी। और क्या, एक आने में उसका गुज़र आराम से न होगा? घर-द्वार लेकर क्या करना है।

किसी के ओसार में पड़ा रहेगा। सैकड़ों मन्दिर हैं, धरमसाले हैं। और फिर जिसकी वह मजूरी करेगा, क्या वह उसे रहने के लिए जगह न देगा? आटा रुपए का दस सेर आता है।

एक आने में ढाई पाव हुआ। एक आने का तो वह आटा ही खा जायगा। लकड़ी, दाल, नमक, साग यह सब कहाँ से आयेगा? दोनों जून के लिए सेर भर तो आटा ही चाहिए।

ओह! खाने की तो कुछ न पूछो। मुट्ठी भर चने में भी काम चल सकता है। हलुवा और पूरी खाकर भी काम चल सकता है। जैसी कमाई हो। वह आध सेर आटा खाकर दिन भर मज़े से काम कर सकता है।

इधर-उधर से उपले चुन लिये, लकड़ी का काम चल गया। कभी एक पैसे की दाल ले ली, कभी आलू। आलू भूनकर भुरता बना लिया। यहाँ दिन काटना है कि चैन करना है।

पत्तल पर आटा गूँधा, उपलों पर बाटियाँ सेंकी, आलू भूनकर भुरता बनाया और मज़े से खाकर सो रहे। घर ही पर कौन दोनों जून रोटी मिलती है, एक जून चबेना ही मिलता है। वहाँ भी एक जून चबेने पर काटेंगे।

उसे शंका हुई; अगर कभी मजूरी न मिली, तो वह क्या करेगा? मगर मजूरी क्यों न मिलेगी? जब वह जी तोड़कर काम करेगा, तो सौ आदमी उसे बुलायेंगे। काम सबको प्यारा होता है, चाम नहीं प्यारा होता।

यहाँ भी तो सूखा पड़ता है, पाला गिरता है, ऊख में दीमक लगते हैं, जौ में गेरुई लगती है, सरसों में लाही लग जाती है। उसे रात को कोई काम मिल जायगा, तो उसे भी न छोड़ेगा।

दिन-भर मजूरी की; रात कहीं चौकीदारी कर लेगा। दो आने भी रात के काम में मिल जायँ, तो चाँदी है। जब वह लौटेगा, तो सबके लिए साड़ियाँ लायेगा।

झुनिया के लिए हाथ का कंगन ज़रूर बनवायेगा और दादा के लिए एक मुँड़ासा लायेगा। इन्हीं मनमोदकों का स्वाद लेता हुआ वह सो गया; लेकिन ठंड में नींद कहाँ!

किसी तरह रात काटी और तड़के उठ कर लखनऊ की सड़क पकड़ ली। बीस कोस ही तो है। साँझ तक पहुँच जायगा। गाँव का कौन आदमी वहाँ आता-जाता है और वह अपना ठिकाना नहीं लिखेगा।

नहीं दादा दूसरे ही दिन सिर पर सवार हो जायँगे। उसे कुछ पछतावा था, तो यही कि झुनिया से क्यों न साफ़-साफ़ कह दिया -- अभी तू घर जा, मैं थोड़े दिनों में कुछ कमा-धमाकर लौटूँगा;

लेकिन तब वह घर जाती ही क्यों। कहती -- मैं भी तुम्हारे साथ लौटूँगी। उसे वह कहाँ-कहाँ बाँधे फिरता।

दिन चढ़ने लगा। रात को कुछ न खाया था। भूख मालूम होने लगी। पाँव लड़खड़ाने लगे। कहीं बैठकर दम लेने की इच्छा होती थी। बिना कुछ पेट में डाले वह अब नहीं चल सकता; लेकिन पास एक पैसा भी नहीं है।

सड़क के किनारे झुड़-बेरियों के झाड़ थे। उसने थोड़े से बेर तोड़ लिये और उदर को बहलाता हुआ चला। एक गाँव में गुड़ पकने की सुगन्ध आयी। अब मन न माना।

कोल्हाड़ में जाकर लोटा-डोर माँगा और पानी भर कर चुल्लू से पीने बैठा कि एक किसान ने कहा -- 'अरे भाई, क्या निराला ही पानी पियोगे? थोड़ा-सा मीठा खा लो।'

— 'अबकी और चला लें कोल्हू और बना लें खाँड़। अगले साल तक मिल तैयार हो जायगी। सारी ऊख खड़ी बिक जायगी। गुड़ और खाँड़ के भाव चीनी मिलेगी, तो हमारा गुड़ कौन लेगा?'

उसने एक कटोरे में गुड़ की कई पिण्डियाँ लाकर दीं। गोबर ने गुड़ खाया, पानी पिया। 'तमाखू तो पीते होगे?' गोबर ने बहाना किया। अभी चिलम नहीं पीता।

बुड्ढे ने प्रसन्न होकर कहा -- 'बड़ा अच्छा करते हो भैया! बुरा रोग है। एक बेर पकड़ ले, तो ज़िन्दगी भर नहीं छोड़ता।' इंजन को कोयला-पानी भी मिल गया, चाल तेज़ हुई।

जाड़े के दिन, न जाने कब दोपहर हो गया। एक जगह देखा, एक युवती एक वृक्ष के नीचे पति से सत्याग्रह किये बैठी थी। पति सामने खड़ा उसे मना रहा था। दो-चार राहगीर तमाशा देखने खड़े हो गये थे।

गोबर भी खड़ा हो गया। मानलीला से रोचक और कौन जीवन-नाटक होगा? युवती ने पति की ओर घूरकर कहा -- 'मैं न जाऊँगी, न जाऊँगी, न जाऊँगी।'

— 'पुरुष ने ये जैसे अल्टिमेटम दिया -- न जायगी?'

— 'न जाऊँगी।'

— 'न जायगी?'

— 'न जाऊँगी।'

पुरुष ने उसके केश पकड़कर घसीटना शुरू किया। युवती भूमि पर लोट गयी। पुरुष ने हारकर कहा -- 'मैं फिर कहता हूँ, उठकर चल।' स्त्री ने उसी दृढ़ता से कहा -- 'मैं तेरे घर सात जनम न जाऊँगी, बोटी-बोटी काट डाल।'

— 'मैं तेरा गला काट लूँगा।'

— 'तो फाँसी पाओगे।'

पुरुष ने उसके केश छोड़ दिये और सिर पर हाथ रखकर बैठ गया। पुरुषत्व अपनी चरम सीमा तक पहुँच गया। उसके आगे अब उसका कोई बस नहीं है।

एक क्षण में वह फिर खड़ा हुआ और परास्त होकर बोला -- 'आख़िर तू क्या चाहती है?' युवती भी उठ बैठी, और निश्चल भाव से बोली -- 'मैं यही चाहती हूँ, तू मुझे छोड़ दे।'

— 'कुछ मुँह से कहेगी, क्या बात हुई?'

— 'मेरे भाई-बाप को कोई क्यों गाली दे?'

— 'किसने गाली दी, तेरे भाई-बाप को?'

— 'जाकर अपने घर में पूछ!'

— 'चलेगी तभी तो पूछूँगा?'

— 'तू क्या पूछेगा? कुछ दम भी है। जाकर अम्माँ के आँचल में मुँह ढाँककर सो। वह तेरी माँ होगी। मेरी कोई नहीं है। तू उसकी गालियाँ सुन। मैं क्यों सुनूँ?'

— 'एक रोटी खाती हूँ, तो चार रोटी का काम करती हूँ। क्यों किसी की धौंस सहूँ? मैं तेरा एक पीतल का छल्ला भी तो नहीं जानती!'

राहगीरों को इस कलह में अभिनय का आनन्द आ रहा था; मगर उसके जल्द समाप्त होने की कोई आशा न थी। मंज़िल खोटी होती थी। एक-एक करके लोग खिसकने लगे।

गोबर को पुरुष की निर्दयता बुरी लग रही थी। मैदान ख़ाली हुआ, तो बोला -- 'भाई मर्द और औरत के बीच में बोलना तो न चाहिए, मगर इतनी बेदरदी भी अच्छी नहीं होती।'

— 'पुरुष ने कौड़ी की-सी आँखें निकालकर कहा -- तुम कौन हो?'

— 'गोबर ने निःशंक भाव से कहा -- मैं कोई हूँ; लेकिन अनुचित बात देखकर सभी को बुरा लगता है।'

— 'पुरुष ने सिर हिलाकर कहा -- मालूम होता है, अभी मेहरिया नहीं आयी, तभी इतना दर्द है!'

— 'मेहरिया आयेगी, तो भी उसके झोंटे पकड़कर न खीचूँगा।'

— 'अच्छा तो अपनी राह लो। मेरी औरत है, मैं उसे मारूँगा, काटूँगा। तुम कौन होते हो बोलने-वाले! चले जाओ सीधें से, यहाँ मत खड़े हो।'

गोबर का गर्म ख़ून और गर्म हो गया। वह क्यों चला जाय। सड़क सरकार की है। वहाँ से उसे हटाने का किसी को अधिकार नहीं है। पुरुष ने ओठ चबाकर कहा -- 'तो तुम न जाओगे? आऊँ?'

गोबर ने अँगोछा कमर में बाँध लिया और समर के लिए तैयार होकर बोला -- 'तुम आओ या न आओ। मैं तो तभी जाऊँगा, जब मेरी इच्छा होगी।'

— 'तो मालूम होता है, हाथ पैर तुड़वा के जाओगे।'

— 'यह कौन जानता है, किसके हाथ-पाँव टूटेंगे।'

— 'तो तुम न जाओगे?'

— 'ना।'

पुरुष मुट्ठी बाँधकर गोबर की ओर झपटा। उसी क्षण युवती ने उसकी धोती पकड़ ली और उसे अपनी ओर खींचती हुई गोबर से बोली -- 'तुम क्यों लड़ाई करने पर उतारू हो रहे हो जी, अपनी राह क्यों नहीं जाते।'

— 'यहाँ कोई तमाशा है। हमारा आपस का झगड़ा है। कभी वह मुझे मारता है, कभी मैं उसे डाँटती हूँ। तुमसे मतलब।' गोबर यह धिक्कार पाकर चलता बना।

गोबर आगे निकल गया, तो युवती ने पति को डाँटा -- 'तुम सबसे लड़ने क्यों लगते हो। उसने कौन-सी बुरी बात कही थी कि तुम्हें चोट लग गयी।'

— 'बुरा काम करोगे, तो दुनिया बुरा कहेगी ही; मगर है किसी भले घर का और अपनी बिरादरी का ही जान पड़ता है। क्यों उसे अपनी बहन के लिए नहीं ठीक कर लेते?'

— 'पति ने सन्देह के स्वर में कहा -- क्या अब तक क्वाँरा बैठा होगा?'

— 'तो पूछ ही क्यों न लो?' पुरुष ने दस क़दम दौड़कर गोबर को आवाज़ दी और हाथ से ठहर जाने का इशारा किया।

गोबर ने समझा, शायद फिर इसके सिर भूत सवार हुआ, तभी ललकार रहा है। लेकिन उसके मुख पर समर की ललकार न थी। मैत्री का निमन्त्रण था।

उसने गाँव और नाम और जात पूछी। गोबर ने ठीक-ठीक बता दिया। उस पुरुष का नाम कोदई था। कोदई ने मुस्कराकर कहा -- 'हम दोनों में लड़ाई होते-होते बची।'

— 'तुम चले आये, तो, मैंने सोचा, तुमने ठीक ही कहा। मैं नाहक़ तुमसे तन बैठा। कुछ खेती-बारी घर में होती है न?'

गोबर ने बताया, उसके सौ-पाँच बीघे खेत हैं और एक हल की खेती होती है।

— 'कोदई बोला -- मैंने तुम्हें जो भला-बुरा कहा है, उसकी माफ़ी दे दो भाई! क्रोध में आदमी अन्धा हो जाता है। औरत गुन-सहूर में लच्छिमी है, मुदा कभी-कभी न जाने कौन-सा भूत सवार हो जाता है।'

— 'अब तुम्हीं बताओ, माता पर मेरा क्या बस है? जब कोई बात होगी, तो मैं जो कुछ कहूँगा, लुगाई ही से कहूँगा। तुम सोचो, मैं कुपद तो नहीं कह रहा हूँ।'

— 'हाँ, मुझे उसका बाल पकड़कर घसीटना न था; लेकिन औरत जात बिना कुछ ताड़ना दिये क़ाबू में भी तो नहीं रहती। चाहती है, माँ से अलग हो जाऊँ।'

— 'तुम सोचो, कैसे अलग हो जाऊँ और किससे अलग हो जाऊँ। अपनी माँ से? जिसने जनम दिया? यह मुझसे न होगा। औरत रहे या जाय।'

गोबर को भी अपनी राय बदलनी पड़ी। बोला -- 'माता का आदर करना तो सबका धरम ही है भाई। माता से कौन उरिन हो सकता है?'

कोदई ने उसे अपने घर चलने का नेवता दिया। आज वह किसी तरह लखनऊ नहीं पहुँच सकता। गोबर ने विनोद दिया -- 'लुगाई मान गयी?'

— 'कोदई ने कहा -- न मानेगी तो क्या करेगी। वह ख़ुद पछता रही है। चलो, ज़रा माता जी को समझा देना। मुझसे तो कुछ कहते नहीं बनता।'

— 'कोदई ने आगे कहा -- उन्हें भी सोचना चाहिए कि बहू को बाप-भाई की गाली क्यों देती हैं। सब दोस लुगाई ही का नहीं है। माता का भी दोस है।'

— 'इसमें इतनी बात अच्छी है कि घर से रूठकर चली जाय; पर गाली का जवाब गाली से नहीं देती।' गोबर कोदई के साथ हो लिया।

दोनों फिर उसी जगह आये जहाँ युवती बैठी हुई थी। वह अब गृहिणी बन गयी थी। ज़रा-सा घूँघट निकाल लिया था। कोदई बोला -- 'कहते थे, ऐसी डाँट सुनने के बाद घर कैसे जायँ?'

— 'युवती ने घूँघट की आड़ से कहा -- इतनी ही डाँट में डर गये? लुगाई आ जायगी, तब कहाँ भागोगे?' गाँव समीप ही था।

कोदई ने अपने घर पहुँचकर खाट निकाली, चिलम भर लाया। और एक क्षण में वही युवती लोटे में शर्बत लेकर आयी और गोबर को पानी का एक छींटा मारकर मानो क्षमा माँग ली।

वह अब उसका ननदोई हो रहा था। फिर क्यों न अभी से छेड़-छाड़ शुरू कर दे!